भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2297

इत्युक्त्वा स महाबाहुर्विजजृम्भे जिघांसया । ततः स व्यायतं कृत्वा वेषं विपरिवर्त्य च ॥ १७ ॥ अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य निर्जगाम बहिस्तदा । स भीमसेनः प्राकारादारुह्य तरसा द्रुमम् ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर महाबाहु भीमसेनने उपकीचकोंका वध करनेके लिये अँड़ाई लेते हुए अपने शरीरको बढ़ा लिया और प्रयत्नपूर्वक वेष बदलकर बिना दरवाजेके ही दीवार फाँदकर पाकशालासे बाहर निकल गये। फिर वे नगरका परकोटा लाँघकर बड़े वेगसे एक वृक्षपर चढ़ गये (और वहींसे यह देखने लगे कि उपकीचक द्रौपदीको किधर ले जा रहे हैं) ॥ १७-१८ ॥

श्मशानाभिमुखः प्रायाद् यत्र ते कीचका गताः । स लङ्घयित्वा प्राकारं निःसृत्य च पुरोत्तमात् । जवेन पतितो भीमः सूतानामग्रतस्तदा ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् वे उपकीचक जिधर गये थे, उसी ओर भीमसेन भी श्मशानभूमिकी दिशामें चल दिये। चहारदीवारी लाँघनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नगरसे निकलकर भीमसेन इतने वेगसे चले कि सूतपुत्रोंसे पहले ही वहाँ पहुँच गये ॥ १९ ॥

चितासमीपे गत्वा स तत्रापश्यद् वनस्पतिम् । तालमात्रं महास्कन्धं मूर्धशुष्कं विशाम्पते ॥ २० ॥ राजन्! चिताके समीप जाकर उन्होंने वहाँ ताड़के बराबर एक वृक्ष देखा, जिसकी शाखाएँ बहुत बड़ी थीं और जो ऊपरसे सूख गया था ॥ २० ॥

तं नागवदुपक्रम्य बाहुभ्यां परिरभ्य च । स्कन्धमारोपयामास दशव्यामं परंतपः ॥ २१ ॥ उस वृक्षकी ऊँचाई दस व्याम* थी। उसे शत्रुतापन भीमसेनने दोनों भुजाओंमें भरकर हाथीके समान जोर लगाकर उखाड़ा और अपने कंधेपर रख लिया ॥ २१ ॥

स तं वृक्षं दशव्यामं सस्कन्धविटपं बली । प्रगृह्याभ्यद्रवत् सूतान् दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ २२ ॥ शाखा-प्रशाखाओंसहित उस दस व्याम ऊँचे वृक्षको लेकर बलवान् भीम दण्डपाणि यमराजके समान उन सूतपुत्रोंकी ओर दौड़े ॥ २२ ॥

ऊरुवेगेन तस्याथ न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकाः । भूमौ निपतिता वृक्षाः सङ्घशस्तत्र शेरते ॥ २३ ॥ उस समय उनकी जंघाओंके वेगसे टकराकर बहुतेरे बरगद, पीपल और ढाकके वृक्ष पृथ्वीपर गिरकर ढेर-के-ढेर बिखर गये ॥ २३ ॥

तं सिंहमिव संक्रुद्धं दृष्ट्वा गन्धर्वमागतम् । वित्रैसुः सर्वशः सूता विषादभयकम्पिताः ॥ २४ ॥