महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2203, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब वहाँ उनकी जोड़का कोई पहलवान नहीं रह गया, तब विराट उन्हें व्याघ्रों, सिंहों और हाथियोंसे लड़ाने लगे ॥ ४० ॥ पुनरन्तःपुरगतः स्त्रीणां मध्ये वृकोदरः । योध्यते स विराटेन सिंहैर्मत्तैर्महाबलैः ॥ ४१ ॥ कभी-कभी विराटकी प्रेरणासे स्त्रियोंके अन्तःपुरमें जाकर भीमसेन उन्हें दिखानेके लिये महान् बलवान् और मतवाले सिंहोंके साथ लड़ा करते थे ॥ ४१ ॥ बीभत्सुरपि गीतेन स्वनृत्येन च पाण्डवः । विराटं तोषयामास सर्वांश्चान्तःपुरस्त्रियः ॥ ४२ ॥ पाण्डुनन्दन अर्जुनने भी अपने गीत और नृत्यसे राजा विराट तथा अन्तःपुरकी सम्पूर्ण स्त्रियोंको संतुष्ट कर लिया था ॥ ४२ ॥ अश्वैर्विनीतैर्जवनैस्तत्र तत्र समागतैः । तोषयामास राजानं नकुलो नृपसत्तमम् ॥ ४३ ॥ तस्मै प्रदेयं प्रायच्छत् प्रीतो राजा धनं बहु । विनीतान् वृषभान् दृष्ट्वा सहदेवस्य चाभितः । धनं ददौ बहुविधं विराटः पुरुषर्षभः ॥ ४४ ॥ इसी प्रकार नकुलने जहाँ-तहाँसे आये हुए वेगवान् घोड़ोंको सुशिक्षित करके नृपश्रेष्ठ विराटको प्रसन्न किया था। प्रसन्न होकर राजाने पुरस्काररूपमें उन्हें बहुत धन दिया था। इसी तरह सहदेवके द्वारा शिक्षित एवं विनीत किये हुए बैलोंको देखकर नरश्रेष्ठ विराट्ने उन्हें भी इनाममें बहुत धन दिया ॥ ४३-४४ ॥ द्रौपदी प्रेक्ष्य तान् सर्वान् क्लिश्यमानान् महारथान् । नातिप्रीतमना राजन् निःश्वासपरमाभवत् ॥ ४५ ॥ राजन्! अपने सम्पूर्ण महारथी पतियोंको इस प्रकार क्लेश उठाते देख द्रौपदीके मनमें खेद होता था और वह लंबी साँसें भरती रहती थी ॥ ४५ ॥ एवं ते न्यवसंस्तत्र प्रच्छन्नाः पुरुषर्षभाः । कर्माणि तस्य कुर्वाणा विराटनृपतेस्तदा ॥ ४६ ॥ इस प्रकार वे पुरुषशिरोमणि पाण्डव उस समय राजा विराटके भिन्न-भिन्न कार्य संभालते हुए वहाँ छिपकर रहते थे ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि समयपालनपर्वणि जीमूतवधे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत समयपालनपर्वमें जीमूतवधसम्बन्धी तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