भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

महात्मा पाण्डुनन्दनके पास दो दिव्य अक्षय तूणीर थे, इससे कुन्तीपुत्र शूरवीर अर्जुन रणभूमिमें पर्वतकी भाँति अविचल खड़े रहे ॥ १४ ॥ अश्वत्थाम्नः पुनर्बाणाः क्षिप्रमभ्यस्यतो रणे । जग्मुः परिक्षयं तूर्णमभूत् तेनाधिकोऽर्जुनः ॥ १५ ॥ परंतु संग्राममें शीघ्रतापूर्वक बार-बार शरसंधान करनेवाले अश्वत्थामाके बाण जल्दी समाप्त हो गये। इस कारण अर्जुन उसकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए ॥ १५ ॥ ततः कर्णो महाचापं विकृष्याभ्यधिकं तदा । अवाक्षिपत् ततः शब्दो हाहाकारो महानभूत् ॥ १६ ॥ तब कर्णने अपने महान् धनुषको बड़े जोरसे खींचकर टंकार की। उससे वहाँ महान् हाहाकारका शब्द होने लगा ॥ १६ ॥ ततश्चक्षुर्दधे पार्थो यत्र विस्फार्यते धनुः । ददर्श तत्र राधेयं तस्य कोपो व्यवर्धत ॥ १७ ॥ तब अर्जुनने जहाँ धनुषकी टंकार हो रही थी, उधर दृष्टि डाली, तो वहाँ राधानन्दन कर्ण दिखायी पड़ा। इससे उनका क्रोध बहुत बढ़ गया ॥ १७ ॥ स रोषवशमापन्नः कर्णमेव जिघांसया । तमैक्षत विवृत्ताभ्यां नेत्राभ्यां कुरुपुङ्गवः ॥ १८ ॥ तब कुरुश्रेष्ठ अर्जुन रोषके वशीभूत हो कर्णको ही मार डालनेकी इच्छासे दोनों आँखें फाड़-फाड़कर उसकी ओर देखने लगे ॥ १८ ॥ तथा तु विमुखे पार्थे द्रोणपुत्रस्य सायकान् । त्वरिताः पुरुषा राजन्नुपाजहुः सहस्रशः ॥ १९ ॥ राजन्! इस प्रकार जब अर्जुनने उधरसे दृष्टि हटाकर दूसरी ओर मुँह फेर लिया, तब बहुत-से सैनिक तुरंत वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने द्रोणपुत्रके हजारों बाणोंको (रणभूमिसे उठाकर) उन्हें समर्पित कर दिया ॥ १९ ॥ उत्सृज्य च महाबाहुर्द्रोणपुत्रं धनंजयः । अभिदुद्राव सहसा कर्णमेव सपत्नजित् ॥ २० ॥ तब शत्रुविजयी महाबाहु धनंजयने द्रोणपुत्रको वहीं छोड़कर सहसा कर्णपर ही धावा किया ॥ २० ॥ तमभिद्रुत्य कौन्तेयः क्रोधसंरक्तलोचनः । कामयन् द्वैरथं तेन युद्धं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥ और कर्णके पास पहुँचकर उसके साथ द्वन्द्वयुद्धकी इच्छा रखते हुए कुन्तीकुमारने क्रोधसे लाल आँखें करके यह बात कही ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे अर्जुनाश्वत्थामयुद्धे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके समय अर्जुन और अश्वत्थामाके युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥

अर्जुन और कर्णका संवाद तथा कर्णका अर्जुनसे हारकर भागना

⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्टितमोऽध्यायः

अर्जुन और कर्णका संवाद तथा कर्णका अर्जुनसे हारकर भागना

अर्जुन उवाच

कर्ण यत् ते सभामध्ये बहु वाचा विकत्थितम् ।
न मे युधि समोऽस्तीति तदिदं समुपस्थितम् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**कर्ण! पहले कौरवोंकी सभामें तूने जो अपनी बहुत प्रशंसा करते हुए यह बात कही थी कि युद्धमें मेरे समान दूसरा कोई योद्धा नहीं है। (उसकी सचाईकी परीक्षाके लिये) यह युद्धका अवसर उपस्थित हो गया है ॥ १ ॥

सोऽद्य कर्ण मया सार्धं व्यवहृत्य महामृधे ।
ज्ञास्यस्यबलमात्मानं न चान्यानवमंस्यसे ॥ २ ॥
कर्ण! आज इस महासंग्राममें मेरे साथ भिड़कर तू अपनेको भलीभाँति निर्बल समझ लेगा और फिर कभी दूसरोंका अपमान नहीं करेगा ॥ २ ॥

अवोचः परुषा वाचो धर्ममुत्सृज्य केवलम् ।
इदं तु दुष्करं मन्ये यदिदं ते चिकीर्षितम् ॥ ३ ॥
पहले तूने केवल धर्मकी अवहेलना करके बड़ी कठोर बातें कही हैं, परंतु तू जो कुछ करना चाहता है, वह तेरे लिये मैं अत्यन्त दुष्कर समझता हूँ ॥ ३ ॥

यत् त्वया कथितं पूर्वं मामनासाद्य किंचन ।
तदद्य कुरु राधेय कुरुमध्ये मया सह ॥ ४ ॥
राधानन्दन! मेरे साथ भिड़न्त होनेके पहले कौरवोंकी सभामें तूने जो कुछ कहा है, आज मेरे साथ युद्ध करके वह सब सत्य कर दिखा ॥ ४ ॥

