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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

‘महाभागे! नाना प्रकारकी भोग-सामग्री तथा सर्वोत्तम सौभाग्य पाकर उत्तमोत्तम शुभ भोगोंके साथ पीने योग्य रसोंका आस्वादन करो। अनघे! तुम्हारा यह सर्वोत्कृष्ट रूप-सौन्दर्य आजकी परिस्थितिमें केवल व्यर्थ जा रहा है। भामिनि! जैसे उत्तम हारको यदि किसीने गलेमें धारण नहीं किया, तो उसकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार सुन्दरि! तुम शुभस्वरूपा और शोभामयी होकर भी किसीके गलेका हार न बन सकनेके कारण सुशोभित नहीं होती हो ।। ३१-३२ ।।

त्यजामि दारान् मम ये पुरातना
भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि ।
अहं च ते सुन्दरि दासवत् स्थितः
सदा भविष्ये वशगो वरानने ।। ३३ ।।

‘चारुहासिनि! यदि तुम चाहो तो मैं पहली स्त्रियोंको त्याग दूँगा अथवा वे सब तुम्हारी दासी बनकर रहेंगी। सुन्दरि! सुमुखि! मैं स्वयं भी दासकी भाँति सदा तुम्हारे अधीन रहूँगा’ ।। ३३ ।।

द्रौपद्युवाच

अप्राार्थनीयामिह मां सूतपुत्राभिमन्यसे ।
निहीनवर्णां सैरन्ध्रीं बीभत्सां केशकारिणीम् ।। ३४ ।।

**द्रौपदीने कहा—**सूतपुत्र! तुम मुझे चाहते हो। छिः छिः; मुझसे इस तरहकी याचना करना तुम्हारे लिये कदापि योग्य नहीं है। एक तो मेरी जाति छोटी है, दूसरे मैं सैरन्ध्री (दासी) हूँ, बीभत्स वेशवाली स्त्री हूँ तथा केश सँवारनेका काम करनेवाली एक तुच्छ सेविका हूँ ।। ३४ ।।

(स्वेषु दारेषु मेधावी कुरुते यत्नमुत्तमम् ।
स्वदारनिरतो ह्याशु नरो भद्राणि पश्यति ।।
बुद्धिमान् पुरुष अपनी पत्नीको ही अनुकूल बनाये रखनेके लिये उत्तम यत्न करता है। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखनेवाला मनुष्य शीघ्र ही कल्याणका भागी होता है।

न चाधर्मेण लिप्येत न चाकीर्तिमवाप्नुयात् ।
स्वदारेषु रतिर्धर्मो मृतस्यापि न संशयः ।।
मनुष्यको चाहिये कि वह पापमें लिप्त न हो, अपयशका पात्र न बने, अपनी ही पत्नीके प्रति अनुराग रखना परम धर्म है। वह मृत पुरुषके लिये भी कल्याणकारी होता है, इसमें संशय नहीं है।

स्वजातिदारा मर्त्यस्य इहलोके परत्र च ।
प्रेतकार्याणि कुर्वन्ति निवापैस्तर्पयन्ति च ।।

अपनी जातिकी स्त्रियाँ मनुष्यके लिये इहलोक और परलोकमें भी हितकारिणी होती हैं। वे प्रेतकार्य (अन्त्येष्टि-संस्कार) करती और जलांजलि देकर मृतात्माको तृप्त करती हैं।

तदक्षयं च धर्म्यं च स्वर्ग्यमाहुर्मनीषिणः ।
स्वजातिदारजाः पुत्रा जायन्ते कुलपूजिताः ॥
उनके इस कार्यको मनीषी पुरुषोंने अक्षय, धर्मसंगत एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला बताया है। अपनी जातिकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए पुरुष कुलमें सम्मानित होते हैं।

प्रिया हि प्राणिनां दारास्तस्मात् त्वं धर्मभाग् भव ।
परदाररतो मर्त्यो न च भद्राणि पश्यति ॥)
सभी प्राणियोंको अपनी ही पत्नी प्यारी होती है। इसलिये तुम भी ऐसा करके धर्मके भागी बनो। परस्त्रीलम्पट पुरुष कभी कल्याण नहीं देखता।

परदारास्मि भद्रं ते न युक्तं तव साम्प्रतम् ।
दयिताः प्राणिनां दारा धर्मं समनुचिन्तय ॥ ३५ ॥
सबसे बड़ी बात यह है कि मैं दूसरेकी पत्नी हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। इस समय मुझसे इस तरहकी बातें करना तुम्हारे लिये किसी तरह उचित नहीं है। जगत्के सब प्राणियोंके लिये अपनी ही स्त्री प्रिय होती है। तुम धर्मका विचार करो ॥ ३५ ॥

परदारे न ते बुद्धिर्जातु कार्या कथंचन ।
विवर्जनं ह्यकार्याणामेतत् सुपुरुषव्रतम् ॥ ३६ ॥
परायी स्त्रीमें तुम्हें कभी किसी तरह भी मन नहीं लगाना चाहिये। न करने योग्य अनुचित कर्मोंको सर्वथा त्याग दिया जाय, यही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है ॥ ३६ ॥

मिथ्याभिगृध्नो हि नरः पापात्मा मोहमास्थितः ।
अयशः प्राप्नुयाद् घोरं महद् वा प्राप्नुयाद् भयम् ॥ ३७ ॥
झूठे विषयोंमें आसक्त होनेवाला पापात्मा मनुष्य मोहमें पड़कर भयंकर अपयश पाता है अथवा उसे बड़े भारी भय (मृत्यु) का सामना करना पड़ता है ॥ ३७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु सैरन्ध्र्या कीचकः काममोहितः ।
जानन्नपि सुदुर्बुद्धिः परदाराभिमर्शने ॥ ३८ ॥
दोषान् बहून् प्राणहरान् सर्वलोकविगर्हितान् ।
प्रोवाचेदं सुदुर्बुद्धिर्द्रौपदीमजितेन्द्रियः ॥ ३९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सैरन्ध्रीके इस प्रकार समझानेपर भी कीचकको होश न हुआ। वह कामसे मोहित हो रहा था। यद्यपि उस दुर्बुद्धिको यह मालूम था कि परायी स्त्रीके स्पर्शसे बहुत-से ऐसे दोष प्रकट होते हैं, जिनकी सब लोग निन्दा करते हैं तथा

