भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2423, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2423

'ये पाण्डवोंका मत जानते हैं, इसीलिये यहाँ हमें डरा रहे हैं और अर्जुनके प्रति इनका प्रेम अधिक मैं देखता हूँ ।। २१ ।।

तथा हि दृष्ट्वा बीभत्सुमुपायान्तं प्रशंसति ।
यथा सेना न भज्येत तथा नीतिर्विधीयताम् ।। २२ ।।
'तभी तो अर्जुनको आते देख ये उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। (इनकी बातोंसे हतोत्साह होकर) सेनामें भगदड़ न मच जाय, इसका खयाल रखते हुए तदनुकूल नीति निर्धारित कीजिये ।। २२ ।।

हेषितं ह्युपशृण्वाने द्रोणे सर्वं विघट्टितम् ।
अदेशिका महारण्ये ग्रीष्मे शत्रुवशं गताः ।
यथा न विभ्रमेत् सेना तथा नीतिर्विधीयताम् ।। २३ ।।
'[आगे रहनेपर] ये अर्जुनके घोड़ोंकी हिनहिनाहट सुनते ही घबरा उठेंगे। फिर तो सारी सेना ही विचलित हो जायगी। इस समय हम विदेशमें हैं, बड़े भारी जंगलमें पड़े हुए हैं, गरमीकी ऋतु है और हम शत्रुके वशमें आ गये हैं; अतः ऐसी नीतिसे काम लें कि इनकी बातें सुनकर सैनिकोंके मनमें भ्रम न फैले ।। २३ ।।

इष्टा हि पाण्डवा नित्यमाचार्यस्य विशेषतः ।
आसयन्नपरार्थांश्च कथ्यते स्म स्वयं तथा ।। २४ ।।
'आचार्यको सदासे ही पाण्डव अधिक प्रिय रहे हैं। उन स्वार्थियोंने अपना काम बनानेके लिये ही द्रोणाचार्यको आपके पास रख छोड़ा है। ये स्वयं भी ऐसी बातें कहते हैं, जिससे हमारे कथनकी पुष्टि होती है ।। २४ ।।

अश्वानां हेषितं श्रुत्वा कः प्रशंसापरो भवेत् ।
स्थाने वापि व्रजन्तो वा सदा हेषन्ति वाजिनः ।। २५ ।।
'भला, घोड़ोंकी हिनहिनाहट सुनकर कौन किसकी प्रशंसा करने लग जाता है? घोड़े अपने स्थानपर हों या यात्रा करते हों, वे सदा ही हींसते रहते हैं (इससे किसीकी वीरताका क्या सम्बन्ध है?) ।। २५ ।।

सदा च वायवो वान्ति नित्यं वर्षति वासवः ।
स्तनयित्नोश्च निर्घोषः श्रूयते बहुशस्तथा ।। २६ ।।
किमत्र कार्यं पार्थस्य कथं वा स प्रशस्यते ।
अन्यत्र कामाद् द्वेषाद् वा रोषादस्मासु केवलात् ।। २७ ।।
'हवा सदा चला करती है। इन्द्र हमेशा वर्षा करते हैं। मेघोंकी गर्जना बहुत बार सुननेको मिलती है। (इससे डरने या अपशकुन माननेकी क्या बात है?) इसमें अर्जुनका क्या काम है (कौन-सा चमत्कार है?) इस बातको लेकर क्यों उसकी प्रशंसा की जाती है? इसका कारण इस बातके सिवा और क्या हो सकता है कि आचार्यके मनमें अर्जुनका भला

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