महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2485, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस सायकमयैर्जालैरर्जुनस्य रथं प्रति । भानुमद्भिः शिलाधौतैर्भानोराच्छादयत् प्रभाम् ॥ २९ ॥ उन्होंने अर्जुनके रथपर बाणोंका जाल-सा बिछा दिया। इतना ही नहीं, शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए उन तेजस्वी बाणोंद्वारा उन्होंने सूर्यकी प्रभाको भी आच्छादित कर दिया ॥ २९ ॥ पार्थं च सुमहाबाहुर्महावेगैर्महारथः । विव्याध निशितैर्बाणैर्मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् ॥ ३० ॥ जैसे मेघ पर्वतपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार महाबाहु महारथी द्रोण पृथापुत्र अर्जुनको अत्यन्त वेगशाली तीखे बाणोंद्वारा बींध रहे थे ॥ ३० ॥ तथैव दिव्यं गाण्डीवं धनुरादाय पाण्डवः । शत्रुघ्नं वेगवान् हृष्टो भारसाधनमुत्तमम् ॥ ३१ ॥ विससर्ज शरांश्चित्रान् सुवर्णविकृतान् बहून् । नाशयन् शरवर्षाणि भारद्वाजस्य वीर्यवान् । तूर्णं चापविनिर्मुक्तैस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३२ ॥ इसी प्रकार हर्षमें भरे हुए वेगशाली पाण्डुनन्दन अर्जुन भी भार सहन करनेमें समर्थ और शत्रुओंका नाश करनेवाला उत्तम एवं दिव्य गाण्डीव धनुष लेकर बहुतसे स्वर्णभूषित विचित्र बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। पराक्रमी पार्थ अपने धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहोंद्वारा तुरंत ही आचार्य द्रोणकी बाण-वर्षाको नष्ट करते जाते थे। यह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ ३१-३२ ॥ स रथेन चरन् पार्थः प्रेक्षणीयो धनंजयः । युगपद् दिक्षु सर्वासु सर्वतोऽस्त्राण्यदर्शयत् ॥ ३३ ॥ एकच्छायमिवाकाशं बाणैश्चक्रे समन्ततः । नादृश्यत तदा द्रोणो नीहारेणेव संवृतः ॥ ३४ ॥ रथसे विचरनेवाले कुन्तीपुत्र धनंजय सबके लिये दर्शनीय हो रहे थे। उन्होंने सब दिशाओंमें एक ही साथ अस्त्रोंकी वर्षा दिखायी और आकाशको चारों ओरसे बाणोंद्वारा ढँककर एकमात्र अन्धकारमें निमग्न-सा कर दिया। उस समय आचार्य द्रोण कुहरेसे ढके हुएकी भाँति अदृश्य हो गये ॥ ३३-३४ ॥ तस्याभवत् तदा रूपं संवृतस्य शरोत्तमैः । जाज्वल्यमानस्य तदा पर्वतस्येव सर्वतः ॥ ३५ ॥ उत्तम बाणोंसे ढके हुए द्रोणाचार्यका स्वरूप उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो सब ओरसे जलता हुआ कोई पर्वत हो ॥ ३५ ॥ दृष्ट्वा तु पार्थस्य रणे शरैः स्वरथमावृतम् । स विस्फार्य धनुः श्रेष्ठं मेघस्तनितनिःस्वनम् ॥ ३६ ॥