भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 245

अवसीदेत् स दुर्बुद्धिरामो घट इवोदके ॥ १४ ॥ जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य प्रारब्ध (भाग्य)-का भरोसा रखकर उद्योगसे मुँह मोड़ लेता और सुखसे सोता रहता है, उसका जलमें रखे हुए कच्चे घड़ेकी भाँति विनाश हो जाता है ॥ १४ ॥

तथैव हठदुर्बुद्धिः शक्तः कर्मण्यकर्मकृत् । आसीत न चिरं जीवेदनाथ इव दुर्बलः ॥ १५ ॥ इसी प्रकार जो हठी और दुर्बुद्धि मानव कर्म करनेमें समर्थ होकर भी कर्म नहीं करता, बैठा रहता है, वह दुर्बल एवं अनाथकी भाँति दीर्घजीवी नहीं होता ॥ १५ ॥

अकस्मादिह यः कश्चिदर्थं प्राप्नोति पूरुषः । तं हठेनेति मन्यन्ते स हि यत्नो न कस्यचित् ॥ १६ ॥ जो कोई पुरुष इस जगत्में अकस्मात् कहींसे धन पा लेता है, उसे लोग हठसे मिला हुआ मान लेते हैं; क्योंकि उसके लिये किसीके द्वारा प्रयत्न किया हुआ नहीं दीखता ॥ १६ ॥

यच्चापि किंचित् पुरुषो दिष्टं नाम भजत्युत । दैवेन विधिना पार्थ तद् दैवमिति निश्चितम् ॥ १७ ॥ कुन्तीनन्दन! मनुष्य जो कुछ भी देवाराधनकी विधिसे अपने भाग्यके अनुसार पाता है, उसे निश्चितरूपसे दैव (प्रारब्ध) कहा गया है ॥ १७ ॥

यत् स्वयं कर्मणा किंचित् फलमाप्नोति पूरुषः । प्रत्यक्षमेतल्लोकेषु तत् पौरुषमिति श्रुतम् ॥ १८ ॥ तथा मनुष्य स्वयं कर्म करके जो कुछ फल प्राप्त करता है, उसे पुरुषार्थ कहते हैं। यह सब लोगोंको प्रत्यक्ष दिखायी देता है ॥ १८ ॥

स्वभावतः प्रवृत्तो यः प्राप्नोत्यर्थं न कारणात् । तत् स्वभावात्मकं विद्धि फलं पुरुषसत्तम ॥ १९ ॥ नरश्रेष्ठ! जो स्वभावसे ही कर्ममें प्रवृत्त होकर धन प्राप्त करता है, किसी कारणवश नहीं, उसके उस धनको स्वाभाविक फल समझना चाहिये ॥ १९ ॥

एवं हठाच्च दैवाच्च स्वभावात् कर्मणस्तथा । यानि प्राप्नोति पुरुषस्तत् फलं पूर्वकर्मणाम् ॥ २० ॥ इस प्रकार हठ, दैव, स्वभाव तथा कर्मसे मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंको पाता है, वे सब उसके पूर्वकर्मोंके ही फल हैं ॥ २० ॥

धातापि हि स्वकर्मैव तैस्तैर्हेतुभिरीश्वरः । विदधाति विभज्येह फलं पूर्वकृतं नृणाम् ॥ २१ ॥ जगदाधार परमेश्वर भी उपर्युक्त हठ आदि हेतुओंसे जीवोंके अपने-अपने कर्मको ही विभक्त करके मनुष्योंको उनके पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मके फलरूपसे यहाँ प्राप्त कराता