महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! भयंकर पराक्रमी भीमने ऐसा कहकर उस दुरात्माकी लाशको पैरसे दबाया ॥ ८५ ॥
ततोऽग्निं तत्र प्रज्वाल्य दर्शयित्वा तु कीचकम् । पाञ्चालीं स तदा वीर इदं वचनमब्रवीत् ॥ ८६ ॥ फिर वहाँ आग जलाकर उन्होंने कीचकका शव दिखाया। उस समय वीरवर भीमने पांचालीसे यह बात कही— ॥ ८६ ॥
प्रार्थयन्ति सुकेशान्ते ये त्वां शीलगुणान्विताम् । एवं ते भीरु वध्यन्ते कीचकः शोभते यथा ॥ ८७ ॥ ‘सुन्दर केशोंवाली भीरु पांचाली! तुम सुशील और सद्गुणोंसे सम्पन्न हो। जो दुष्ट तुमसे समागमकी याचना करेंगे, वे इसी प्रकार मारे जायेंगे। जैसे आज कीचक शोभा पाता है, वही दशा उनकी भी होगी’ ॥ ८७ ॥
तत् कृत्वा दुष्करं कर्म कृष्णायाः प्रियमुत्तमम् । तथा स कीचकं हत्वा गत्वा रोषस्य वै शमम् ॥ ८८ ॥ आमन्त्र्य द्रौपदीं कृष्णां क्षिप्रमायान्महानसम् । कीचकं घातयित्वा तु द्रौपदी योषितां वरा । प्रहृष्टा गतसंतापा सभापालानुवाच ह ॥ ८९ ॥ द्रौपदीको प्रिय लगनेवाले इस उत्तम एवं दुष्कर कर्मको करके ऊपर बताये अनुसार कीचकको मारकर अपना रोष शान्त करनेके पश्चात् द्रौपदीसे पूछकर भीमसेन पुनः पाकशालामें चले गये। युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदी इस प्रकार कीचकको मरवाकर बड़ी प्रसन्न हुई। उसके सब संताप दूर हो गये। फिर वह सभाभवनके रक्षकोंके पास जाकर बोली— ॥ ८८-८९ ॥
कीचकोऽयं हतः शेते गन्धर्वैः पतिभिर्मम । परस्त्रीकामसम्मत्तस्तत्रागच्छत पश्यत ॥ ९० ॥ ‘आओ, देखो, ‘परायी स्त्रीके प्रति कामोन्मत्त रहनेवाला यह कीचक मेरे पति गन्धर्वोंद्वारा मारा जाकर वहाँ नृत्यशालामें पड़ा है’ ॥ ९० ॥
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या नर्तनागाररक्षिणः । सहसैव समाजग्मुरादायोल्काः सहस्रशः ॥ ९१ ॥ उसका यह कथन सुनकर नृत्यशालाके रक्षक सहस्रोंकी संख्यामें हाथोंमें मसाल लिये सहसा वहाँ आये ॥ ९१ ॥
ततो गत्वाथ तद् वेश्म कीचकं विनिपातितम् । गतासुं ददृशुर्भूमौ रुधिरेण समुक्षितम् ॥ ९२ ॥ और उस घरके भीतर जाकर उन्होंने देखा; कीचकको गन्धर्वने मार गिराया है, उसके प्राण निकल गये हैं और उसकी लाश खूनसे लथपथ होकर धरतीपर पड़ी है ॥ ९२ ॥