जिनके कारण प्राणोंसे भी हाथ धोना पड़ता है; तो भी उस अजितेन्द्रिय तथा अत्यन्त दुर्बुद्धिने द्रौपदीसे इस प्रकार कहा— ॥ ३८-३९ ॥

नार्हस्येवं वरारोहे प्रत्याख्यातुं वरानने ।
मां मन्मथसमाविष्टं त्वत्कृते चारुहासिनि ॥ ४० ॥
‘वरारोहे! सुमुखि! तुम्हें इस प्रकार मेरी प्रार्थना नहीं ठुकरानी चाहिये! चारुहासिनि! मैं तुम्हारे लिये कामवेदनासे पीड़ित हूँ ॥ ४० ॥

प्रत्याख्याय च मां भीरु वशगं प्रियवादिनम् ।
नूनं त्वमसितापाङ्गि पश्चात्तापं करिष्यसि ॥ ४१ ॥
‘भीरु! मैं तुम्हारे वशमें हूँ और प्रिय वचन बोलता हूँ। कजरारे नयनोंवाली सैरन्ध्री! मुझे ठुकराकर तुम निश्चय ही पश्चात्ताप करोगी ॥ ४१ ॥

अहं हि सुभ्रु राज्यस्य कृत्स्नस्यास्य सुमध्यमे ।
प्रभुर्वासयिता चैव वीर्ये चाप्रतिमः क्षितौ ॥ ४२ ॥
‘सुभ्रू! सुमध्यमे! मैं इस सम्पूर्ण राज्यका स्वामी और इसे बसानेवाला हूँ। बल और पराक्रममें इस पृथ्वीपर मेरी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ ४२ ॥

पृथिव्यां मत्समो नास्ति कश्चिदन्यः पुमानिह ।
रूपयौवनसौभाग्यैर्भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ॥ ४३ ॥
‘रूप, यौवन, सौभाग्य और सर्वोत्तम शुभ भोगोंकी दृष्टिसे इस भूतलपर मेरी समता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है ॥ ४३ ॥

सर्वकामसमृद्धेषु भोगेष्वनुपमेष्विह ।
भोक्तव्येषु च कल्याणि कस्माद् दास्ये रता ह्यसि ॥ ४४ ॥
‘कल्याणि! जब सम्पूर्ण मनोरथोंसे सम्पन्न अनुपम भोग यहाँ भोगनेके लिये तुम्हें सुलभ हो रहे हैं, तब तुम दासीपनमें क्यों आसक्त हो? ॥ ४४ ॥

मया दत्तमिदं राज्यं स्वामिन्यसि शुभानने ।
भजस्व मां वरारोहे भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान् ॥ ४५ ॥
‘शुभानने! मैंने यह सम्पूर्ण राज्य तुम्हें अर्पित कर दिया। अब तुम्हीं इसकी स्वामिनी हो। वरारोहे! मुझे अपना लो और मेरे साथ उत्तमोत्तम भोगोंका उपभोग करो’ ॥ ४५ ॥

एवमुक्ता तु सा साध्वी कीचकेनाशुभं वचः ।
कीचकं प्रत्युवाचेदं गर्हयन्त्यस्य तद् वचः ॥ ४६ ॥
कीचकके इस प्रकार अशुभ (पापपूर्ण) वचन कहनेपर सती-साध्वी द्रौपदीने उसकी उन ओछी बातोंकी निन्दा करते हुए इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ४६ ॥

सैरन्ध्र्युवाच

मा सूतपुत्र मुह्यस्व माद्य त्यक्ष्यस्व जीवितम् ।

जानीहि पञ्चभिर्घोरैर्नित्यं मामभिरक्षिताम् ॥ ४७ ॥ **सैरन्ध्री बोली—**सूतपुत्र! तू आज इस प्रकार मोहके फंदेमें न पड़। अपनी जान न गँवा। तुझे मालूम होना चाहिये कि पाँच भयंकर गन्धर्व मेरी नित्य रक्षा करते हैं ॥ ४७ ॥

न चाप्यहं त्वया लभ्या गन्धर्वाः पतयो मम । ते त्वां निहन्युः कुपिताः साध्वलं मा व्यनीनशः ॥ ४८ ॥ वे गन्धर्व ही मेरे पति हैं। तू कदापि मुझे पा नहीं सकता। मेरे पति कुपित होकर तुझे मार डालेंगे; अतः सँभल जा। इस पापबुद्धिका त्याग कर दे। अपना सर्वनाश न करा ॥ ४८ ॥

अशक्यरूपं पुरुषैरध्वानं गन्तुमिच्छसि । यथा निश्चेतनो बालः कूलस्थः कूलमुत्तरम् । तर्तुमिच्छति मन्दात्मा तथा त्वं कर्तुमिच्छसि ॥ ४९ ॥ अरे! तू उस राहपर जाना चाहता है, जहाँ दूसरे पुरुष नहीं जा सकते। जैसे नदीके एक किनारेपर बैठा हुआ कोई मन्दबुद्धि अचेत बालक दूसरे किनारेपर तैरकर जाना चाहता हो, वैसा ही विनाशकारी कार्य तू भी करना चाहता है ॥ ४९ ॥

अन्तर्महीं वा यदि वोर्ध्वमुत्पतेः समुद्रपारं यदि वा प्रधावसि ।

तथापि तेषां न विमोक्षमर्हसि

प्रमथिनो देवसुता हि खेचराः ॥ ५० ॥

सूतपुत्र ! मुझपर कुदृष्टि डालकर पृथ्वीके भीतर (पातालमें) घुस जा, आकाशमें उड़ जा

अथवा समुद्रके उस पार भाग जा, तथापि मेरे पतियोंके हाथसे तू छूट नहीं सकता; क्योंकि

मेरे पति देवताओंके पुत्र तथा आकाशमें विचरनेवाले हैं। वे अपने शत्रुओंको मथ डालनेकी

शक्ति रखते हैं ॥ ५० ॥

(मां हि त्वमवमन्वानः सूतपुत्र विनङ्क्ष्यसि ।

आशु चाद्यैव नचिरात् सपुत्रः सहबान्धवः ॥

सूतपुत्र ! तू मेरा अपमान कर रहा है; अतः पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित तू आज ही

शीघ्र नष्ट हो जायगा। तेरे विनाशमें अब विलम्ब नहीं है।

दुर्लभामभिमन्वानो मां वीरैरभिरक्षिताम् ।

पतिष्यस्यवशस्तूर्णं वृन्तात् तालफलं यथा ॥

मैं वीर गन्धर्वोंद्वारा सुरक्षित होनेके कारण तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ। मेरा अपमान

करनेसे शीघ्र ही विवशतापूर्वक तेरा उसी प्रकार पतन होगा, जैसे ताड़का फल अपने

मूलस्थानसे नीचे गिरता है।

यो मामज्ञाय कामार्तः अबद्धानि प्रभाषसे ।

अशक्तस्तु पुमाञ्छैलं न लङ्घयितुमर्हति ॥

तू मुझे नहीं जानता, इसीलिये कामातुर होकर बहकी-बहकी बातें कर रहा है। परंतु

कोई असमर्थ पुरुष कितना ही प्रयत्न करे, वह पर्वतको नहीं लाँघ सकता।

दिशः प्रपन्नो गिरिगह्वराणि वा

गुहां प्रविष्टोऽन्तरितोऽपि वा क्षितेः ॥

जुह्वन् जपन् वा प्रपतन् गिरेस्तटाद्-

हुताशनादित्यगतिं गतोऽपि वा ।

भार्याभिमन्ता पुरुषो महात्मनां

न जातु मुच्येत कथंचनाहतः ॥

चाहे कोई सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण लेता फिरे, पर्वतकी बड़ी-बड़ी कन्दराओं अथवा

दुर्गम गुफाओंमें छिप जाय या पृथ्वीके अंदर ही रहने लगे, होम और जपमें संलग्न रहे,

पर्वतके शिखरसे कूद पड़े, जलती आग अथवा सूर्यकी प्रचण्ड रश्मियोंकी शरण ले तो भी

महात्मा गन्धर्वोंकी पत्नीका अपमान करनेवाला पुरुष कभी किसी तरह भी उनके हाथसे

जीवित नहीं बच सकता।

मोघं तवेदं वचनं भविष्यति

प्रतोलनं वा तुलया महागिरेः ।

हुताशनं प्रज्वलितं महावने

निदाघमध्याह्न इवातुरः स्वयम् ।। प्रवेष्टुकामोऽसि वधाय चात्मनः कुलस्य सर्वस्य विनाशनाय च।

तेरी ये सब बातें व्यर्थ होंगी। तेरे लिये मुझे पाना किसी महान् पर्वतको तराजूपर तौलनेके समान महान् असम्भव है। गरमीकी दोपहरमें जब किसी महान् वनके भीतर प्रचण्ड दावानल धधक चुका हो, उस समय उसमें स्वयं ही घुसनेवाले किसी आतुर पुरुषकी भाँति तू भी अपने और समस्त कुलके विनाशके लिये ही वहाँ प्रवेश करना चाहता है।

सदेवगन्धर्वमहर्षिसंनिधौ सनागलोकासुरराक्षसालये ।। गूढस्थितां मामवमन्य चेतसा न जीवितार्थी शरणं त्वमाप्स्यसि ।।)

मैं यहाँ अपने स्वरूपको छिपाकर रहती हूँ। फिर भी तू मनसे समझ-बूझकर मेरा अपमान करना चाहता है। किंतु याद रख, तू ऐसा करके यदि अपना जीवन बचानेके लिये देवताओं, गन्धर्वों और महर्षियोंके निकट चला जाय अथवा नागलोग, असुरलोक तथा राक्षसोंके निवासस्थानमें भी पहुँच जाय, तो भी तू वहाँ शरण नहीं पा सकेगा।

त्वं कालरात्रीमिव कश्चिदातुरः किं मां दृढं प्रार्थयसेऽद्य कीचक । किं मातुरङ्के शयितो यथा शिशु- श्चन्द्रं जिघृक्षुरिव मन्यसे हि माम् ।। ५१ ।।

कीचक! जैसे कोई रोगी कालरात्रिका आवाहन करे, उसी प्रकार मुझे प्राप्त करनेके लिये तू क्यों आज दुराग्रहपूर्ण प्रार्थना कर रहा है? अरे! जैसे माताकी गोदमें सोया हुआ शिशु चन्द्रमाको ग्रहण करना चाहे, क्या तू उसी प्रकार मुझे पाना चाहता है? ।। ५१ ।।

तेषां प्रियां प्रार्थयतो न ते भुवि गत्वा दिवं वा शरणं भविष्यति । न वर्तते कीचक ते दृशा शुभं या तेन संजीवनमर्थयेत सा ।। ५२ ।।

कीचक! उन गन्धर्वोंकी प्रियतमासे ऐसी अनुचित प्रार्थना करके पृथ्वी अथवा आकाशमें भाग जानेपर भी तुझे कोई शरण देनेवाला नहीं मिलेगा। (तू इतना कामान्ध हो गया है कि) तुझे वह शुभ दृष्टि—वह बुद्धि नहीं प्राप्त होती, जो तेरी मंगलकामना करे—जिससे तेरा जीवन सुरक्षित रह सके ।। ५२ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि कीचककृष्णासंवादे चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचक-द्रौपदी- संवादविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2217)

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चदशोऽध्यायः

रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना

वैशम्पायन उवाच

प्रत्याख्यातो राजपुत्र्या सुदेष्णां कीचकोऽब्रवीत् ।
अमर्यादेन कामेन घोरेणाभिपरिप्लुतः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजकुमारी द्रौपदीके द्वारा इस प्रकार ठुकरा दिये जानेपर कीचक असीम एवं भयंकर कामसे विवश होकर अपनी बहिन सुदेष्णासे बोला— ॥ १ ॥