यत् सभायां स पाञ्चालीं क्लिश्यमानां दुरात्मभिः ।
दृष्टवानसि तस्याद्य फलमाप्नुहि केवलम् ॥ ५ ॥
अरे! भरी सभामें दुरात्मा कौरव पांचालराजकुमारी द्रौपदीको क्लेश दे रहे थे और तू मौजसे यह सब देखता रहा। आज केवल उस अत्याचारका फल भोग ले ॥ ५ ॥

धर्मपाशनिबद्धेन यन्मया मर्षितं पुरा ।
तस्य राधेय कोपस्य विजयं पश्य मे मृधे ॥ ६ ॥
पहले मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हुआ था। इसलिये मैंने सब कुछ (चुपचाप) सह लिया। परंतु राधापुत्र! आजके युद्धमें मेरे उस क्रोधका फल मेरी विजयके रूपमें अभी देख ले ॥ ६ ॥

वने द्वादश वर्षाणि यानि सोढानि दुर्मते । तस्याद्य प्रतिकोपस्य फलं प्राप्नुहि सम्प्रति ॥ ७ ॥ ओ दुर्मते! हमने बारह वर्षोंतक वनमें रहकर जो क्लेश सहन किये हैं, उनका बदला चुकानेके लिये आज मेरे बढ़े हुए क्रोधका फल तू अभी चख ले ॥ ७ ॥ एहि कर्ण मया सार्धं प्रतियुध्यस्व सङ्गरे । प्रेक्षकाः कुरवः सर्वे भवन्तु तव सैनिकाः ॥ ८ ॥ कर्ण! आ, रणभूमिमें मेरा सामना कर। समस्त कौरव और तेरे सैनिक सब दर्शक होकर हमारे युद्धको देखें ॥

कर्ण उवाच

ब्रवीषि वाचा यत् पार्थ कर्मणा तत् समाचर । अतिशेते हि ते वाक्यं कर्मैतत् प्रथितं भुवि ॥ ९ ॥ कर्णने कहा—कुन्तीपुत्र! तू मुझसे जो कुछ कहता है, उसे क्रियाद्वारा करके दिखा। तेरी बातें कार्य करनेकी अपेक्षा बहुत बढ़-चढ़कर होती हैं। यह बात भूमण्डलमें प्रसिद्ध है ॥ ९ ॥ यत् त्वया मर्षितं पूर्वं तदशक्तेन मर्षितम् । इतो गृह्णीमहे पार्थ तव दृष्ट्वा पराक्रमम् ॥ १० ॥ पार्थ! तेरा यह जबानी पराक्रम देखकर तो हम इसी परिणामपर पहुँचते हैं कि तूने पहले जो कुछ सहन किया है, वह अपनी असमर्थताके ही कारण किया है ॥ १० ॥ धर्मपाशनिबद्धेन यत् त्वया मर्षितं पुरा । तथैव बद्धमात्मानमबद्धमिव मन्यसे ॥ ११ ॥ यदि तूने पहले धर्मके बन्धनमें बँधकर कष्ट सहन किया है, तो आज भी तू उसी प्रकार बँधा हुआ है; तो भी तू अपने-आपको उस बन्धनसे मुक्त-सा मान रहा है ॥ ११ ॥ यदि तावद् वने वासो यथोक्तश्चरितस्त्वया । तत् त्वं धर्मार्थवित् क्लिष्टः स मया योद्धुमिच्छसि ॥ १२ ॥ यदि तूने वनवासके पूर्वोक्त नियमका भलीभाँति पालन कर लिया है, तो तू धर्म और अर्थका ज्ञाता ठहरा। इसलिये तूने कष्ट सहा है और उसीको याद करके इस समय मेरे साथ लड़ना चाहता है ॥ १२ ॥ यदि शक्रः स्वयं पार्थ युध्यते तव कारणात् । तथापि न व्यथा काचिन्मम स्याद् विक्रमिष्यतः ॥ १३ ॥ पार्थ! यदि इस समय साक्षात् इन्द्र भी तेरे लिये युद्ध करने आयें, तो भी युद्धमें पराक्रम दिखाते हुए मुझको किसी प्रकारकी व्यथा न होगी ॥ १३ ॥ अयं कौन्तेय कामस्ते नचिरात् समुपस्थितः ।

योत्स्यसे हि मया सार्धमद्य द्रक्ष्यसि मे बलम् ॥ १४ ॥ कुन्तीकुमार! मेरे साथ युद्धका जो तेरा हौसला है, वह अभी-अभी प्रकट हुआ है। अतः अब मेरे साथ तेरा युद्ध होगा और आज तू मेरा बल स्वयं देख लेगा ॥ १४ ॥

अर्जुन उवाच

इदानीमेव तावत् त्वमपयातो रणान्मम । तेन जीवसि राधेय निहतस्त्वनुजस्तव ॥ १५ ॥ **अर्जुन बोले—**राधापुत्र! अभी कुछ ही देर पहलेकी बात है, मेरे सामने युद्धसे पीठ दिखाकर तू भाग गया था, इसीलिये अबतक जी रहा है; किंतु तेरा छोटा भाई मारा गया ॥ १५ ॥

भ्रातरं घातयित्वा कस्त्यक्त्वा रणशिरश्च कः । त्वदन्यः कः पुमान् सत्सु ब्रूयादेवं व्यवस्थितः ॥ १६ ॥ तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपने भाईको मरवाकर और युद्धका मुहाना छोड़कर (भाग जानेके बाद भी) भलेमानसोंके बीचमें खड़ा हो ऐसी डींग मारेगा? ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

