भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2422

‘अथवा यदि मत्स्यराज त्रिगर्तोंको भगाकर अपने देशके लोगों एवं अपनी सारी भयंकर सेनाके साथ इस रातमें हमलोगोंसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आ रहे होंगे।। तेषामेव महावीर्यः कश्चिदेष पुरःसरः। अस्मान् जेतुमिहायातो मत्स्यो वापि स्वयं भवेत् ॥ १४ ॥ ‘उन्हीं सैनिकोंमेंसे यह कोई महापराक्रमी योद्धा अगुआ बनकर हमें जीतने आया है। यह भी सम्भव है कि ये स्वयं मत्स्यराज ही हों ॥ १४ ॥ यद्येष राजा मत्स्यानां यदि बीभत्सुर्रागतः। सर्वैर्योद्धव्यमस्माभिरिति नः समयः कृतः ॥ १५ ॥ ‘यदि यह मत्स्योंका राजा विराट हो अथवा अर्जुन ही उसकी ओरसे आया हो, तो भी हम सब लोगोंको उससे युद्ध करना ही है; यह हमने प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १५ ॥ अथ कस्मात् स्थिता ह्येते रथेषु रथसत्तमाः। भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव विकर्णो द्रौणिरेव च ॥ १६ ॥ सम्भ्रान्तमनसः सर्वे काले ह्यस्मिन् महारथाः। नान्यत्र युद्धाच्छ्रेयोऽस्ति तथाऽऽत्मा प्रणिधीयताम् ॥ १७ ॥ ‘फिर वे हमारे श्रेष्ठ रथी-महारथी भीष्म, द्रोण, कृप, विकर्ण और अश्वत्थामा आदि इस समय भ्रान्तचित्त हो रथोंमें चुपचाप क्यों बैठे हैं? युद्धके सिवा और किसी बातमें कल्याण नहीं है। यह समझकर अपने-आपको इस परिस्थितिके अनुकूल बनाना चाहिये ।। आच्छिन्ने गोधनेऽस्माकमपि देवेन वज्रिणा। यमेन वापि संग्रामे को हास्तिनपुरं व्रजेत् ॥ १८ ॥ ‘यदि स्वयं वज्रधारी इन्द्र अथवा यमराज ही युद्धमें आकर हमसे गोधन छीन लें, तो भी ऐसा कौन होगा, जो उनका सामना करना छोड़कर हस्तिनापुरको लौट जाय? ॥ १८ ॥ शरैरेभिः प्रणुन्नानां भग्नानां गहने वने। को हि जीवेत् पदातीनां भवेदश्वेषु संशयः ॥ १९ ॥ ‘यदि कोई गहन वनमें भागकर प्राण बचाना चाहें, तो मेरे इन बाणोंसे वे छिन्न-भिन्न कर दिये जायँगे। इस तरह भागनेवाले पैदल सैनिकोंमेंसे कौन जीवित रह सकता है? घुड़सवारोंके विषयमें संदेह है (वे भागनेपर मारे भी जा सकते हैं और बच भी सकते हैं)’ ॥ १९ ॥ दुर्योधनवचः श्रुत्वा राधेयस्त्वब्रवीद् वचः। आचार्य पृष्ठतः कृत्वा तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ २० ॥ दुर्योधनकी बात सुनकर राधानन्दन कर्णने कहा—‘राजन्! आप आचार्य द्रोणको पीछे रखकर ऐसी नीति बनाइये कि विजय प्राप्त हो ॥ २० ॥ जानाति हि मतं तेषामतस्त्रासयतीह नः। अर्जुने चास्य सम्प्रीतिमधिकामुपलक्षये ॥ २१ ॥