यथा कैकेयि सैरन्ध्री समेयात् तद् विधीयताम् ।
येनोपायेन सैरन्ध्री भजेन्मां गजगामिनी ।
तं सुदेष्णे परीप्सस्व प्राणान् मोहात् प्रहासिषम् ॥ २ ॥
‘केकयराजनन्दिनि! जिस उपायसे भी वह गजगामिनी सैरन्ध्री मेरे पास आवे और मुझे अंगीकार कर ले, वह करो। सुदेष्णे! तुम स्वयं ही ऊहापोह करके युक्तिसे वह उचित उपाय ढूँढ़ निकालो, जिससे मुझे (मोहके वश हो) प्राणोंका त्याग न करना पड़े’ ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य सा बहुशः श्रुत्वा वाचं विलपतस्तदा ।
विराटमहिषी देवी कृपां चक्रे मनस्विनी ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार बारंबार विलाप करते हुए कीचककी बात सुनकर उस समय राजा विराटकी मनस्विनी महारानी सुदेष्णाके मनमें उसके प्रति दयाभाव प्रकट हो गया ॥ ३ ॥

(सुदेष्णोवाच

शरणागतेयं सुश्रोणी मया दत्ताभया च सा ।
शुभाचारा च भद्रं ते नैनां वक्तुमिहोत्सहे ॥
**सुदेष्णा बोली—**भाई! यह सुन्दरी सैरन्ध्री मेरी शरणमें आयी है। इसे मैंने अभय दे रखा है। तुम्हारा कल्याण हो। यह बड़ी सदाचारिणी है। मैं इससे तुम्हारी मनोगत बात नहीं कह सकती।

नैषा शक्या हि चान्येन स्प्रष्टुं पापेन चेतसा ।
गन्धर्वाः किल पञ्चैनां रक्षन्ति रमयन्ति च ॥
इसे कोई भी दूसरा पुरुष मनमें दूषित भाव लेकर नहीं छू सकता। सुनती हूँ, पाँच गन्धर्व इसकी रक्षा करते हैं और इसे सुख पहुँचाते हैं।

एवमेषा ममाचष्टे तथा प्रथमसंगमे । तथैव गजनासोरुः सत्यमाह ममान्तिके ॥ ते हि क्रुद्धा महात्मानो नाशयेयुर्हि जीवितम् । इसने यह बात मुझसे उसी समय जब कि मेरी इससे पहले-पहल भेंट हुई थी, बता दी थी। इसी प्रकार हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली इस सुन्दरीने मेरे निकट यह सत्य ही कहा है कि यदि किसीने मेरा अपमान किया, तो मेरे महात्मा पति कुपित होकर उसके जीवनको ही नष्ट कर देंगे।

राजा चैव समीक्ष्यैनां सम्मोहं गतवानिह ॥ मया च सत्यवचनैरनुनीतो महीपतिः । राजा भी इसे यहाँ देखकर मोहित हो गये थे, तब मैंने इसकी कही हुई सच्ची बातें बताकर उन्हें किसी प्रकार समझा-बुझाकर शान्त किया।

सोऽप्येनामनिशं दृष्ट्वा मनसैवाभ्यनन्दत ॥ भयाद् गन्धर्वमुख्यानां जीवितस्योपघातिनाम् । मनसापि ततस्त्वेनां न चिन्तयति पार्थिवः ॥ तबसे वे भी सदा इसे देखकर मन-ही-मन इसका अभिनन्दन करते हैं। जीवनका विनाश करनेवाले उन श्रेष्ठ गन्धर्वोंके भयसे महाराज कभी मनसे भी इसका चिन्तन नहीं करते हैं।

ते हि क्रुद्धा महात्मानो गरुडानिलतेजसः । दहेयुरपि लोकांस्त्रीन् युगान्तेष्विव भास्कराः ॥ वे महात्मा गन्धर्व गरुड़ और वायुके समान तेजस्वी हैं। वे कुपित होनेपर प्रलयकालके सूर्योंकी भाँति तीनों लोकोंको दग्ध कर सकते हैं।

सैरन्ध्रया ह्येतदाख्यातं मम तेषां महद् बलम् । तव चाहमिदं गुह्यं स्नेहादाख्यामि बन्धुवत् ॥ सैरन्ध्रीने स्वयं ही मुझसे उनके महान् बलका परिचय दिया है। भ्रातृस्नेहके कारण मैंने तुमसे यह गोपनीय बात भी बता दी है।

मा गमिष्यसि वै कृच्छ्रां गतिं परमदुर्गमाम् । बलिनस्ते रुजं कुर्युः कुलस्य च धनस्य च ॥ इसे ध्यानमें रखनेसे तुम अत्यन्त दुःखदायिनी संकटपूर्ण परिस्थितिमें नहीं पड़ोगे। गन्धर्वलोग बलवान् हैं। वे तुम्हारे कुल और सम्पत्तिका भी नाश कर सकते हैं।

तस्मान्नास्यां मनः कर्तुं यदि प्राणाः प्रियास्तव । मा चिन्तयेथा मा गास्त्वं मत्प्रियं च यदिच्छसि ॥ इसलिये यदि तुम्हें अपने प्राण प्रिय हैं और यदि तुम मेरा भी प्रिय करना चाहते हो तो इस सैरन्ध्रीमें मन न लगाओ। उसका चिन्तन छोड़ दो और उसके पास कभी न जाओ।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु दुष्टात्मा भगिनीं कीचकोऽब्रवीत् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! सुदेष्णाके ऐसा कहनेपर दुष्टात्मा कीचक अपनी बहिनसे बोला।

कीचक उवाच

गन्धर्वाणां शतं वापि सहस्रमयुतानि वा ॥
अहमेको हनिष्यामि गन्धर्वान् पञ्च किं पुनः ।
**कीचकने कहा—**बहिन! मैं सैकड़ों, सहस्रों तथा अयुत गन्धर्वोंको भी अकेला ही मार गिराऊँगा, फिर पाँचकी तो बात ही क्या है?

