भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 2580 में से

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१९- पाण्डवोंके दुःखसे दुःखित द्रौपदीका भीमसेनके सम्मुख विलाप २०- द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दुःख निवेदन करना २१- भीमसेन और द्रौपदीका संवाद २२- कीचक और भीमसेनका युद्ध तथा कीचक-वध २३- उपकीचकोंका सैरन्ध्रीको बाँधकर श्मशान-भूमिमें ले जाना और भीमसेनका उन सबको मारकर सैरन्ध्रीको छुड़ाना २४- द्रौपदीका राजमहलमें लौटकर आना और बृहन्नला एवं सुदेष्णासे उसकी बातचीत

(गोहरणपर्व)

२५- दुर्योधनके पास उसके गुप्तचरोंका आना और उनका पाण्डवोंके विषयमें कुछ पता न लगा, यह बताकर कीचकवधका वृत्तान्त सुनाना २६- दुर्योधनका सभासदोंसे पाण्डवोंका पता लगानेके लिये परामर्श तथा इस विषयमें कर्ण और दुःशासनकी सम्मति २७- आचार्य द्रोणकी सम्मति २८- युधिष्ठिरकी महिमा कहते हुए भीष्मकी पाण्डवोंके अन्वेषणके विषयमें सम्मति २९- कृपाचार्यकी सम्मति और दुर्योधनका निश्चय ३०- सुशर्माके प्रस्तावके अनुसार त्रिगतों और कौरवोंका मत्स्यदेशपर धावा ३१- चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान ३२- मत्स्य तथा त्रिगर्तदेशीय सेनाओंका परस्पर युद्ध ३३- सुशर्माका विराटको पकड़कर ले जाना, पाण्डवोंके प्रयत्नसे उनका छुटकारा, भीमद्वारा सुशर्माका निग्रह और युधिष्ठिरका अनुग्रह करके उसे छोड़ देना ३४- राजा विराटद्वारा पाण्डवोंका सम्मान, युधिष्ठिरद्वारा राजाका अभिनन्दन तथा विराटनगरमें राजाकी विजयघोषणा ३५- कौरवोंद्वारा उत्तर दिशाकी ओरसे आकर विराटकी गौओंका अपहरण और गोपाध्यक्षका उत्तरकुमारको युद्धके लिये उत्साह दिलाना ३६- उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना ३७- बृहन्नलाको सारथि बनाकर राजकुमार उत्तरका रणभूमिकी ओर प्रस्थान ३८- उत्तरकुमारका भय और अर्जुनका उसे आश्वासन देकर रथपर चढ़ाना ३९- द्रोणाचार्यद्वारा अर्जुनके अलौकिक पराक्रमकी प्रशंसा ४०- अर्जुनका उत्तरको शमीवृक्षसे अस्त्र उतारनेके लिये आदेश ४१- उत्तरका अर्जुनके आदेशके अनुसार शमीवृक्षसे पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना

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