महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातृभार्यापहारिणम्। शान्तिं लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रिकण्टकम्॥ ७९॥ ‘जो सैरन्ध्रीके लिये कण्टक था, जिसने मेरे भाईकी पत्नीका अपहरण करनेकी चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचकको मारकर आज मैं उऋण हो जाऊँगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी’॥ ७९॥ इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- स्तं कीचकं क्रोधसरागनेत्रः। आस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त- मुद्भ्रान्तनेत्रं व्यसुमुत्ससर्ज॥ ८०॥ पुरुषोंमें उत्कृष्ट वीर भीमसेनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। उन्होंने उपर्युक्त बातें कहकर कीचकको नीचे डाल दिया। उस समय उसके गहने-कपड़े इधर-उधर बिखर गये थे। वह छटपटा रहा था। उसकी आँखें ऊपरको चढ़ गयी थीं और उसके प्राणपखेरू निकल रहे थे॥ ८०॥ निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदष्टौष्ठपुटं बली। समाक्रम्य च संक्रुद्धो बलेन बलिनां वरः॥ ८१॥ बलवानोंमें श्रेष्ठ भीम अब भी क्रोधमें भरे थे। वे हाथसे हाथ मलते हुए दाँतोंसे ओठ दबाकर पुनः बलपूर्वक कीचकके ऊपर चढ़ गये॥ ८१॥ तस्य पादौ च पाणी च शिरो ग्रीवां च सर्वशः। काये प्रवेशयामास पशोरिव पिनाकधृक्॥ ८२॥ तदनन्तर जैसे महादेवजीने गयासुरके सब अंगोंको उसके शरीरके भीतर घुसेड़ दिया था, उसी प्रकार उन्होंने भी कीचकके हाथ, पैर, सिर और गर्दन आदि सब अंगोंको उसके धड़में ही घुसा दिया॥ ८२॥ तं सम्मथितसर्वाङ्गं मांसपिण्डोपमं कृतम्। कृष्णाया दर्शयामास भीमसेनो महाबलः॥ ८३॥ महाबली भीमने उसका सारा शरीर मथ डाला और उसे मांसका लोंदा-सा बना दिया। इसके बाद उन्होंने द्रौपदीको दिखाया॥ ८३॥ उवाच च महातेजा द्रौपदीं योषितां वराम्। पश्यैनमेहि पाञ्चालि कामुकोऽयं यथा कृतः॥ ८४॥ उस समय महातेजस्वी भीमने युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदीसे कहा—‘पांचालि! यहाँ आओ और इसे देखो। इस कामीकी शक्ल कैसी बना दी है!’॥ ८४॥ एवमुक्त्वा महाराज भीमो भीमपराक्रमः। पादेन पीडयामास तस्य कायं दुरात्मनः॥ ८५॥