भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2289

उस युद्धमें बलवान् भीमकी पकड़में आकर यद्यपि कीचक अपना बल खो रहा था, तथापि वह यथाशक्ति उन्हें परास्त करनेकी चेष्टा करता रहा और भीमसेनको अपनी ओर खींचने लगा ।। ६४ ।। ईषदाकलितं चापि क्रोधाद् द्रुतपदं स्थितम् । कीचको बलवान् भीमं जानुभ्यामाक्षिपद् भुवि ॥ ६५ ॥ जब वे कुछ-कुछ वशमें आ गये और उनका पैर कुछ लड़खड़ाने लगा, तब उस दशामें खड़े हुए भीमसेनको बलवान् कीचकने क्रोधपूर्वक दोनों घुटनोंसे मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया ।। ६५ ।। पातितो भुवि भीमस्तु कीचकेन बलीयसा । उत्पपाताथ वेगेन दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ६६ ॥ अत्यन्त बलशाली कीचकद्वारा इस प्रकार भूमिपर गिराये हुए भीमसेन हाथमें दण्ड धारण करनेवाले यमराजकी भाँति बड़े वेगसे उछलकर खड़े हो गये ।। ६६ ।। स्पर्धया च बलोन्मत्तौ तावुभौ सूतपाण्डवौ । निशीथे पर्यकर्षेतां बलिनौ निर्जने स्थले ॥ ६७ ॥ सूतपुत्र और पाण्डुनन्दन दोनों बलसे उन्मत्त हो रहे थे। वे दोनों बलवान् वीर स्पर्धाके कारण उस निर्जन स्थानमें आधी रातके समय एक-दूसरेको खींचते और धक्के देते रहे ।। ६७ ।। ततस्तद् भवनं श्रेष्ठं प्राकम्पत मुहुर्मुहुः । बलवच्चापि संक्रुद्धावन्योन्यं प्रति गर्जतः ॥ ६८ ॥ इससे वह विशाल भवन बार-बार हिल उठता था। दोनों योद्धा बड़े क्रोधमें भरकर एक-दूसरेके सामने जोर-जोरसे गरज रहे थे ।। ६८ ।। तलाभ्यां स तु भीमेन वक्षस्यभिहतो बली । कीचको रोषसंतप्तः पदान्न चलितः पदम् ॥ ६९ ॥ इतनेमें ही भीमने दोनों हथेलियोंसे कीचककी छातीपर प्रहार किया। चोट खाकर बलवान् कीचक क्रोधसे जल उठा, किंतु अपने स्थानसे एक पग भी विचलित नहीं हुआ ।। ६९ ।। मुहूर्तं तु स तं वेगं सहित्वा भुवि दुःसहम् । बलादहीयत तदा सूतो भीमबलार्दितः ॥ ७० ॥ भूमिपर खड़े रहकर दो घड़ीतक उस दुःसह वेगको सह लेनेके पश्चात् भीमसेनके बलसे पीड़ित हो सूतपुत्र कीचक अपनी शक्ति खो बैठा ।। ७० ।। तं हीयमानं विज्ञाय भीमसेनो महाबलः । वक्षस्यानीय वेगेन ममर्देनं विचेतसम् ॥ ७१ ॥