महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकान्तेन ह्यनर्थोऽयं वर्ततेऽस्मासु साम्प्रतम् । स तु निःसंशयं न स्यात् त्वयि कर्मण्यवस्थिते ॥ ४४ ॥ इस समय हमलोगोंपर राज्यापहरणरूप भारी विपद् आ पड़ी है, यदि आप कर्म (पुरुषार्थ)-में तत्परतासे लग जायें तो निश्चय ही यह आपत्ति टल सकती है ॥ ४४ ॥ अथवा सिद्धिरेव स्यादभिमानं तदेव ते । वृकोदरस्य बीभत्सोर्भ्रात्रोश्च यमयोरपि ॥ ४५ ॥ अथवा यदि कार्यकी सिद्धि ही हो जाय, तो वह आपके, भीमसेन और अर्जुनके तथा नकुल-सहदेवके लिये भी विशेष गौरवकी बात होगी ॥ ४५ ॥ अन्येषां कर्म सफलमस्माकमपि वा पुनः । विप्रकर्षेण बुध्येत कृतकर्मा यथाफलम् ॥ ४६ ॥ कर्मोंके कर लेनेपर अन्तमें कर्ताको जैसा फल मिलता है, उसके अनुसार ही यह जाना जा सकता है कि दूसरोंका कर्म सफल हुआ है या हमारा ॥ ४६ ॥ पृथिवीं लाङ्गलेनेह भित्त्वा बीजं वपत्युत । आस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम् ॥ ४७ ॥ वृष्टिश्चेन्नानुगृह्णीयादनेनास्तत्र कर्षकः । यदन्यः पुरुषः कुर्यात् तत् कृतं सफलं मया ॥ ४८ ॥ तच्चेदं फलमस्माकमपराधो न मे क्वचित् । इति धीरोऽन्ववेक्ष्यैव नात्मानं तत्र गर्हयेत् ॥ ४९ ॥ किसान हलसे पृथ्वीको चीरकर उसमें बीज बोता है और फिर चुपचाप बैठा रहता है; क्योंकि उसे सफल बनानेमें मेघ कारण हैं। यदि वृष्टिने अनुग्रह नहीं किया तो उसमें किसानका कोई दोष नहीं है। वह किसान मन-ही-मन यह सोचता है कि दूसरे लोग जोतने-बोनेका जो सफल कार्य जैसे करते हैं, वह सब मैंने भी किया है। उस दशामें यदि मुझे ऐसा प्रतिकूल फल मिला तो इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है—ऐसा विचार करके उस असफलताके लिये वह बुद्धिमान् किसान अपनी निन्दा नहीं करता ॥ ४७—४९ ॥ कुर्वतो नार्थसिद्धिर्मे भवतीति ह भारत । निर्वेदो नात्र कर्तव्यो द्वावन्यौ ह्यत्र कारणम् ॥ ५० ॥ भारत! पुरुषार्थ करनेपर भी यदि अपनेको सिद्धि न प्राप्त हो तो इस बातको लेकर मन-ही-मन खिन्न नहीं होना चाहिये; क्योंकि फलकी सिद्धिमें पुरुषार्थके सिवा दो और भी कारण हैं—प्रारब्ध और ईश्वरकृपा ॥ ५० ॥ सिद्धिर्वाप्यथवासिद्धिर्प्रवृत्तिरतोऽन्यथा । बहूनां समवाये हि भावानां कर्म सिद्ध्यति ॥ ५१ ॥ महाराज! कार्यमें सिद्धि प्राप्त होगी या असिद्धि, ऐसा संदेह मनमें लेकर आप कर्ममें प्रवृत्त ही न हों, यह उचित नहीं है; क्योंकि बहुत-से कारण एकत्र होनेपर ही कर्ममें सफलता