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ता सुदेष्णा तु शोकेनाभिप्रपीडिता ॥
अहो दुःखमहो कृच्छ्रमहो पापमिति स्म ह ।
प्रारुदद् भृशदुःखार्ता विपाकं तस्य वीक्ष्य सा ॥
पातालेषु पतत्येष विलपन् वडवामुखे ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कीचकके ऐसा कहनेपर सुदेष्णा शोकसे अत्यन्त व्यथित हो उठी और मन-ही-मन कहने लगी—‘अहो! यह महान् दुःख, महान् संकट और महान् पापकी बात हो रही है।' इस कर्मके भावी परिणामपर दृष्टिपात करके वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रोने लगी और मन-ही-मन बोली—'मेरा यह भाई तो ऊटपटाँग बातें बोलकर स्वयं ही पाताल अथवा बड़वानलके मुखमें गिर रहा है'। (तत्पश्चात् वह कीचकको सुनाकर कहने लगी—)

त्वत्कृते विनशिष्यन्ति भ्रातरः सुहृदश्च मे ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं यत् त्वमेवमभिप्लुतः ।
न च श्रेयोऽभिजानीषे काममेवानुवर्तसे ॥
‘मैं देखती हूँ; तेरे कारण मेरे सभी भाई और सुहृद् नष्ट हो जायँगे। तू ऐसी अनुचित इच्छाको अपने मनमें स्थान दे रहा है; मैं इसके लिये क्या कर सकती हूँ? अपनी भलाई किस बातमें है, यह तू नहीं समझता है और केवल कामका ही गुलाम हो रहा है।

ध्रुवं गतायुस्त्वं पाप यदेवं काममोहितः ।
अकर्तव्ये हि मां पापे नियुनङ्क्षि नराधम ॥
‘पापी! निश्चय ही तेरी आयु समाप्त हो गयी है; तभी तू इस प्रकार कामसे मोहित हो रहा है। नराधम! तू मुझे ऐसे पापपूर्ण कार्यमें लगा रहा है, जो कदापि करने योग्य नहीं है।

अपि चैतत् पुरा प्रोक्तं निपुणैर्मनुजोत्तमैः ।
एकस्तु कुरुते पापं स्वजातिस्तेन हन्यते ॥

'प्राचीनकालके श्रेष्ठ एवं कुशल मनुष्योंने यह ठीक ही कहा है कि कुलमें एक मनुष्य पाप करता है और उसके कारण सभी जाति-भाई मारे जाते हैं।

गतस्त्वं धर्मराजस्य विषयं नात्र संशयः ।
अदूषकमिमं सर्वं स्वजनं घातयिष्यसि ॥
'तू यमराजके लोकमें गया हुआ ही है, इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं रह गया है। तू अपने साथ इन समस्त निरपराध स्वजनोंको भी मरवा डालेगा।

एतत् तु मे दुःखतरं येनाहं भ्रातृसौहृदात् ।
विदितार्था करिष्यामि तुष्टो भव कुलक्षयात् ॥)
'मेरे लिये सबसे महान् दुःखकी बात यह है कि मैं सारे परिणामोंको समझ-बूझकर भी भ्रातृ-स्नेहके कारण तेरी आज्ञाका पालन करूँगी। तू अपने कुलका संहार करके संतुष्ट हो ले'।

स्वमन्त्रमभिसंधाय तस्यार्थमनुचिन्त्य च ।
उद्योगं चैव कृष्णायाः सुदेष्णा सूतमब्रवीत् ॥ ४ ॥
तदनन्तर सुदेष्णाने अपने कार्यका विचार करके कीचकके मनोभावपर ध्यान दिया और फिर उसे द्रौपदीकी प्राप्ति करानेके लिये उचित उपायका निश्चय करके उसने सूतसे कहा— ॥ ४ ॥

पर्वणि त्वं समुद्दिश्य सुरामन्नं च कारय ।
तत्रैनां प्रेषयिष्यामि सुराहारीं तवान्तिकम् ॥ ५ ॥
'कीचक! तुम किसी पर्व या त्यौहारके दिन अपने घरमें मदिरा तथा अन्न-भोजनकी सामग्री तैयार कराओ। फिर मैं इस सैरन्ध्रीको वहाँसे सुरा ले आनेके बहाने तुम्हारे पास भेजूँगी ॥ ५ ॥

तत्र सम्प्रेषितामेनां विजने निरवग्रहे ।
सान्त्वयेथा यथाकामं सान्त्व्यमाना रमेद् यदि ॥ ६ ॥
'वहाँ भेजी हुई इस सेविकाको एकान्तमें, जहाँ कोई विघ्न-बाधा न हो, अपनी इच्छाके अनुसार समझाना-बुझाना। सम्भव है, तुम्हारी सान्त्वना मिलनेपर यह रमणके लिये उद्यत हो जाय' ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स विनिष्क्रम्य भगिन्या वचनात् तदा ।
सुरामाहारयामास राजार्हां सुपरिष्कृताम् ॥ ७ ॥
भक्ष्यांश्च विविधाकारान् बहूंश्रोच्चावचांस्तदा ।
कारयामास कुशलैरन्नं पानं सुशोभनम् ॥ ८ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! बहिनके वचनसे इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर कीचक उस समय वहाँसे चला गया और घर जाकर उसने यथासमय चतुर रसोइयोंके द्वारा राजाओंके उपयोगमें आने योग्य उत्तम एवं परिष्कृत मदिरा मँगवायी और भाँति-भाँतिके अनेक विशिष्ट और साधारण भक्ष्य पदार्थ एवं परम उत्तम अन्न-पानकी तैयारी करायी।। ७-८।।

तस्मिन् कृते तदा देवी कीचकेनोपमन्त्रिता।
उसकी व्यवस्था हो जानेपर कीचकने सुदेष्णाको भोजनके लिये आमन्त्रित किया।। ८ ½ ।।

(त्वरावान् कालपाशेन कण्ठे बद्धः पशुर्यथा।
नावबुध्यत मूढात्मा मरणं समुपस्थितम्।।
मूढात्मा कीचक कण्ठमें कालपाशसे बँधे हुए पशुकी भाँति अपने निकट आयी हुई मृत्युको नहीं जान पाता था। वह द्रौपदीको पानेके लिये उतावला हो रहा था।