इति कर्णं ब्रुवन्नेव बीभत्सुरपराजितः । अभ्ययाद् विसृजन् बाणान् कायावरणभेदिनः ॥ १७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुन किसीसे भी परास्त होनेवाले नहीं थे। वे कर्णसे उपर्युक्त बातें कहकर कवचको भी विदीर्ण कर देनेवाले बाण छोड़ते हुए उसकी ओर बढ़े ॥ १७ ॥

प्रतिजग्राह तं कर्णः प्रीयमाणो महारथः । महता शरवर्षेण वर्षमाणमिवाम्बुदम् ॥ १८ ॥ महारथी कर्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ मेघके सदृश बाणोंकी दृष्टि करनेवाले अर्जुनको अपने सायकोंकी भारी बौछार करके रोका ॥ १८ ॥

उत्पेतुः शरजालानि घोररूपाणि सर्वशः । अविध्यदश्वांश्च बाह्वोश्च हस्तावापं पृथक् पृथक् ॥ १९ ॥ सोऽमृष्यमाणः कर्णस्य निषङ्गस्यावलम्बनम् । चिच्छेद निशिताग्रेण शरेण नतपर्वणा ॥ २० ॥ फिर तो आकाशमें सब ओर भयंकर बाणोंके समूह उड़ने लगे। अर्जुनसे यह सहन न हो सका; अतः उन्होंने झुकी हुई गाँठ एवं तीखी नोकवाले बाणसे कर्णके घोड़ोंको बींध डाला। भुजाओंमें भी गहरी चोट पहुँचायी और हाथोंके दस्तानोंको भी पृथक्-पृथक् विदीर्ण

कर दिया। इतना ही नहीं, कर्णके भाथा लटकानेकी रस्सीको भी काट गिराया ।। १९-२० ।।

उपासङ्गादुपादाय कर्णो बाणानथापरान् ।
विव्याध पाण्डवं हस्ते तस्य मुष्टिरशीर्यत ।। २१ ।।
तब कर्णने (अलग रखे हुए) छोटे तरकससे दूसरे बाण लेकर पाण्डुनन्दन अर्जुनके हाथमें चोट पहुँचायी। इससे उनकी मुट्ठी ढीली पड़ गयी ।। २१ ।।

ततः पार्थो महाबाहुः कर्णस्य धनुरच्छिनत् ।
स शक्तिं प्राहिणोत् तस्मै तां पार्थो व्यधमच्छरैः ।। २२ ।।
तब महाबाहु पार्थने कर्णका धनुष काट दिया। यह देख कर्णने अर्जुनपर शक्ति चलायी; किंतु पार्थने उसे बाणोंसे नष्ट कर दिया ।। २२ ।।

ततोऽनुपेतुर्बहवो राधेयस्य पदानुगाः ।
तांश्च गाण्डीवनिर्मुक्तैः प्राहिणोद् यमसादनम् ।। २३ ।।
इतनेमें ही राधापुत्र कर्णके बहुत-से सैनिक वहाँ आ पहुँचे, किंतु अर्जुनने गाण्डीवद्वारा छोड़े हुए बाणोंसे मारकर उन सबको यमलोक भेज दिया ।। २३ ।।

ततोऽस्याश्वाञ्छरैस्तीक्ष्णैर्बीभत्सुर्भारसाधनैः ।
आकर्णमुक्तैरवधीत् ते हताः प्रापतन् भुवि ।। २४ ।।
तत्पश्चात् बीभत्सुने भार (शत्रुओंके आघात) सहनेमें समर्थ तीखे बाणोंद्वारा, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये थे, कर्णके घोड़ोंको घायल कर दिया। वे घोड़े मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। २४ ।।

अथापरेण बाणेन ज्वलितेन महौजसा ।
विव्याध कर्णं कौन्तेयस्तीक्ष्णेनोरसि वीर्यवान् ।। २५ ।।
तत्पश्चात् पराक्रमी कुन्तीकुमारने महान् तेजस्वी तथा अग्निके समान प्रज्वलित दूसरे बाणद्वारा कर्णकी छातीमें आघात किया ।। २५ ।।

तस्य भित्त्वा तनुत्राणं कायमभ्यगमच्छरः ।
ततः स तमसाऽऽविष्टो न स्म किंचित् प्रजज्ञिवान् ।। २६ ।।
यह बाण कर्णका कवच काटकर उसके वक्षःस्थलके भीतर घुस गया। इससे कर्णको मूर्च्छा आ गयी और उसे किसी भी बातकी सुध-बुध न रही ।। २६ ।।

स गाढवेदनो हित्वा रणं प्रायादुदङ्मुखः ।
ततोऽर्जुन उदक्रोशदुत्तरश्च महारथः ।। २७ ।।
कर्णको उस चोटसे बड़ी भारी वेदना हुई और वह युद्धभूमिको छोड़कर उत्तर दिशाकी ओर भागा। यह देख अर्जुन और उत्तर दोनों महारथी जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ।। २७ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि कर्णापयाने षष्टितमोऽध्यायः ।। ६० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें कर्णका पलायनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६० ।।

अध्याय (पृष्ठ 2501)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकषष्टितमोऽध्यायः

अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दुःशासन आदिकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

