भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2335

तच्छ्रुत्वा नृपतिः सेनां मत्स्यानां समयोजयत् ।। ९ ।।

'राजेन्द्र! उन्हें वापस लेने—छुड़ानेकी चेष्टा कीजिये; जिससे आपके वे पशु नष्ट न हो

जायँ—आपके हाथोंसे दूर न निकल जायँ।' यह सुनकर राजाने मत्स्यदेशकी सेना एकत्र

की ।। ९ ।।

रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् ।

राजानो राजपुत्राश्च तनुत्राण्यथ भेजिरे ।। १० ।।

उसमें रथ, हाथी, घोड़े और पैदल—सब प्रकारके सैनिक भरे थे और वह सेना ध्वजा-

पताकाओंसे व्याप्त थी। फिर राजा तथा राजकुमारोंने पृथक्-पृथक् कवच धारण

किये ।। १० ।।

भानुमन्ति विचित्राणि शूरसेव्यानि भागशः ।

सवज्रायसगर्भं तु कवचं तत्र काञ्चनम् ।। ११ ।।

विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीकोऽभ्यहारयत् ।

वे कवच बड़े चमकीले, विचित्र और शूरवीरोंके धारण करने योग्य थे। राजा विराटके

प्रिय भाई शतानीकने सुवर्णमय कवच ग्रहण किया, जिसके भीतर हीरे और लोहेकी

जालियाँ लगी थीं ।। ११ १/२ ।।

सर्वपारसवं वर्म कल्याणपटलं दृढम् ।। १२ ।।

शतानीकादवरजो मदिराक्षोऽभ्यहारयत् ।

शतानीकसे छोटे भाईका नाम मदिराक्ष था। उन्होंने सुवर्णपत्रसे आच्छादित सुदृढ़

कवच धारण किया, जो सारा-का-सारा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंको सहन करनेमें समर्थ

फौलादका बना हुआ था ।। १२ १/२ ।।

शतसूर्यं शतावर्तं शतबिन्दु शताक्षिमत् ।। १३ ।।

अभेद्यकल्पं मत्स्यानां राजा कवचमाहरत् ।

उत्सेधे यस्य पद्मानि शतं सौगन्धिकानि च ।। १४ ।।

मत्स्यदेशके राजा विराटने अभेद्यकल्प नामक कवच ग्रहण किया, जो किसी भी अस्त्र-

शस्त्रसे कट नहीं सकता था। उसमें सूर्यके समान चमकीली सौ फूलियाँ लगी थीं, सौ भँवरें

बनी थीं, सौ बिन्दु (सूक्ष्म चक्र) और सौ नेत्रके समान आकारवाले चक्र बने थे। इसके सिवा

उसमें नीचेसे ऊपरतक सौगन्धिक (कह्लार) जातिके सौ कमलोंकी आकृतियाँ पंक्तिबद्ध

बनी हुई थीं ।। १३-१४ ।।

सुवर्णपृष्ठं सूर्याभं सूर्यदत्तोऽभ्यहारयत् ।

दृढमायसगर्भं च श्वेतं वर्म शताक्षिमत् ।। १५ ।।

विराटस्य सुतो ज्येष्ठो वीरः शङ्खोऽभ्यहारयत् ।

सेनापति सूर्यदत्त (शतानीक)-ने पृष्ठभागमें सुवर्णजटित एवं सूर्यके समान चमकीला

कवच पहन रखा था। विराटके ज्येष्ठ पुत्र वीरवर शंखने श्वेत रंगका एक सुदृढ़ कवच धारण