कीचक उवाच

मधु मद्यं बहुविधं भक्ष्याश्च विविधाः कृताः।
सुदेष्णे ब्रूहि सैरन्ध्रीं यथा सा मे गृहं व्रजेत्।।
**कीचक बोला—**सुदेष्णे! मैंने नाना प्रकारकी मीठी मदिरा मँगा ली है और विविध प्रकारकी रसोई भी तैयार कर ली है। अब तुम सैरन्ध्रीसे कह दो, जिससे वह मेरे घरमें पधारे।

केनचित् त्वद्य कार्येण त्वर शीघ्रं मम प्रियम्।।
अहं हि शरणं देवं प्रपद्ये वृषभध्वजम्।
समागमं मे सैरन्ध्र्या मरणं वा दिशेति वै।।
किसी कामके बहाने उसे जल्दी मेरे यहाँ भेजो। मेरा प्रिय कार्य सिद्ध करनेमें शीघ्रता करो। मैं भगवान् शंकरकी शरण लेकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रभो! मुझे सैरन्ध्रीसे मिला दो अथवा मृत्यु प्रदान करो।

वैशम्पायन उवाच

सा तमाह विनिःश्वस्य प्रतिगच्छ स्वकं गृहम्।
एषाहमपि सैरन्ध्रीं सुरार्थं तूर्णमादिशे।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब सुदेष्णा लंबी साँस खींचकर उससे बोली—'तुम अपने घर लौट जाओ। मैं सैरन्ध्रीको शीघ्र ही वहाँसे मदिरा ले आनेके लिये आज्ञा देती हूँ'।

एवमुक्तस्तु पापात्मा कीचकस्त्वरितः पुनः।
स्वगृहं प्राविशत् तूर्णं सैरन्ध्रीगतमानसः।।)

उसके ऐसा कहनेपर सैरन्ध्रीका चिन्तन करता हुआ पापात्मा कीचक फिर तुरंत ही अपने घरको लौट गया।

सुदेष्णा प्रेषयामास सैरन्ध्रीं कीचकालयम् ॥ ९ ॥
तब सुदेष्णाने सैरन्ध्रीको कीचकके घर जानेके लिये कहा ॥ ९ ॥

सुदेष्णोवाच

उत्तिष्ठ गच्छ सैरन्धि्र कीचकस्य निवेशनम् ।
पानमानय कल्याणि पिपासा मां प्रबाधते ॥ १० ॥
**सुदेष्णा बोली—**सैरन्ध्री! उठो और कीचकके घर जाओ। कल्याणी! मुझे प्यास विशेष कष्ट दे रही है; अतः वहाँसे मेरे पीने योग्य रस ले आओ ॥ १० ॥

सैरन्ध्र्युवाच

न गच्छेयमहं तस्य राजपुत्रि निवेशनम् ।
त्वमेव राज्ञि जानासि यथा स निरपत्रपः ॥ ११ ॥
**सैरन्ध्रीने कहा—**राजकुमारी! मैं उसके घर नहीं जा सकती। महारानी! आप तो जानती ही हैं कि वह कैसा निर्लज्ज है ॥ ११ ॥

न चाहमनवद्याङ्गि तव वेश्मनि भामिनि ।
कामवृत्ता भविष्यामि पतीनां व्यभिचारिणी ॥ १२ ॥
निर्दोष अंगोंवाली देवि! मैं आपके महलमें अपने पतियोंकी दृष्टिमें व्यभिचारिणी और स्वेच्छाचारिणी होकर नहीं रहूँगी ॥ १२ ॥

त्वं चैव देवि जानासि यथा स समयः कृतः ।
प्रविशन्त्या मया पूर्वं तव वेश्मनि भामिनि ॥ १३ ॥
भामिनि! देवि! पहले आपके इस राजभवनमें प्रवेश करते समय मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे भी आप जानती ही हैं ॥ १३ ॥

कीचकस्तु सुकेशान्ते मूढो मदनदर्पितः ।
सोऽवमंस्यति मां दृष्ट्वा न यास्ये तत्र शोभने ॥ १४ ॥
कमनीय केशोंवाली सुन्दरी! मूर्ख कीचक तो काम-मदसे उन्मत्त हो रहा है। वह मुझे देखते ही अपमानित कर बैठेगा। इसलिये मैं वहाँ नहीं जाऊँगी ॥ १४ ॥

सन्ति बह्व्यस्तव प्रेष्या राजपुत्रि वशानुगाः ।
अन्यां प्रेष्य भद्रं ते स हि मामवमंस्यते ॥ १५ ॥
राजपुत्री! आपके अधीन तो और भी बहुत-सी दासियाँ हैं; उन्हींमेंसे किसी दूसरीको भेज दीजिये। आपका कल्याण हो। मेरे जानेसे कीचक मेरा अपमान करेगा ॥ १५ ॥

सुदेष्णोवाच

नैव त्वां जातु हिंस्यात् स इतः सम्प्रेषितां मया ।
इत्युक्त्वा प्रददौ पात्रं सपिधानं हिरण्मयम् ॥ १६ ॥
**सुदेष्णा बोली—**शुभे! मैंने तुम्हें यहाँसे भेजा है, अतः वह कभी तुम्हें कष्ट नहीं देगा। यह कहकर सुदेष्णाने द्रौपदीके हाथमें ढक्कनसहित एक सुवर्णमय पात्र दे दिया ॥ १६ ॥
सा शङ्कमाना रुदती दैवं शरणमीयुषी ।
प्रातिष्ठत सुराहारी कीचकस्य निवेशनम् ॥ १७ ॥
द्रौपदी मदिरा लानेके लिये उस पात्रको लेकर शंकित हो रोती हुई कीचकके घरकी ओर चली और अपने सतीत्वकी रक्षाके लिये मन-ही-मन भगवान् सूर्यकी शरणमें गयी ॥ १७ ॥

सैरन्ध्र्युवाच

यथाहमन्यं भर्तृभ्यो नाभिजानामि कंचन ।
तेन सत्येन मां प्राप्तां मा कुर्यात् कीचको वशे ॥ १८ ॥
**सैरन्ध्रीने कहा—**भगवन्! यदि मैं अपने पतियोंके सिवा दूसरे किसी पुरुषको मनमें नहीं लाती, तो इस सत्यके प्रभावसे कीचक अपने घरमें आयी हुई मुझ अबलाको अपने वशमें न कर सके ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

