महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2296, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंजग्मुरुद्यम्य ते सर्वे श्मशानाभिमुखास्तदा ॥ १० ॥ फिर उन्होंने सुन्दर कटिभागवाली उस देवीको टिकटीपर चढ़ाकर लाशके साथ ही बाँध दिया। इसके बाद वे सब लोग मृतकको उठाकर श्मशानभूमिकी ओर ले चले ॥ १० ॥ ह्रियमाणा तु सा राजन् सूतपुत्रैरनिन्दिता । प्राक्रोशन्नाथमिच्छन्ती कृष्णा नाथवती सती ॥ ११ ॥ राजन्! सूतपुत्रोंद्वारा इस प्रकार ले जायी जाती हुई सती द्रौपदी सनाथा होकर भी [अनाथा-सी हो रही थी, वह] नाथ (रक्षक)-की इच्छा करती हुई जोर-जोरसे पुकारने लगी ॥ ११ ॥
द्रौपद्युवाच जयो जयन्तो विजयो जयत्सेनो जयद्वलः । ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥ १२ ॥ **द्रौपदी बोली—**मेरे पति जय, जयन्त, विजय, जयत्सेन और जयद्वल जहाँ भी हों, मेरी यह आर्त वाणी सुनें और समझें। ये सूतपुत्र मुझे श्मशानमें लिये जा रहे हैं ॥ १२ ॥ येषां ज्यातलनिर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः । व्यश्रूयत महायुद्धे भीमघोषस्तरस्विनाम् ॥ १३ ॥ रथघोषश्च बलवान् गन्धर्वाणां तरस्विनाम् । ते मे वाचं विजानन्तु सूतपुत्रा नयन्ति माम् ॥ १४ ॥ जिन वेगवान् गन्धर्वोंके धनुषोंकी प्रत्यंचाका भीषण शब्द वज्राघातके समान सुनायी देता है तथा जिनके रथोंकी घर्घरहाटकी आवाज भी बड़े जोरसे उठती और दूरतक फैलती है, वे मेरी आर्त वाणी सुनें और समझें। ये सुतपुत्र मुझे श्मशानमें ले जा रहे हैं ॥ १३-१४ ॥
वैशम्पायन उवाच तस्यास्ताः कृपणा वाचः कृष्णायाः परिदेवितम् । श्रुत्वैवाभ्यापतद् भीमः शयनादविचारयन् ॥ १५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! द्रौपदीकी वह दीन वाणी और करुण विलाप सुनते ही भीमसेन बिना कोई विचार किये शय्यासे कूद पड़े ॥ १५ ॥
भीमसेन उवाच अहं शृणोमि ते वाचं त्वया सैरन्ध्रि भाषिताम् । तस्मात् ते सूतपुत्रेभ्यो भयं भीरु न विद्यते ॥ १६ ॥ **भीमसेन बोले—**सैरन्ध्री! तुम जो कुछ कह रही हो, तुम्हारी वह वाणी मैं सुनता हूँ। इसलिये भीरु! अब इन सूतपुत्रोंसे तेरे लिये कोई भय नहीं है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच