महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'वरारोहे! तुम अपने संगमरूपी मेघसे आत्म-समर्पणरूपी वर्षाद्वारा इस प्रज्वलित
मदनाग्निको बुझा दो ।।
मच्चित्तोन्मादनकरा मन्मथस्य शरोत्कराः ।
त्वत्संगमाशानिशितास्तीव्रा शशिनिभानने ।
मह्यं विदार्य हृदयमिदं निर्दयवेगिताः ।। २६ ।।
प्रविश ह्यसितापाङ्गि प्रचण्डाश्चण्डदारुणाः ।
अत्युन्मादसमारम्भाः प्रीत्युन्मादकरा मम ।
आत्मप्रदानसम्भोगैर्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ।। २७ ।।
'चन्द्रमुखी! मेरे मनको उन्मत्त बना देनेवाले कामदेवके बाणसमूह तुम्हारे समागमकी
आशारूपी शानपर चढ़कर अत्यन्त तीखे और तीव्र हो गये हैं। कजरारे नयनप्रान्तोंवाली
सुन्दरी! अत्यन्त क्रोधपूर्वक चलाये हुए कामके वे प्रचण्ड एवं भयंकर बाण दयाशून्य हो
वेगसे आकर मेरे इस हृदयको विदीर्ण करके भीतर घुस गये हैं और अतिशय उन्माद
(सन्निपातजनित बेहोशी) पैदा कर रहे हैं। वे मेरे लिये प्रेमोन्मादजनक हो रहे हैं। अब तुम्हीं
आत्मदान-जनित सम्भोगरूप औषधके द्वारा यहाँ मेरा उद्धार कर सकती हो ।। २६-२७ ।।
चित्रमाल्याम्बरधरा सर्वाभरणभूषिता ।
कामं प्रकामं सेव त्वं मया सह विलासिनि ।। २८ ।।
'विलासिनि! विचित्र माला और सुन्दर वस्त्र धारण करके समस्त आभूषणोंसे विभूषित
हो मेरे साथ अतिशय कामभोगका सेवन करो ।। २८ ।।
नार्हसीहासुखं वस्तुं सुखार्हा सुखवर्जिता ।
प्राप्नुह्यनुत्तमं सौख्यं मत्तस्त्वं मत्तगामिनि ।। २९ ।।
'यहाँ अनेक प्रकारके कष्ट हैं। अतः तुम ऐसे स्थानमें निवास करने योग्य नहीं हो। तुम
सुख भोगनेके योग्य हो, किंतु यहाँ सुखसे वंचित हो। मस्तीभरी चालसे चलनेवाली सैरन्ध्री!
तुम मुझसे सर्वोत्तम सुखभोग प्राप्त करो' ।। २९ ।।
स्वादून्यमृतकल्पानि पेयानि विविधानि च ।
पिबमाना मनोज्ञानि रममाणा यथासुखम् ।। ३० ।।
'अमृतके समान स्वादिष्ट और मनोहर भाँति-भाँतिके पेय रसोंका पान करती हुई तुम्हें
जैसे सुख मिले, उसी प्रकार रमण करो ।। ३० ।।
भोगोपचारान् विविधान् सौभाग्यं चाप्यनुत्तमम् ।
पानं पिब महाभागे भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ।। ३१ ।।
इदं हि रूपं प्रथमं तवानघे
निरर्थकं केवलमद्य भामिनि ।
अधार्यमाणा स्रगिवोत्तमा शुभा
न शोभसे सुन्दरि शोभना सती ।। ३२ ।।