ततो वैकर्तनं जित्वा पार्थो वैराटिमब्रवीत् ।
एतन्मां प्रापयानीकं यत्र तालो हिरण्मयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार वैकर्तन कर्णको जीतकर अर्जुनने विराटकुमार उत्तरसे कहा—'सारथे! तुम मुझे इस सेनाकी ओर ले चलो, जिसकी ध्वजापर सुवर्णमय ताड़ वृक्षका चिह्न है ॥ १ ॥

अत्र शान्तनवो भीष्मो रथेऽस्माकं पितामहः ।
काङ्क्षमाणो मया युद्धं तिष्ठत्यमरदर्शनः ॥ २ ॥
'उस रथपर हम सबके पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मजी बैठे हैं। वे मेरे साथ युद्धकी इच्छा रखकर खड़े हैं। उनका दर्शन देवताओंके समान है' ॥ २ ॥

अथ सैन्यं महत् दृष्ट्वा रथनागहयाकुलम् ।
अब्रवीदुत्तरः पार्थमपविद्धः शरैर्भृशम् ॥ ३ ॥
नाहं शक्ष्यामि वीरेह नियन्तुं ते हयोत्तमान् ।
विषीदन्ति मम प्राणा मनो विह्वलतीव मे ॥ ४ ॥
यह सुनकर उत्तरने, जो बाणोंसे अत्यन्त घायल हो चुका था, रथों, हाथियों और घोड़ोंसे भरी हुई विशाल सेनाकी ओर देखकर कहा—'वीर! अब मैं युद्धभूमिमें आपके उत्तम घोड़ोंको नहीं सँभाल सकूँगा। मेरे प्राण बड़ी व्यथामें हैं और मन व्याकुल-सा हो रहा है' ॥ ३-४ ॥

अस्त्राणामिव दिव्यानां प्रभावः सम्प्रयुज्यताम् ।
त्वया च कुरुभिश्चैव द्रवन्तीव दिशो दश ॥ ५ ॥
'आपके तथा कौरव वीरोंके द्वारा प्रयुक्त होनेवाले दिव्यास्त्रोंका प्रभाव यह है कि मुझे दसों दिशाएँ भागती-सी प्रतीत होती हैं ॥ ५ ॥

गन्धेन मूर्च्छितश्चाहं वसारुधिरमेदसाम् ।
द्वैधीभूतं मनो मेऽद्य तव चैव प्रपश्यतः ॥ ६ ॥
'मैं चर्बी, रक्त और मेदकी गन्धसे मूर्च्छित हो रहा हूँ। आज आपके देखते-देखते मेरा मन दुविधामें पड़ गया है' ॥ ६ ॥

अदृष्टपूर्वः शूराणां मया संख्ये समागमः ।

गदापातेन महता शङ्खानां निःस्वनेन च ।। ७ ।। सिंहनादैश्च शूराणां गजानां बृंहितैस्तथा । गाण्डीवशब्देन भृशमशनिप्रतिमेन च । श्रुतिः स्मृतिश्च मे वीर प्रणष्टा मूढचेतसः ।। ८ ।। ‘युद्धमें इतने शूरवीरोंका जमघट मैंने पहले कभी नहीं देखा था। वीरवर! गदाओंके भारी आघात, शंखोंके भयंकर शब्द, शूरवीरोंके सिंहनाद, हाथियोंके चिग्घाड़ तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान गाण्डीव धनुषकी भारी टंकारध्वनिसे मेरा चित्त मोहित हो गया है। मेरी श्रवणशक्ति और स्मरणशक्ति भी जवाब दे चुकी है ।। ७-८ ।।

अलातचक्रप्रतिमं मण्डलं सततं त्वया । व्याक्षिप्यमाणं समरे गाण्डीवं च प्रकर्षता । दृष्टिः प्रचलिता वीर हृदयं दीर्यतीव मे ।। ९ ।। ‘रणभूमिमें आप निरन्तर गाण्डीव धनुषको खींचते और टंकारते रहते हैं, जिससे यह अलातचक्रके समान गोल प्रतीत होता है। उसे देखकर मेरी आँखें चौंधिया रही हैं तथा हृदय फटा-सा जा रहा है ।। ९ ।।

वपुश्चोग्रं तव रणे क्रुद्धस्येव पिनाकिनः । व्यायच्छतस्तव भुजं दृष्ट्वा भीर्मे भवत्यपि ।। १० ।। ‘इस संग्राममें कुपित हुए पिनाकपाणि भगवान् रुद्रकी भाँति आपका शरीर भयानक जान पड़ता है और लगातार धनुष-बाण चलानेके व्यायाममें संलग्न रहनेवाले आपकी भुजाओंको देखकर भी मुझे भय लगता है ।। १० ।।

नाददानं न संधानं न मुञ्चन्तं शरोत्तमान् । त्वामहं सम्प्रपश्यामि पश्यन्नपि न चेतनः ।। ११ ।। ‘आप कब उत्तम बाणोंको हाथमें लेते, कब धनुषपर रखते और कब उन्हें छोड़ते हैं, यह सब मैं नहीं देख पाता और देखनेपर भी मुझे चेत नहीं रहता ।। ११ ।।

अवसीदन्ति मे प्राणा भूरियं चलतीव च । न च प्रतोदं रश्मींश्च संयन्तुं शक्तिरस्ति मे ।। १२ ।। ‘इस समय मेरे प्राण अकुला रहे हैं। यह पृथ्वी काँपती-सी जान पड़ती है। इस समय मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि घोड़ोंकी रास सँभालूँ और चाबुक लेकर इन्हें हाँकूँ’ ।। १२ ।।

