भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2475

प्रदक्षिणमुपावृत्य तस्थौ तस्याग्रतो बली ॥ ७ ॥ अश्वसंचालनका रहस्य जाननेवाले मत्स्यनरेशके पुत्रने रथकी चालसे कौरवोंको मोह (भ्रम) में डाल दिया—वे यह न जान सके कि रथ किस महारथीके पास जाना चाहता है। विराटनन्दन महाबली उत्तरको किसी ओरसे कोई भय नहीं था। उसने कृपाचार्यके रथके समीप जा रथद्वारा उनकी प्रदक्षिणा की। फिर उनके सामने जा वह रथ रोककर खड़ा हो गया ॥ ६-७ ॥

ततोऽर्जुनः शङ्खवरं देवदत्तं महारवम् । प्रदध्मौ बलमास्थाय नाम विश्राव्य चात्मनः ॥ ८ ॥ तब अर्जुनने अपना नाम सुनाकर और पूरा बल लगाकर भारी आवाज करनेवाले अपने उत्तम शंख देवदत्तको बजाया ॥ ८ ॥

तस्य शब्दो महानासीद् ध्म्यमानस्य जिष्णुना । तथा वीर्यवता संख्ये पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ ९ ॥ युद्धभूमिमें वैसे महापराक्रमी विजयशील अर्जुनके द्वारा बजाये जानेपर उस शंखसे इतने जोरकी आवाज हुई, मानो कोई पर्वत फट गया हो ॥ ९ ॥

पूजयांचक्रिरे शङ्खं कुरवः सहसैनिकाः । अर्जुनेन तथा ध्मातः शतधा यन्न दीर्यते ॥ १० ॥ उस समय समस्त कौरव अपने सैनिकोंके साथ यह कहकर उस शंखकी सराहना करने लगे कि अहो! यह अद्भुत शंख है, जो अर्जुनके इस प्रकार बजानेपर भी उसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते? ॥ १० ॥

दिवमावृत्य शब्दस्तु निवृत्तः शुश्रुवे पुनः । सृष्टो मघवता वज्रः प्रपतन्निव पर्वते ॥ ११ ॥ वह शंखनाद स्वर्गलोकसे टकराकर जब पुनः लौटा, तब इस प्रकार सुनायी दिया, मानो इन्द्रका चलाया हुआ वज्र किसी पर्वतपर गिरा हो ॥ ११ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वीरो बलवीर्यसमन्वितः । अर्जुनं प्रति संरब्धः कृपः परमदुर्जयः । अमृष्यमाणस्तं शब्दं कृपः शारद्वतस्तदा ॥ १२ ॥ अर्जुनं प्रति संरब्धो युद्धार्थी स महारथः । महोदधिजमादाय दध्मौ वेगेन वीर्यवान् ॥ १३ ॥ वीरवर कृपाचार्य बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे। उन्हें जीतना अत्यन्त कठिन था। वे अर्जुनके शंख बजानेके अनन्तर उनके प्रति कुपित हो उठे। शरद्वान्के पुत्र महारथी कृपाचार्य उस समय अर्जुनके शंखनादको नहीं सह सके उनके मनमें अर्जुनपर कुछ रोष हो आया; इसलिये युद्धके (उसके साथ) अभिलाषी होकर उन महापराक्रमी महारथीने अपना शंख लेकर उसे बड़े जोरसे फूँका ॥ १२-१३ ॥