महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2208, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपि चेक्षणपक्ष्माणां स्मितं ज्योत्स्नोपमं शुभम् । दिव्यांशुरश्मिभिर्वृत्तं दिव्यकान्तिमनोरमम् ॥ १८ ॥ निरीक्ष्य वक्त्रचन्द्रं ते लक्ष्म्यानुपमया युतम् । कृत्स्ने जगति को नेह कामस्य वशगो भवेत् ॥ १९ ॥ ‘तुम्हारा सुन्दर मुखचन्द्र अनुपम लक्ष्मीसे अलंकृत है, तुम्हारे नेत्रोंकी अधखुली पलकें चाँदनीके समान मनको आह्लादित करनेवाली हैं। दिव्य रश्मियोंसे आवृत्त तुम्हारा यह मुखचन्द्र दिव्य छबिके द्वारा मनको रमा लेनेवाला है। इसे देखकर सम्पूर्ण जगत्में कौन ऐसा पुरुष है, जो कामके अधीन न हो जाय? ॥ १८-१९ ॥
हारालंकारयोग्यौ तु स्तनौ चोभौ सुशोभनौ । सुजातौ सहितौ लक्ष्म्या पीनौ वृत्तौ निरन्तरौ ॥ २० ॥ ‘तुम्हारे दोनों सान हार आदि आभूषणोंके योग्य और परम सुन्दर हैं। ये ऊँचे, श्रीसम्पन्न, स्थूल, गोल-गोल और परस्पर सटे हुए हैं ॥ २० ॥
कुड्मलाम्बुरुहाकारौ तव सुभ्रु पयोधरौ । कामप्रतोदाविव मां तुदतश्चारुहासिनि ॥ २१ ॥ ‘सुन्दर भौंहों तथा मनोरम मुसकानवाली सुन्दरी! कमलकोशके समान आकारवाले तुम्हारे दोनों उरोज कामदेवके चाबुककी भाँति मुझे पीड़ा दे रहे हैं ॥ २१ ॥
वलीविभङ्गचतुरं स्तनभारविनामितम् । कराग्रसम्मितं मध्यं तवेदं तनुमध्यमे ॥ २२ ॥ ‘तनुमध्यमे! तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि हाथोंके अग्रभागसे (अँगूठेसे लेकर तर्जनीतकके बित्तेसे) माप ली जा सकती है। वह त्रिवलीकी तीन रेखाओंसे परम सुन्दर दीखती है। तुम्हारे स्तनोंके भारने उसे कुछ झुका दिया है ॥ २२ ॥
दृष्ट्वैव चारु जघनं सरित्पुलिनसंनिभम् । कामव्याधिरसाध्यो मामप्याक्रामति भामिनि ॥ २३ ॥ ‘भामिनि! नदीके दो किनारोंके समान तुम्हारे मनोहर जघनको देख लेनेसे ही कामरूपी असाध्य रोग मुझ-जैसे वीरपर भी आक्रमण कर रहा है ॥ २३ ॥
जज्वाल चाग्निमदनो दावानलिरिव निर्दयः । त्वत्सङ्गमाभिसंकल्पविवृद्धो मां दहत्ययम् ॥ २४ ॥ ‘निर्दयी कामदेव अग्निस্বরূপ होकर दावानलकी भाँति मेरे हृदयरूपी वनमें जल उठा है। तुम्हारे समागमका संकल्प इसमें घीका काम करता है। इससे अत्यन्त प्रज्वलित होकर यह काम मुझे जला रहा है ॥ २४ ॥
आत्मप्रदानवर्षेण संगमाम्भोधरेण च । शमयस्व वरारोहे ज्वलन्तं मन्मथानलम् ॥ २५ ॥