अर्जुन उवाच

मा भैषीः स्तम्भयात्मानं त्वयापि नरपुङ्गव । अत्यद्भुतानि कर्माणि कृतानि रणमूर्धनि ।। १३ ।। **अर्जुन बोले—**नरश्रेष्ठ! डरो मत। अपने-आपको सँभालो। तुमने भी युद्धके मुहानेपर बड़े अद्भुत पराक्रम दिखाये हैं ।। १३ ।।

राजपुत्रोऽसि भद्रं ते कुले मत्स्यस्य विश्रुते ।
जातस्त्वं शत्रुदमने नावसीदितुमर्हसि ॥ १४ ॥
धृतिं कृत्वा सुविपुलां राजपुत्र रथे मम ।
युध्यमानस्य समरे हयान् संयच्छ शत्रुहन् ॥ १५ ॥
तुम राजकुमार हो। तुम्हारा कल्याण हो। तुमने मत्स्यनरेशके विख्यात वंशमें जन्म ग्रहण किया है; अतः शत्रुओंके संहारके अवसरपर तुम्हें शिथिल नहीं होना चाहिये। राजपुत्र! तुम तो शत्रुओंका नाश करनेवाले हो, अतः पूर्णरूपसे धैर्य धारण करके रथपर बैठो और युद्ध करते समय मेरे घोड़ोंको काबूमें रखो ॥ १४-१५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा महाबाहुर्वैराटिं नरसत्तमः ।
अर्जुनो रथिनां श्रेष्ठ उत्तरं वाक्यमब्रवीत् ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार समझा-बुझाकर रथियोंमें श्रेष्ठ और मनुष्योंमें सर्वोत्तम महाबाहु अर्जुन विराट-कुमार उत्तरसे पुनः यह वचन बोले— ॥ १६ ॥
सेनाग्रमाशु भीष्मस्य प्रापयस्वैतदेव माम् ।
आच्छेत्स्याम्यहमेतस्य धनुर्ज्यामपि चाहवे ॥ १७ ॥
‘राजकुमार! तुम शीघ्र ही पितामह भीष्मकी इसी सेनाके सामने मेरा रथ ले चलो, मुझे पहुँचाओ। इस युद्धमें मैं इनकी प्रत्यंचा भी काट डालूँगा ॥ १७ ॥
अस्यन्तं दिव्यमस्त्रं मां चित्रमद्य निशामय ।
शतह्रदामिवायान्तीं स्तनयित्नोरिवाम्बरे ॥ १८ ॥
सुवर्णपृष्ठं गाण्डीवं द्रक्ष्यन्ति कुरवो मम ।
दक्षिणेनाथ वामेन कतरेण स्विदस्यति ॥ १९ ॥
इति मां सङ्गताः सर्वे तर्कयिष्यन्ति शत्रवः ।
शोणितोदां रथावर्तां नागनक्रां दुरत्ययाम् ।
नदीं प्रस्कन्दयिष्यामि परलोकप्रवाहिनीम् ॥ २० ॥
‘आज मुझे विचित्र दिव्यास्त्रोंका प्रहार करते देखो। जैसे आकाशमें मेघोंकी घटासे बिजली प्रकट होती है, उसी प्रकार (बाणोंकी विद्युच्छटा प्रकट करनेवाले) मेरे गाण्डीव धनुषको, जिसके पृष्ठभागमें सोना मढ़ा है, आज कौरवलोग विस्मित होकर देखेंगे। आज सारी शत्रुमण्डली इकट्ठी होकर यह अनुमान लगायेगी कि अर्जुन किस हाथसे बाण चलाते हैं? दाहिने हाथसे या बायेंसे? आज मैं परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली (शत्रुसेनारूप) दुर्लङ्घ्य नदीको मथ डालूँगा, जिसमें रक्त ही जल है, रथ भँवर हैं और हाथी ग्राहके स्थानमें हैं ॥ १८—२० ॥
पाणिपादशिरःपृष्ठबाहुशाखानिरन्तरम् ।

वनं कुरूणां छेत्स्यामि शरैः संनतपर्वभिः ॥ २१ ॥ 'आज झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा कौरवसेनारूपी जंगलको काट डालूँगा। हाथ, पैर, सिर, पृष्ठ (पीठ) तथा बाहु आदि अङ्ग ही विविध शाखाओंके रूपमें फैलकर इस कौरव-वनको सघन किये हुए हैं ॥ २१ ॥

जयतः कौरवीं सेनामेकस्य मम धन्विनः । शतं मार्गा भविष्यन्ति पावकस्येव कानने ॥ २२ ॥ 'जैसे वनमें लगे हुए दावानलको आगे बढ़नेके लिये सैकड़ों मार्ग सुलभ होते हैं, उसी प्रकार कौरवसेनापर विजय पानेवाले मुझ एकमात्र धनुर्धर वीरके लिये इसमें सैकड़ों मार्ग प्रकट हो जायेंगे ॥ २२ ॥

मया चक्रमिवाविद्धं सैन्यं द्रक्ष्यसि केवलम् । इष्वस्त्रे शिक्षितं चित्रमहं दर्शयितास्मि ते ॥ २३ ॥ 'मेरे बाणोंसे घायल हुई सारी सेनाको तुम चक्रकी भाँति घूमती हुई देखोगे। आज तुम्हें बाणविद्यामें प्राप्त की हुई अपनी विचित्र शिक्षाका परिचय कराऊँगा ॥ २३ ॥

