महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2484, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवाकिरदमेयात्मा पार्थं संकोपयन्निव ॥ २२ ॥ उनका आत्मबल असीम था। उन्होंने चाँदीके समान अंगवाले अर्जुनके श्वेत घोड़ोंको भी शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सफेद चीलकी पाँखोंवाले बाणोंसे ढँक दिया। जान पड़ता था, आचार्य यह सब करके अर्जुनके क्रोधको उभारना चाहते थे ॥ २२ ॥
एवं प्रवृत्ते युद्धं भारद्वाजकिरीटिनोः । समं विमुञ्चतो संख्ये विशिखान् दीप्ततेजसः ॥ २३ ॥ इस प्रकार भरद्वाजनन्दन द्रोण और किरीटधारी अर्जुनमें युद्ध छिड़ गया। वे दोनों समरभूमिमें (एक दूसरेपर) समानरूपसे तेजस्वी बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २३ ॥
तावुभौ ख्यातकर्माणामुभौ वायुसमौ जवे । उभौ दिव्यास्त्रविदुषावुभावुत्तमतेजसौ । क्षिपन्तौ शरजालानि मोहयामासतुर्नृपान् ॥ २४ ॥ दोनों ही विख्यात पराक्रमी थे। वेगमें दोनों ही वायुके समान थे। वे दोनों गुरु-शिष्य दिव्यास्त्रोंके महापण्डित और उत्तम तेजसे सम्पन्न थे। परस्पर बाणोंकी झड़ी लगाते हुए दोनोंने सब राजाओंको मोहमें डाल दिया ॥ २४ ॥
व्यस्मयन्त ततो योधा ये तत्रासन् समागताः । शरान् विसृजतोस्तूर्णं साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ २५ ॥ तदनन्तर जो-जो सैनिक वहाँ आये थे, वे एक-दूसरेपर तीव्र गतिसे बाण-वर्षा करनेवाले दोनों वीरोंकी ‘साधु-साधु’ कहकर सराहना करने लगे— ॥ २५ ॥
द्रोणं हि समरे कोऽन्यो योद्धुमर्हति फाल्गुनात् । रौद्रः क्षत्रियधर्मोऽयं गुरुणा यदयुध्यत । इत्यब्रुवञ्जनास्तत्र संग्रामशिरसि स्थिताः ॥ २६ ॥ ‘भला, युद्धमें अर्जुनके सिवा दूसरा कौन द्रोणाचार्यका सामना कर सकता है? यह क्षत्रियधर्म कितना भयंकर है कि शिष्यको गुरुसे युद्ध करना पड़ा है।’ इस प्रकार वहाँ युद्धके मुहानेपर खड़े हुए योद्धा आपसमें बातें करते थे ॥ २६ ॥
वीरौ तावभिसंरब्धौ संनिकृष्टौ महाभुजौ । छादयेतां शरव्रातैरन्योन्यमपराजितौ ॥ २७ ॥ दोनों महाबाहु वीर क्रोधमें भरकर निकट आ गये और बाणसमूहोंसे एक-दूसरेको आच्छादित करने लगे। उनमेंसे कोई भी पराजित होनेवाला न था ॥ २७ ॥
विस्फार्य सुमहच्चापं हेमपृष्ठं दुरासदम् । भारद्वाजोऽथ संक्रुद्धः फाल्गुनं प्रत्यविध्यत ॥ २८ ॥ भरद्वाजनन्दन द्रोण अत्यन्त कुपित हो, जिसके पृष्ठभागमें सुवर्ण जड़ा हुआ था और जिसे उठाना दूसरोंके लिये बहुत कठिन था, उस महान् धनुषको खींचकर अर्जुनको बाणोंसे बींधने लगे ॥ २८ ॥