भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2288, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2288

करने लगे ॥ ५६ ॥ वेगेनाभिहतो भीमः कीचकेन बलीयसा । स्थिरप्रतिज्ञः स रणे पदान्न चलितः पदम् ॥ ५७ ॥ बलिष्ठ कीचकने बड़े वेगसे आघात किया, तो भी दृढ़प्रतिज्ञ भीम उस युद्धमें स्थिर रहे; एक पग भी पीछे नहीं हटे ॥ ५७ ॥ तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् । उभावपि प्रकाशेते प्रवृद्धौ वृषभाविव ॥ ५८ ॥ फिर दोनों आपसमें गुँथ गये और एक-दूसरेको खींचने लगे। उस समय वे दो हृष्ट-पुष्ट साँड़ोंकी भाँति सुशोभित होते थे ॥ ५८ ॥ तयोर्ह्यासीत् सुतुमुलः सम्प्रहारः सुदारुणः । नखदन्तायुधवतोर्व्याघ्रयोरिव दृप्तयोः ॥ ५९ ॥ नख और दाँत ही उनके आयुध थे। जैसे दो मतवाले व्याघ्र परस्पर लड़ रहे हों, उसी प्रकार उनमें अत्यन्त भयंकर तुमुल युद्ध होने लगा ॥ ५९ ॥ अभिपत्याथ बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः । मातङ्ग इव मातङ्गं प्रभिन्नकरटामुखम् ॥ ६० ॥ जैसे क्रोधमें भरा हुआ एक हाथी गण्डस्थलसे मद टपकाते हुए दूसरे हाथीको सूँड़से पकड़ ले, उसी प्रकार रोषयुक्त कीचकने सहसा झपटकर दोनों हाथोंसे भीमसेनको पकड़ लिया ॥ ६० ॥ स चाप्येनं तदा भीमः प्रतिजग्राह वीर्यवान् । तमाक्षिपत् कीचकोऽथ बलेन बलिनां वरः ॥ ६१ ॥ तब पराक्रमी भीमने भी झपटकर उसे पकड़ा, किंतु बलवानोंमें श्रेष्ठ कीचकने बलपूर्वक उन्हें झटक दिया ॥ ६१ ॥ तयोर्भुजविनिष्पेषामुभयोर्बलिनोस्तदा । शब्दः समभवद् घोरो वेणुस्फोटसमो युधि ॥ ६२ ॥ उस समय उस युद्धमें उन दोनों बलवानोंकी भुजाओंकी रगड़से बाँस फटनेका-सा भयानक शब्द होने लगा ॥ ६२ ॥ अथैनमाक्षिप्य बलाद् गृहमध्ये वृकोदरः । धूनयामास वेगेन वायुश्चण्ड इव द्रुमम् ॥ ६३ ॥ फिर जिस प्रकार प्रचण्ड आँधी वृक्षको झकझोर डालती है, उसी प्रकार भीमसेन कीचकको बलपूर्वक धक्के दे-देकर उसे नृत्यशालामें वेगसे घुमाने लगे ॥ ६३ ॥ भीमेन च परामृष्टो दुर्बलो बलिना रणे । प्रास्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ॥ ६४ ॥