असम्भ्रान्तो रथे तिष्ठ समेषु विषमेषु च । दिवमावृत्य तिष्ठन्तं गिरिं भिन्द्यां स्म पत्रिभिः ॥ २४ ॥ 'तुम सम-विषम (ऊँची-नीची) भूमियोंमें सम्भ्रमरहित (सावधान) होकर रथपर बैठो (और घोड़ोंकी सँभाल रखो)। आज मैं सारे आकाशको घेरकर खड़े हुए (महान्) पर्वतको भी अपने बाणोंसे विदीर्ण कर डालूँगा ॥

अहमिन्द्रस्य वचनात् संग्रामेऽभ्यहनं पुरा । पौलोमान् कालखञ्जांश्च सहस्राणि शतानि च ॥ २५ ॥ 'मैंने पहले देवराज इन्द्रकी आज्ञासे युद्धमें उनके शत्रु पौलोम और कालखंज नामक लाखों दानवोंका वध किया है ॥ २५ ॥

अहमिन्द्राद् दृढां मुष्टिं ब्रह्मणः कृतहस्तताम् । प्रगाढे तुमुलं चित्रमिति विद्धि प्रजापतेः ॥ २६ ॥ 'तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैंने धनुष पकड़ते समय मुट्ठीको दृढ़ रखना इन्द्रसे, बाण चलाते समय हाथोंकी फुर्ती ब्रह्माजीसे तथा संकटके समय विचित्र प्रकारसे तुमुल युद्ध करनेकी कला प्रजापतिसे सीखी है ॥ २६ ॥

अहं पारे समुद्रस्य हिरण्यपुरवासिनाम् । जित्वा षष्टिं सहस्राणि रथिनामुग्रधन्विनाम् ॥ २७ ॥ 'पहलेकी बात है, मैंने समुद्रके उस पार हिरण्यपुरमें निवास करनेवाले साठ हजार अत्यन्त भयंकर धनुर्धर महारथियोंको परास्त किया था ॥ २७ ॥

शीर्यमाणानि कूलानि प्रवृद्धेनेव वारिणा । मया कुरूणां वृन्दानि पात्यमानानि पश्य वै ॥ २८ ॥

‘आज देख लेना, जैसे प्रबल वेगसे आयी हुई जलकी बाढ़ किनारोंको काट-काटकर

गिरा देती है, उसी प्रकार मैं कौरवदलके सैन्यसमूहोंको मार गिराऊँगा ।।

ध्वजवृक्षं पत्तितृणं रथसिंहगणायुतम् ।

वनमादीपयिष्यामि कुरूणामस्त्रतेजसा ।। २९ ।।

‘कौरवोंकी सेना एक जंगलके समान है, उसमें ध्वज ही वृक्ष हैं, पैदल सैनिक घास-

फूस हैं तथा रथ ही सिंहोंके स्थानमें हैं। मैं अपने अस्त्र-शस्त्ररूपी अग्निसे आज इस

कौरववनको जलाकर भस्म कर दूँगा ।। २९ ।।

तानहं रथनीडेभ्यः शरैः संनतपर्वभिः ।

यत्तान् सर्वानतिबलान् योत्स्यमानानवस्थितान् ।

एकः संकालयिष्यामि वज्रपाणिरिवासुरान् ।। ३० ।।

‘जैसे व्याध घोंसलेमें बैठे हुए पक्षियोंको भी मार गिराता है, उसी प्रकार मैं मुड़ी हुई

नोकवाले (तीखे) बाणोंसे मारकर उन सभी कौरववीरोंको रथोंकी बैठकोंसे नीचे गिरा दूँगा।

जैसे वज्रधारी इन्द्र अकेले ही समस्त असुरोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार मैं भी

अकेला ही यहाँ युद्धके लिये सावधान होकर खड़े हुए समस्त महाबली योद्धाओंका

भलीभाँति विनाश कर डालूँगा ।।

रौद्रं रुद्रादहं ह्यस्त्रं वारुणं वरुणादपि ।

अस्त्रमाग्नेयमग्नेश्च वायव्यं मातरिश्वनः ।

वज्रादीनि तथास्त्राणि शक्रादहमवाप्तवान् ।। ३१ ।।

‘मैंने भगवान् रुद्रसे रौद्रास्त्रकी, वरुणसे वारुणास्त्रकी, अग्निसे आग्नेयास्त्रकी और

वायु देवतासे वायव्यास्त्रकी शिक्षा प्राप्त की है। इसी प्रकार साक्षात् इन्द्रसे मैंने वज्र आदि

अस्त्र प्राप्त किये हैं ।। ३१ ।।

धार्तराष्ट्रवनं घोरं नरसिंहाभिरक्षितम् ।

अहमुत्पाटयिष्यामि वैराटे व्येतु ते भयम् ।। ३२ ।।

‘वीर मानवरूपी सिंहोंसे सुरक्षित इस भयंकर कौरववनको मैं अकेला ही उजाड़

डालूँगा, अतः विराटकुमार! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये’ ।। ३२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमाश्वासितस्तेन वैराटिः सव्यसाचिना ।

व्यवागाहद् रथानीकं भीमं भीष्माभिरक्षितम् ।। ३३ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! सव्यसाची अर्जुनके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर

विराटकुमार उत्तरने भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित रथियोंकी भयंकर सेनामें प्रवेश

