महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस तु शब्देन लोकांस्त्रीनावृत्य रथिनां वरः । धनुरादाय सुमहज्ज्याशब्दमकरोत् तदा ॥ १४ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने उस शंखनादसे तीनों लोकोंको गुँजाकर उस समय हाथमें धनुष ले लिया और उसकी प्रत्यंचा खींचकर टंकारध्वनि की ॥ १४ ॥
तौ रथौ सूर्यसंकाशौ योत्स्यमानौ महाबलौ । शारदाविव जीमूतौ व्यरोचेतां व्यवस्थितौ ॥ १५ ॥ वे दोनों महारथी बड़े पराक्रमी और सूर्यके समान तेजस्वी थे, अतः युद्ध करनेके लिये खड़े हुए वे दोनों वीर शरत्कालके दो मेघोंकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ १५ ॥
ततः शारद्वतस्तूर्णं पार्थं दशभिराशुगैः । विव्याध परवीरघ्नं निशितैर्मर्मभेदिभिः ॥ १६ ॥ तदनन्तर कृपाचार्यने मर्मस्थानको विदीर्ण कर देनेवाले दस तीखे बाणोंद्वारा शत्रुवीरोंके संहारक कुन्तीनन्दन अर्जुनको तुरंत बींध डाला ॥ १६ ॥
पार्थोऽपि विश्रुतं लोके गाण्डीवं परमायुधम् । विकृष्य चिक्षेप बहून् नाराचान् मर्मभेदिनः ॥ १७ ॥ तब अर्जुनने भी अपने विश्वविख्यात उत्तम आयुध गाण्डीवको (कानतक) खींचकर बहुत-से मर्मभेदी नाराच छोड़े ॥ १७ ॥