भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2494

महात्मा पाण्डुनन्दनके पास दो दिव्य अक्षय तूणीर थे, इससे कुन्तीपुत्र शूरवीर अर्जुन रणभूमिमें पर्वतकी भाँति अविचल खड़े रहे ॥ १४ ॥ अश्वत्थाम्नः पुनर्बाणाः क्षिप्रमभ्यस्यतो रणे । जग्मुः परिक्षयं तूर्णमभूत् तेनाधिकोऽर्जुनः ॥ १५ ॥ परंतु संग्राममें शीघ्रतापूर्वक बार-बार शरसंधान करनेवाले अश्वत्थामाके बाण जल्दी समाप्त हो गये। इस कारण अर्जुन उसकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए ॥ १५ ॥ ततः कर्णो महाचापं विकृष्याभ्यधिकं तदा । अवाक्षिपत् ततः शब्दो हाहाकारो महानभूत् ॥ १६ ॥ तब कर्णने अपने महान् धनुषको बड़े जोरसे खींचकर टंकार की। उससे वहाँ महान् हाहाकारका शब्द होने लगा ॥ १६ ॥ ततश्चक्षुर्दधे पार्थो यत्र विस्फार्यते धनुः । ददर्श तत्र राधेयं तस्य कोपो व्यवर्धत ॥ १७ ॥ तब अर्जुनने जहाँ धनुषकी टंकार हो रही थी, उधर दृष्टि डाली, तो वहाँ राधानन्दन कर्ण दिखायी पड़ा। इससे उनका क्रोध बहुत बढ़ गया ॥ १७ ॥ स रोषवशमापन्नः कर्णमेव जिघांसया । तमैक्षत विवृत्ताभ्यां नेत्राभ्यां कुरुपुङ्गवः ॥ १८ ॥ तब कुरुश्रेष्ठ अर्जुन रोषके वशीभूत हो कर्णको ही मार डालनेकी इच्छासे दोनों आँखें फाड़-फाड़कर उसकी ओर देखने लगे ॥ १८ ॥ तथा तु विमुखे पार्थे द्रोणपुत्रस्य सायकान् । त्वरिताः पुरुषा राजन्नुपाजहुः सहस्रशः ॥ १९ ॥ राजन्! इस प्रकार जब अर्जुनने उधरसे दृष्टि हटाकर दूसरी ओर मुँह फेर लिया, तब बहुत-से सैनिक तुरंत वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने द्रोणपुत्रके हजारों बाणोंको (रणभूमिसे उठाकर) उन्हें समर्पित कर दिया ॥ १९ ॥ उत्सृज्य च महाबाहुर्द्रोणपुत्रं धनंजयः । अभिदुद्राव सहसा कर्णमेव सपत्नजित् ॥ २० ॥ तब शत्रुविजयी महाबाहु धनंजयने द्रोणपुत्रको वहीं छोड़कर सहसा कर्णपर ही धावा किया ॥ २० ॥ तमभिद्रुत्य कौन्तेयः क्रोधसंरक्तलोचनः । कामयन् द्वैरथं तेन युद्धं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥ और कर्णके पास पहुँचकर उसके साथ द्वन्द्वयुद्धकी इच्छा रखते हुए कुन्तीकुमारने क्रोधसे लाल आँखें करके यह बात कही ॥ २१ ॥