किया ।। ३३ ।।

तमायान्तं महाबाहुं जिगीषन्तं रणे कुरून् ।

अभ्यवारयदव्यग्रः क्रूरकर्माऽऽपगासुतः ॥ ३४ ॥
रणभूमिमें कौरवोंको जीतनेकी इच्छासे आते हुए महाबाहु अर्जुनको कठोर कर्म करनेवाले गङ्गानन्दन भीष्मने बिना किसी घबराहटके रोक दिया ॥ ३४ ॥
तस्य जिष्णुरुपावृत्य ध्वजं मूलादपातयत् ।
विकृष्य कलधौताग्रैः स विद्धः प्रापतद् भुवि ॥ ३५ ॥
तब अर्जुनने उनकी ओर घूमकर सुनहरी धारवाले बाणोंसे भीष्मजीकी ध्वजाको जड़से काट गिराया, बाणोंसे छिद जानेके कारण वह ध्वजा पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३५ ॥
तं चित्रमाल्याभरणाः कृतविद्या मनस्विनः ।
आगच्छन् भीमधन्वानं चत्वारश्च महाबलाः ॥ ३६ ॥
दुःशासनो विकर्णश्च दुःसहोऽथ विविंशतिः ।
आगत्य भीमधन्वानं बीभत्सुं पर्यवारयन् ॥ ३७ ॥
इतनेहीमें विचित्र माला और आभूषणोंसे विभूषित और अस्त्रसंचालनकी विद्यामें निपुण चार महाबली मनस्वी वीर दुःशासन, विकर्ण, दुःसह और विविंशति वहाँ भयंकर धनुषवाले अर्जुनपर चढ़ आये और वहाँ आकर उन्होंने उग्रधन्वा बीभत्सुको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३६-३७ ॥
दुःशासनस्तु भल्लेन विद्ध्वा वैराटमुत्तरम् ।
द्वितीयेनार्जुनं वीरः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ ३८ ॥
वीर दुःशासनने भल्ल नामक एक बाणसे विराटकुमार उत्तरको घायल करके दूसरेसे अर्जुनकी छाती छेद डाली ॥ ३८ ॥
तस्य जिष्णुरुपावृत्य पृथुधारेण कार्मुकम् ।
चकर्त गार्ध्रपत्रेण जातरूपपरिष्कृतम् ॥ ३९ ॥
तब अर्जुन उसकी ओर मुड़े और मोटी धार और गीधकी पाँख-जैसे पंखवाले बाणसे उन्होंने दुःशासनके सुवर्णजटित धनुषको काट डाला ॥ ३९ ॥
अथैनं पञ्चभिः पश्चात् प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ।
सोऽपयातो रणं हित्वा पार्थबाणप्रपीडितः ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् उसकी छातीमें भी पाँच बाण मारे। पार्थके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो दुःशासन युद्ध छोड़कर भाग गया ॥ ४० ॥
तं विकर्णः शरैस्तीक्ष्णैर्गृध्रपत्रैरजिह्मगैः ।
विव्याध परवीरघ्नमर्जुनं धृतराष्ट्रजः ॥ ४१ ॥
तब धृतराष्ट्रपुत्र विकर्णने शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले अर्जुनको सीधे लक्ष्यकी ओर जानेवाले गृध्रपत्रयुक्त तीखे बाणोंसे बींध डाला ॥ ४१ ॥
ततस्तमपि कौन्तेयः शरेणानतपर्वणा ।
ललाटेऽभ्यहनत् तूर्णं स विद्धः प्रापतद् रथात् ॥ ४२ ॥

तत्पश्चात् कुन्तीनन्दन अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उसको भी ललाटमें बींध डाला। उस बाणसे घायल होकर विकर्ण तुरंत ही रथसे नीचे गिर पड़ा ॥ ४२ ॥

ततः पार्थमभिद्रुत्य दुःसहः सविविंशतिः ।
अवाकिरच्छरैस्तीक्ष्णैः परीप्सुर्भ्रातरं रणे ॥ ४३ ॥
तब दुःसह और विविंशति अर्जुनकी ओर दौड़े और युद्धमें भाईका बदला लेनेके लिये उनके ऊपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४३ ॥

तावुभौ गार्ध्रपत्राभ्यां निशिताभ्यां धनंजयः ।
विद्ध्वा युगपदव्यग्रस्तयोर्वाहानसूदयत् ॥ ४४ ॥
फिर धनंजयने गृध्रकी पाँखोंवाले दो तीखे बाणोंद्वारा उन दोनोंको एक ही साथ घायल करके बिना किसी घबराहटके उनके घोड़ोंको भी मार गिराया ॥ ४४ ॥

तौ हताश्वौ विभिन्नाङ्गौ धृतराष्ट्रात्मजावुभौ ।
अभिपत्य रथैरन्यैरपनीतौ पदानुगैः ॥ ४५ ॥
घोड़ोंके मारे जाने और शरीरके बिंध जानेपर उन दोनों धृतराष्ट्रकुमारोंके पास उनके सेवक आ पहुँचे और उन्हें दूसरे रथपर डालकर अन्यत्र हटा ले गये ॥ ४५ ॥

सर्वा दिशश्चाभ्यपतद् बीभत्सुरपराजितः ।
किरीटमाली कौन्तेयो लब्धलक्षो महाबलः ॥ ४६ ॥
किसीसे परास्त न होनेवाले किरीट-मालाधारी महाबली कुन्तीनन्दन अर्जुनका निशाना कभी चूकता नहीं था। वे उस सेनामें सब ओर विचरने लगे ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि अर्जुनदुःशासनादियुद्धे
एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें अर्जुनदुःशासन आदिके युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2508)

