महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2295, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपोथितं भीमसेनेन तमिन्द्रेणेव दानवम् । संस्कारयितुमिच्छन्तो बहिर्नेतुं प्रचक्रमुः ॥ ३ ॥ जैसे इन्द्रने दानव वृत्रासुरका वध किया था, उसी प्रकार भीमसेनके हाथसे मारे गये उस कीचकका दाह-संस्कार करनेकी इच्छासे उसके बान्धवगण उसे बाहर (श्मशानभूमिमें) ले जानेकी तैयारी करने लगे ॥ ३ ॥
ददृशुस्ते ततः कृष्णां सूतपुत्राः समागताः । अदूराच्चानवद्याङ्गीं स्तम्भमालिङ्ग्य तिष्ठतीम् ॥ ४ ॥ इसी समय वहाँ आये हुए सूतपुत्रोंने देखा, निर्दोष अंगोंवाली द्रौपदी थोड़ी ही दूरपर एक खंभेका सहारा लिये खड़ी है ॥ ४ ॥
समवेतेषु सर्वेषु तामूचुरुपकीचकाः । हन्यतां शीघ्रमसती यत्कृते कीचको हतः ॥ ५ ॥ जब सब लोग जुट गये, तब उन उपकीचकों (कीचकके भाइयों)-ने द्रौपदीको लक्ष्य करके कहा—'इस दुष्टाको शीघ्र मार डाला जाय, क्योंकि इसीके लिये कीचककी जान गयी है ॥ ५ ॥
अथवा नैव हन्तव्या दह्यतां कामिना सह । मृतस्यापि प्रियं कार्यं सूतपुत्रस्य सर्वथा ॥ ६ ॥ 'अथवा मारा न जाय। कामी कीचककी लाशके साथ ही इसे भी जला दिया जाय। मर जानेपर भी सूतपुत्रका जो प्रिय हो; जिससे उसकी आत्मा प्रसन्न हो, वह कार्य हमें सर्वथा करना चाहिये' ॥ ६ ॥
ततो विराटमूचुस्ते कीचकोऽस्याः कृते हतः । सहानेनाद्य दह्येम तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ७ ॥ तदनन्तर उन्होंने विराटसे कहा—'इस सैरन्ध्रीके लिये ही कीचक मारा गया है, अतः आज हम कीचककी लाशके साथ इसे भी जला देना चाहते हैं, आप इसके लिये आज्ञा दें' ॥ ७ ॥
पराक्रमं तु सूतानां मत्वा राजान्वमोदत । सैरन्ध्र्याः सूतपुत्रेण सह दाहं विशाम्पतिः ॥ ८ ॥ राजाने सूतपुत्रोंके पराक्रमका विचार करके सैरन्ध्रीको कीचकके साथ जला डालनेकी अनुमति दे दी ॥ ८ ॥
तां समासाद्य वित्रस्तां कृष्णां कमलोचनाम् । मोमुह्यमानां ते तत्र जगृहुः कीचका भृशम् ॥ ९ ॥ फिर क्या था, उपकीचकोंने उसके पास जाकर भयभीत एवं मूर्च्छित हुई कमललोचना कृष्णाको बलपूर्वक पकड़ लिया ॥ ९ ॥
ततस्तु तां समारोप्य निबध्य च सुमध्यमाम् ।