भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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मिलती है ॥ ५१ ॥ गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव च । अनारम्भे हि न फलं न गुणो दृश्यते क्वचित् ॥ ५२ ॥ कर्मोंमें किसी अंगकी कमी रह जानेपर थोड़ा फल हो सकता है। यह भी सम्भव है कि फल हो ही नहीं। परंतु कर्मका आरम्भ ही न किया जाय तब तो न कहीं फल दिखायी देगा और न कर्ताका कोई गुण (शौर्य आदि) ही दृष्टिगोचर होगा ॥ ५२ ॥

देशकालावुपायांश्च मङ्गलं स्वस्तिवृद्धये । युनक्ति मेधया धीरो यथाशक्ति यथाबलम् ॥ ५३ ॥ धीर मनुष्य मंगलमय कल्याणकी वृद्धिके लिये अपनी बुद्धिके द्वारा शक्ति तथा बलका विचार करते हुए देश-कालके अनुसार साम-दाम आदि उपायोंका प्रयोग करे ॥ ५३ ॥

अप्रमत्तेन तत् कार्यमुपदेष्टा पराक्रमः । भूयिष्ठं कर्मयोगेषु दृष्ट एव पराक्रमः ॥ ५४ ॥ सावधान होकर देश-कालके अनुरूप कार्य करे। इसमें पराक्रम ही उपदेशक (प्रधान) है। कार्यकी समस्त युक्तियोंमें पराक्रम ही सबसे श्रेष्ठ समझा गया है ॥ ५४ ॥

यत्र धीमानवेक्षेत श्रेयांसं बहुभिर्गुणैः । साम्नैवार्थं ततो लिप्सेत् कर्म चास्मै प्रयोजयेत् ॥ ५५ ॥ जहाँ बुद्धिमान् पुरुष शत्रुको अनेक गुणोंसे श्रेष्ठ देखे, वहाँ सामनीतिसे ही काम बनानेकी इच्छा करे और उसके लिये जो सन्धि आदि आवश्यक कर्तव्य हो, करे ॥ ५५ ॥

व्यसनं वास्य काङ्क्षेत विवासं वा युधिष्ठिर । अपि सिन्धोर्गिरिर्वापि किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः ॥ ५६ ॥ महाराज युधिष्ठिर! अथवा शत्रुपर कोई भारी संकट आने या देशसे उसके निकाले जानेकी प्रतीक्षा करे; क्योंकि अपना विरोधी यदि समुद्र अथवा पर्वत हो तो उसपर भी विपत्ति लानेकी इच्छा रखनी चाहिये, फिर जो मरणधर्मा मनुष्य है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ ५६ ॥

उत्थानयुक्तः सततं परेषामन्तरैषणे । आनृण्यमाप्नोति नरः परस्यात्मन एव च ॥ ५७ ॥ शत्रुओंके छिद्रका अन्वेषण करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहे। ऐसा करनेसे वह अपनी और दूसरे लोगोंकी दृष्टिमें भी निर्दोष होता है ॥ ५७ ॥

न त्वेवात्मावमन्तव्यः पुरुषेण कदाचन । न ह्यात्मपरिभूतस्य भूतिर्भवति शोभना ॥ ५८ ॥ मनुष्य कभी अपने-आपका अनादर न करे—अपने-आपको छोटा न समझे। जो स्वयं ही अपना अनादर करता है, उसे उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ५८ ॥

एवं संस्थितिका सिद्धिरियं लोकस्य भारत ।