उपातिष्ठत सा सूर्यं मुहूर्तमबला ततः ।
स तस्यास्तनुमध्यायाः सर्वं सूर्योऽवबुद्धवान् ॥ १९ ॥
अन्तर्हितं ततस्तस्या रक्षो रक्षार्थमादिशत् ।
तच्चैनां नाजहात् तत्र सर्वावस्थास्वनिन्दिताम् ॥ २० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सब प्रकारके बलसे रहित द्रौपदी दो घड़ीतक भगवान् सूर्यकी उपासना करती रही। तदनन्तर श्रीसूर्यदेवने पतले कटिभागवाली द्रुपदकुमारीकी सारी परिस्थिति समझ ली और उसकी रक्षाके लिये अदृश्यरूपसे एक राक्षसको नियुक्त कर दिया। वह राक्षस किसी भी अवस्थामें सती-साध्वी द्रौपदीको वहाँ असहाय नहीं छोड़ता था ॥ १९-२० ॥
तां मृगीमिव संत्रस्तां दृष्ट्वा कृष्णां समीपगाम् ।
उदतिष्ठन्मुदा सूतो नावं लब्ध्वेव पारगः ॥ २१ ॥
डरी हुई हरिणीकी भाँति भयभीत द्रौपदीको समीप आयी देख सूत कीचक आनन्दमें भरकर खड़ा हो गया; मानो नदीके पार जानेवाला पथिक नौका पाकर प्रसन्न हो गया हो ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीसुराहरणे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीके द्वारा मदिरानयनसम्बन्धी पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २५ श्लोक मिलाकर कुल ४६ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2225)

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षोडशोऽध्यायः

कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान

कीचक उवाच

स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम ।
स्वामिनी त्वमनुप्राप्ता प्रकुरुष्व मम प्रियम् ॥ १ ॥
कीचकने कहा— सुन्दर अलकोंवाली सैरन्ध्री! तुम्हारा स्वागत है। आजकी रातका प्रभात मेरे लिये बड़ा मंगलमय है। अब तुम मेरी स्वामिनी होकर मेरा प्रिय कार्य करो ॥ १ ॥

सुवर्णमालाः कम्बुश्च कुण्डले परिहाटके ।
नानापत्तनजे शुभ्रे मणिरत्नं च शोभनम् ॥ २ ॥
आहरन्तु च वस्त्राणि कौशिकान्यजिनानि च ।
मैं दासियोंको आज्ञा देता हूँ; वे तुम्हारे लिये सोनेके हार, शंखकी चूड़ियाँ, विभिन्न नगरोंमें बने हुए शुभ्र सुवर्णमय कर्णफूलके जोड़े, सुन्दर मणि-रत्नमय आभूषण, रेशमी साड़ियाँ तथा मृगचर्म आदि ले आवें ॥

अस्ति मे शयनं दिव्यं त्वदर्थमुपकल्पितम् ।
एहि तत्र मया सार्धं पिबस्व मधुमाधवीम् ॥ ३ ॥
मैंने तुम्हारे लिये पहलेसे ही यह दिव्य शय्या बिछा रखी है। आओ, यहाँ मेरे साथ बैठकर मधुर माध्वीरसका पान करो ॥ ३ ॥

द्रौपद्युवाच

(नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुं निषादेनेव ब्राह्मणी ।
मा गमिष्यसि दुर्बुद्धे गतिं दुर्गान्तरात्तराम् ॥
द्रौपदी बोली— दुर्बुद्धे! जैसे निषाद ब्राह्मणीका स्पर्श नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम भी मुझे छू नहीं सकते। तुम मेरा तिरस्कार करके भारी-से-भारी दुर्गतिमें न पड़ो।

यत्र गच्छन्ति बहवः परदाराभिमर्शकाः ।
नराः सम्भिन्नमर्यादाः कीटवच्च गुहाशयाः ॥)
उस दुरवस्थामें न जाओ, जहाँ धर्ममर्यादाका छेदन करनेवाले बहुत-से परस्त्रीगामी मनुष्य बिलमें सोनेवाले कीड़ोंकी भाँति जाया करते हैं।

अप्रैषीद् राजपुत्री मां सुराहारीं तवान्तिकम् ।
पानमाहर मे क्षिप्रं पिपासा मेऽति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥

राजकुमारी सुदेष्णाने मुझे मदिरा लानेके लिये तुम्हारे पास भेजा है। उनका कहना है—‘मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी है; अतः शीघ्र मेरे लिये पीने योग्य रस ले आओ' ॥ ४ ॥

कीचक उवाच

अन्या भद्रे नयिष्यन्ति राजपुत्र्याः प्रतिश्रुतम् ।
इत्येतां दक्षिणे पाणौ सूतपुत्रः परामृशत् ॥ ५ ॥
कीचकने कहा—कल्याणी! राजपुत्री सुदेष्णाकी मँगायी हुई वस्तु दूसरी दासियाँ पहुँचा देंगी। ऐसा कहकर सूतपुत्रने द्रौपदीका दाहिना हाथ पकड़ लिया ॥ ५ ॥

द्रौपद्युवाच

यथैवाहं नाभिचरे कदाचित्
पतीन् मदाद् वै मनसापि जातु ।
तेनैव सत्येन वशीकृतं त्वां
द्रष्टास्मि पापं परिकृष्यमाणम् ॥ ६ ॥
द्रौपदी बोली—ओ पापी! यदि मैंने आजतक कभी मनसे भी अभिमानवश अपने पतियोंके विरुद्ध आचरण न किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे मैं देखूँगी कि तू शत्रुके अधीन होकर पृथ्वीपर घसीटा जा रहा है ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

स तामभिप्रेक्ष्य विशालनेत्रां
जिघृक्षमाणः परिभर्त्सयन्तीम् ।
जग्राह तामुत्तरवस्त्रदेशे
स कीचकस्तां सहसाऽऽक्षिपन्तीम् ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! बड़े-बड़े नेत्रोंवाली द्रौपदीको इस प्रकार फटकारती देख कीचकने उसे पकड़ लेनेकी इच्छा की; किंतु वह सहसा झटका देकर पीछेकी ओर हटने लगी; इतनेमें ही झपटकर कीचकने उसके दुपट्टेका छोर पकड़ लिया ॥ ७ ॥

