भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2210

‘महाभागे! नाना प्रकारकी भोग-सामग्री तथा सर्वोत्तम सौभाग्य पाकर उत्तमोत्तम शुभ भोगोंके साथ पीने योग्य रसोंका आस्वादन करो। अनघे! तुम्हारा यह सर्वोत्कृष्ट रूप-सौन्दर्य आजकी परिस्थितिमें केवल व्यर्थ जा रहा है। भामिनि! जैसे उत्तम हारको यदि किसीने गलेमें धारण नहीं किया, तो उसकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार सुन्दरि! तुम शुभस्वरूपा और शोभामयी होकर भी किसीके गलेका हार न बन सकनेके कारण सुशोभित नहीं होती हो ।। ३१-३२ ।।

त्यजामि दारान् मम ये पुरातना
भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि ।
अहं च ते सुन्दरि दासवत् स्थितः
सदा भविष्ये वशगो वरानने ।। ३३ ।।

‘चारुहासिनि! यदि तुम चाहो तो मैं पहली स्त्रियोंको त्याग दूँगा अथवा वे सब तुम्हारी दासी बनकर रहेंगी। सुन्दरि! सुमुखि! मैं स्वयं भी दासकी भाँति सदा तुम्हारे अधीन रहूँगा’ ।। ३३ ।।

द्रौपद्युवाच

अप्राार्थनीयामिह मां सूतपुत्राभिमन्यसे ।
निहीनवर्णां सैरन्ध्रीं बीभत्सां केशकारिणीम् ।। ३४ ।।

**द्रौपदीने कहा—**सूतपुत्र! तुम मुझे चाहते हो। छिः छिः; मुझसे इस तरहकी याचना करना तुम्हारे लिये कदापि योग्य नहीं है। एक तो मेरी जाति छोटी है, दूसरे मैं सैरन्ध्री (दासी) हूँ, बीभत्स वेशवाली स्त्री हूँ तथा केश सँवारनेका काम करनेवाली एक तुच्छ सेविका हूँ ।। ३४ ।।

(स्वेषु दारेषु मेधावी कुरुते यत्नमुत्तमम् ।
स्वदारनिरतो ह्याशु नरो भद्राणि पश्यति ।।
बुद्धिमान् पुरुष अपनी पत्नीको ही अनुकूल बनाये रखनेके लिये उत्तम यत्न करता है। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखनेवाला मनुष्य शीघ्र ही कल्याणका भागी होता है।

न चाधर्मेण लिप्येत न चाकीर्तिमवाप्नुयात् ।
स्वदारेषु रतिर्धर्मो मृतस्यापि न संशयः ।।
मनुष्यको चाहिये कि वह पापमें लिप्त न हो, अपयशका पात्र न बने, अपनी ही पत्नीके प्रति अनुराग रखना परम धर्म है। वह मृत पुरुषके लिये भी कल्याणकारी होता है, इसमें संशय नहीं है।

स्वजातिदारा मर्त्यस्य इहलोके परत्र च ।
प्रेतकार्याणि कुर्वन्ति निवापैस्तर्पयन्ति च ।।