भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2336

किया, जिसके भीतरी भागमें लोहा लगा था और ऊपर नेत्रके समान सौ चिह्न बने हुए थे ।।

शतशश्च तनुत्राणि यथास्वं ते महारथाः ॥ १६ ॥
योत्स्यमाना अनह्यन्त देवरूपाः प्रहारिणः ।
इसी प्रकार सैकड़ों देवताओंके समान रूपवान् महारथियोंने युद्धके लिये उद्यत हो अपने-अपने वैभवके अनुसार कवच पहन लिये। वे सब-के-सब प्रहार करनेमें कुशल थे ॥ १६ १/२ ॥

सूपस्करेषु शुभ्रेषु महत्सु च महारथाः ॥ १७ ॥
पृथक् काञ्चनसंनाहान् रथेष्वश्वानयोजयन् ।
उन महारथियोंने सुन्दर पहियोंवाले विशाल एवं उज्ज्वल रथोंमें पृथक्-पृथक् सोनेके बख्तर धारण कराये हुए घोड़ोंको जोता ॥ १७ १/२ ॥

सूर्यचन्द्रप्रतीकाशे रथे दिव्ये हिरण्मये ॥ १८ ॥
महानुभावो मत्स्यस्य ध्वज उच्छिश्रिये तदा ।
मत्स्यराजके सुवर्णमय दिव्य रथमें, जो सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहा था, उस समय बहुत ऊँची ध्वजा फहराने लगी ॥ १८ १/२ ॥

अथान्यान् विविधाकारान् ध्वजान् हेमपरिष्कृतान् ॥ १९ ॥
यथास्वं क्षत्रियाः शूरा रथेषु समयोजयन् ।
इसी प्रकार अन्य शूरवीर क्षत्रियोंने अपने-अपने रथोंमें यथाशक्ति सुवर्णमण्डित नाना प्रकारकी ध्वजाएँ फहरायीं ॥

(रथेषु युज्यमानेषु कङ्को राजानमब्रवीत् ।
मयाप्यस्त्रं चतुर्मार्गमवाप्तमृषिसत्तमात् ॥
दंशितो रथमास्थाय पदं निर्यामहं गवाम् ।
अयं च बलवाञ्छूरो बल्लवो दृश्यतेऽनघ ॥
गोसंख्यमश्वबन्धं च रथेषु समयोजय ।
नैते न जातु युध्येयुर्गवार्थमिति मे मतिः ॥)

अथ मत्स्योऽब्रवीद् राजा शतानीकं जघन्यजम् ॥ २० ॥
जब रथ जोते जा रहे थे, उस समय कंकने राजा विराटसे कहा—'मैंने भी एक श्रेष्ठ महर्षिसे चार मार्गोंवाले धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है, अतः मैं भी कवच धारण करके रथपर बैठकर गौओंके पदचिह्नोंका अनुसरण करूँगा। निष्पाप नरेश! यह बल्लव नामक रसोइया भी बलवान् एवं शूरवीर दिखायी देता है, इसे गौओंकी गणना करनेवाले गोशालाध्यक्ष तन्तिपाल तथा अश्वोंकी शिक्षाका प्रबन्ध करनेवाले ग्रन्थिकको भी रथोंपर बिठा दीजिये। मेरा विश्वास है कि ये गौओंके लिये युद्ध करनेसे कदापि मुँह नहीं मोड़ सकते।'
तदनन्तर मत्स्यराजने अपने छोटे भाई शतानीकसे कहा— ॥ २० ॥

कङ्कबल्लवगोपाला दामग्रन्थिश्च वीर्यवान् ।