प्रगृह्यमाणा तु महाजवेन
मुहुर्विनिःश्वस्य च राजपुत्री ।
तया समाक्षिप्ततनुः स पापः
पपात शाखीव निकृत्तमूलः ॥ ८ ॥
अब वह बड़े वेगसे उसे काबूमें लानेका प्रयत्न करने लगा। इधर राजकुमारी द्रौपदी बारंबार लंबी साँसें भरती हुई उससे छूटनेका प्रयत्न करने लगी। उसने सँभलकर दोनों हाथोंसे कीचकको बड़े जोरका धक्का दिया; जिससे वह पापी जड़—मूलसे कटे वृक्षकी भाँति (धम्मसे) जमीनपर जा गिरा ॥ ८ ॥

सा गृहीता विधुन्वाना भूमावाक्षिप्य कीचकम् ।
सभां शरणमागच्छद् यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
इस प्रकार पकड़में आनेपर कीचकको धरतीपर गिराकर भयसे काँपती हुई द्रौपदीने भागकर उस राज-सभाकी शरण ली, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ॥ ९ ॥

तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपाशे परामृशत् ।
अथैनां पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदावधीत् ॥ १० ॥
कीचकने भी उठकर भागती हुई द्रौपदीका पीछा किया और उसका केशपाश पकड़ लिया। फिर उसने राजाके देखते-देखते उसे पृथ्वीपर गिराकर लात मारी ॥ १० ॥

तस्य योऽसौ तदार्केण राक्षसः संनियोजितः ।
स कीचकमपोवाह वातवेगेन भारत ॥ ११ ॥
भारत! इतनेमें ही भगवान् सूर्यने जिस राक्षसको द्रौपदीकी रक्षाके लिये नियुक्त कर रखा था, उसने कीचकको पकड़कर आँधीके समान वेगसे दूर फेंक दिया ॥ ११ ॥

स पपात तदा भूमौ रक्षोबलसमाहतः ।
विघूर्णमानो निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १२ ॥
राक्षसद्वारा बलपूर्वक आहत होकर कीचकके सारे शरीरमें चक्कर आ गया और वह जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १२ ॥

(सभायां पश्यतो राज्ञो विराटस्य महात्मनः ।
ब्राह्मणानां च वृद्धानां क्षत्रियाणां च पश्यताम् ॥
तस्याः पादाभितप्ताया मुखाद् रुधिरमास्रवत् ।
तां दृष्ट्वा तत्र ते सभ्या हाहाभूताः समन्ततः ॥
न युक्तं सूतपुत्रेति कीचकेति च मानवाः ।
किमियं वध्यते बाला कृपणा चाप्यबान्धवा ॥)
सभामें महामना राजा विराटके तथा वृद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके देखते-देखते कीचकके पादप्रहारसे पीड़ित हुई द्रौपदीके मुँहसे रक्त बहने लगा। उसे उस अवस्थामें देखकर समस्त सभासद् सब ओरसे हाहाकार कर उठे और सब लोग कहने लगे—'सूतपुत्र कीचक! तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं है। यह बेचारी अबला अपने बन्धु-बान्धवोंसे रहित है। इसे क्यों पीड़ा दे रहे हो?'

तां चासीनौ ददृशतुर्भीमसेनयुधिष्ठिरौ ।
अमृष्यमाणौ कृष्णायाः कीचकेन पराभवम् ॥ १३ ॥
उस समय भीमसेन और युधिष्ठिर भी राजसभामें बैठे हुए थे। उन्होंने कीचकके द्वारा द्रौपदीका यह अपमान अपनी आँखों देखा; जिसे वे सहन न कर सके ॥ १३ ॥

तस्य भीमो वधं प्रेप्सुः कीचकस्य दुरात्मनः ।
दन्तैर्दन्तांस्तदा रोषान्निष्पिपे ष महामनाः ॥ १४ ॥

महामना भीमसेन दुरात्मा कीचकको मार डालनेकी इच्छासे उस समय रोषवश दाँतोंसे दाँत पीसने लगे ॥ १४ ॥

धूमच्छाया ह्यभजतां नेत्रे चोच्छ्रितपक्ष्मणी ।
सस्वेदा भृकुटी चोग्रा ललाटे समवर्तत ॥ १५ ॥
उनकी आँखोंकी पलकें ऊपरको उठकर तन गयीं। उनमें धुआँ-सा छा गया, ललाटमें पसीना निकल आया और भौंहें टेढ़ी होकर भयंकर प्रतीत होने लगीं ॥ १५ ॥

हस्तेन ममृजे चैव ललाटं परवीरहा ।
भूयश्च त्वरितः क्रुद्धः सहसोत्थातुमैच्छत ॥ १६ ॥
शत्रुहन्ता भीम हाथसे माथेका पसीना पोंछने लगे। फिर तुरंत ही प्रचण्ड कोपमें भर गये और सहसा उठनेकी इच्छा करने लगे ॥ १६ ॥

अथावमृद्नादङ्गुष्ठमङ्गुष्ठेन युधिष्ठिरः ।
प्रबोधनभयाद् राजा भीमं तं प्रत्यषेधयत् ॥ १७ ॥
तब राजा युधिष्ठिरने रहस्य प्रकट हो जानेके डरसे अपने अँगूठेसे भीमका अँगूठा दबाया और इस प्रकार उन्हें उत्तेजित होनेसे रोका ॥ १७ ॥

तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम् ।
स तमावारयामास भीमसेनं युधिष्ठिरः ॥ १८ ॥
भीमसेन मतवाले गजराजकी भाँति एक वृक्षकी ओर देख रहे थे। तब युधिष्ठिरने उन्हें रोकते हुए कहा— ॥

अध्याय (पृष्ठ 2229)

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विराटकी राजसभामें कीचकद्वारा सैरन्ध्रीका अपमान

आलोकयसि किं वृक्षं सूद दारुकृतेन वै।