भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2483, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2483

तौ रथौ वीर्यसम्पन्नौ दृष्ट्वा संग्राममूर्धनि । आचार्यशिष्यावजितौ कृतविद्यौ मनस्विनौ ॥ १४ ॥ समाश्लिष्टौ तदान्योन्यं द्रोणपार्थौ महाबलौ । दृष्ट्वा प्राकम्पत मुहुर्भरतानां महद् बलम् ॥ १५ ॥ महाबली द्रोण और कुन्तीपुत्र अर्जुन दोनों महारथी बल-वीर्य-सम्पन्न, अजेय, अस्त्रविद्याके विशेषज्ञ और मनस्वी थे। युद्धके सिरेपर वे दोनों आचार्य और शिष्य अपने-अपने रथपर बैठे हुए (ही एक-दूसरेकी ओर हाथ बढ़ाकर मानो) परस्पर आलिंगन करने लगे। उन्हें इस अवस्थामें देखकर भरतवंशियोंकी वह विशाल सेना बारंबार भयसे काँपने लगी ॥ १४-१५ ॥ हर्षयुक्तस्ततः पार्थः प्रहसन्निव वीर्यवान् । रथं रथेन द्रोणस्य समासाद्य महारथः ॥ १६ ॥ अभिवाद्य महाबाहुः सामपूर्वमिदं वचः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेयः परवीरहा ॥ १७ ॥ तदनन्तर शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले महारथी और महापराक्रमी कुन्तीपुत्र महाबाहु अर्जुन हर्षोल्लासमें भर गये और आचार्य द्रोणके रथसे अपना रथ भिड़ाकर उन्हें प्रणाम करके हँसते हुए-से शान्तिपूर्वक मधुर वाणीमें यों बोले— ॥ १६-१७ ॥ उषिताः स्मो वने वासं प्रतिकर्म चिकीर्षवः । कोपं नार्हसि नः कर्तुं सदा समरदुर्जय ॥ १८ ॥ अहं तु प्रहृते पूर्वं प्रहरिष्यामि तेऽनघ । इति मे वर्तते बुद्धिस्तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ १९ ॥ 'आचार्य! युद्धमें आपपर विजय पाना सर्वथा कठिन है। हमलोग बहुत वर्षोंतक वनमें रहकर कष्ट उठाते रहे हैं। अब शत्रुओंसे बदला लेनेकी इच्छासे आये हैं; अतः आप हमलोगोंपर क्रोध न करें। अनघ! मैं तो आपपर तभी प्रहार करूँगा, जब पहले आप मुझपर प्रहार कर लेंगे। मेरा यही निश्चय है, अतः आप ही पहले मुझपर प्रहार करें' ॥ १८-१९ ॥ ततोऽस्मै प्राहिणोद् द्रोणः शरानधिकविंशतिम् । अप्राप्तांश्चैव तान् पार्थश्चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥ २० ॥ तब आचार्य द्रोणने अर्जुनपर इक्कीस बाण चलाये; किंतु पार्थने उन सबको पास आनेसे पहले ही काट गिराया, मानो उनके हाथ इस कलामें पूर्ण सुशिक्षित थे ॥ २० ॥ ततः शरसहस्रेण रथं पार्थस्य वीर्यवान् । अवाकिरत् ततो द्रोणः शीघ्रमस्त्रं विदर्शयन् ॥ २१ ॥ तदनन्तर पराक्रमी द्रोणने अपनी अस्त्र चलानेकी फुर्ती दिखाते हुए अर्जुनके रथपर सहस्रों बाणोंकी वृष्टि की ॥ २१ ॥ हयांश्च रजतप्रख्यान् कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ।

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