महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै ।। २१ ।। यद्ध्यायं पुरुषः किंचित् कुरुते वै शुभाशुभम् । तद् धातृविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदयम् ।। २२ ।। पुरुष यहाँ जो कुछ भी शुभ-अशुभ कर्म करता है, उसे ईश्वरद्वारा विहित उसके पूर्वकर्मोंके फलका उदय समझिये ।। २२ ।। कारणं तस्य देहोऽयं धातुः कर्मणि वर्तते । स यथा प्रेरयत्येनं तथायं कुरुतेऽवशः ।। २३ ।। यह मानव-शरीर जो कर्ममें प्रवृत्त होता है, वह ईश्वरके कर्मफलसम्पादन-कार्यका साधन है। वे इसे जैसी प्रेरणा देते हैं, यह विवश होकर (स्वेच्छा—प्रारब्धभोगके लिये) वैसा ही करता है ।। २३ ।। तेषु तेषु हि कृत्येषु विनियोक्ता महेश्वरः । सर्वभूतानि कौन्तेय कारयत्यवशान्यपि ।। २४ ।। कुन्तीनन्दन! परमेश्वर ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कार्योंमें लगाते और स्वभावके परवश हुए उन प्राणियोंसे कर्म कराते हैं ।। २४ ।। मनसार्थान् विनिश्चित्य पश्चात् प्राप्नोति कर्मणा । बुद्धिपूर्वं स्वयं वीर पुरुषस्तत्र कारणम् ।। २५ ।। किंतु वीर! मनसे अभीष्ट वस्तुओंका निश्चय करके फिर कर्मद्वारा मनुष्य स्वयं बुद्धिपूर्वक उन्हें प्राप्त करता है। अतः पुरुष ही उसमें कारण है ।। २५ ।। संख्यातुं नैव शक्यानि कर्माणि पुरुषर्षभ । अगारनगराणां हि सिद्धिः पुरुषहैतुकी ।। २६ ।। तिले तैलं गवि क्षीरं काष्ठे पावकमन्ततः । धिया धीरो विजानीयादुपायं चास्य सिद्धये ।। २७ ।। नरश्रेष्ठ! कर्मोंकी गणना नहीं की जा सकती। गृह एवं नगर आदि सभीकी प्राप्तिमें पुरुष ही कारण है। विद्वान् पुरुष पहले बुद्धिद्वारा यह निश्चय करे कि तिलमें तेल है, गायके भीतर दूध है और काष्ठमें अग्नि है, तत्पश्चात् उसकी सिद्धिके उपायका निश्चय करे ।। २६-२७ ।। ततः प्रवर्तते पश्चात् कारणैस्तस्य सिद्धये । तां सिद्धिमुपजीवन्ति कर्मजामिह जन्तवः ।। २८ ।। तदनन्तर उन्हीं उपायोंद्वारा उस कार्यकी सिद्धिके लिये प्रवृत्त होना चाहिये। सभी प्राणी इस जगत्में उस कर्मजनित सिद्धिका सहारा लेते हैं ।। २८ ।। कुशलेन कृतं कर्म कर्त्रा साधु स्वनुष्ठितम् । इदं त्वकुशलेनेति विशेषादुपलभ्यते ।। २९ ।।