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द्विषष्टितमोऽध्यायः

अर्जुनका सब योद्धाओं और महारथियोंके साथ युद्ध

वैशम्पायन उवाच

अथ संगम्य सर्वे ते कौरवाणां महारथाः ।
अर्जुनं सहिता यत्ताः प्रत्ययुध्यन्त भारत ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर कौरवसेनाके सब महारथी मिलकर एक साथ संगठित हो बड़ी सावधानीके साथ अर्जुनका सामना करने लगे ॥ १ ॥

स सायकमयैर्जालैः सर्वतस्तान् महारथान् ।
प्राच्छादयदमेयात्मा नीहारेणेव पर्वतान् ॥ २ ॥
परंतु असीम आत्मबलसे सम्पन्न कुन्तीपुत्रने सब ओर सायकोंका जाल-सा बिछाकर कुहरेसे ढके हुए पहाड़ोंकी तरह उन सब महारथियोंको आच्छादित कर दिया ॥ २ ॥

नदद्भिश्च महानागैर्ह्रेषमाणैश्च वाजिभिः ।
भेरीशङ्खनिनादैश्च स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ ३ ॥
बड़े-बड़े गजराजोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने और नगाड़ों तथा शंखोंके बजाये जानेसे जो शब्द हुए, उनके एकत्र मिलनेसे उस रणभूमिमें भारी कोलाहल मच गया ॥ ३ ॥

नराश्वकायान् निर्भिद्य लौहानि कवचानि च ।
पार्थस्य शरजालानि विनिष्पेतुः सहस्रशः ॥ ४ ॥
पार्थके सहस्रों बाणसमुदाय मनुष्यों और घोड़ोंके शरीरोंको छेदकर और उनके लोहेके बने हुए कवचोंको भी छिन्न-भिन्न करके नीचे गिरा रहे थे ॥ ४ ॥

त्वरमाणः शरासन्यन् पाण्डवः प्रबभौ रणे ।
मध्यंदिनगतोऽर्चिष्माञ्छरदीव दिवाकरः ॥ ५ ॥
जैसे शरद्‌ऋतुके (निर्मल आकाशमें) दोपहरका सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणें फैलाकर प्रकाशित होता है, उसी प्रकार संग्राममें पाण्डुनन्दन अर्जुन शत्रुसेनापर उतावलीके साथ बाणवर्षा करते हुए सुशोभित होते थे ॥ ५ ॥

उपप्लवन्ति वित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तथा ।
सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चैव पदातयः ॥ ६ ॥
उस समय अत्यन्त भयभीत होकर रथी सैनिक रथोंसे कूदकर और घुड़सवार घोड़ोंकी पीठसे उछलकर जान लेकर भाग चले और पैदल योद्धा तो भूमिपर थे ही; उन्होंने भी (डरके मारे) इधर-उधरकी राह ली ॥ ६ ॥

शरैः संछिद्यमानानां कवचानां महात्मनाम् ।
ताम्रराजतलौहानां प्रादुरासीन्महास्वनः ॥ ७ ॥

महामना शूरवीरोंके ताँबे, चाँदी और लोहेके बने हुए कवच जब बाणोंसे कटते थे, तब उनका बड़ा भारी शब्द होता था ॥ ७ ॥ छन्नमायोधनं सर्वं शरीरैर्गतचेतसाम् । गजाश्वसादिनां तत्र शितबाणात्तजीवितैः ॥ ८ ॥ रथोवस्थाभिपतितैरास्तृता मानवैर्मही । प्रनृत्यतीव संग्रामे चापहस्तो धनंजयः ॥ ९ ॥ कुछ ही देरमें युद्धका सारा मैदान मूर्च्छित हुए सैनिकोंके शरीरोंसे पट गया। तीखे बाणोंकी मारसे जिनके प्राण निकल गये थे, उन हाथीसवारों, घुड़सवारों तथा रथकी बैठकसे गिरे हुए मनुष्योंकी लाशोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी। उस समय ऐसा जान पड़ता था, जैसे धनुष हाथमें लिये अर्जुन युद्धभूमिमें सब ओर नाचते फिर रहे हों ॥ ८-९ ॥ श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । त्रस्तानि सर्वसैन्यानि व्यपागच्छन् महाहवात् ॥ १० ॥ कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपस्रजस्तथा । पतितानि स्म दृश्यन्ते शिरांसि रणमूर्धनि ॥ ११ ॥ गाण्डीवकी टंकार वज्रकी गड़गड़ाहटको भी मात कर रही थी। उसे सुनकर समस्त सैनिक भयभीत हो उस महान् संग्रामसे भाग निकले। युद्धके मुहानेपर कुण्डल और पगड़ी धारण किये असंख्य कटे हुए सिर पड़े दिखायी देते थे। कितने ही सोनेके हार इधर-उधर गिरे थे ॥ १०-११ ॥ विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्बाहुभिश्च सकार्मुकैः । सहस्ताभरणैश्चान्यैः प्रच्छन्ना भाति मेदिनी ॥ १२ ॥ अर्जुनके बाणोंसे मथित हुई लाशोंसे वहाँकी जमीन पट गयी थी। कितनी ही भुजाएँ कटकर गिरी थीं; जो अब भी (मुट्ठीमें दृढ़तापूर्वक) धनुष पकड़े हुए थीं। उन हाथोंमें बाजूबन्द, कड़े और अंगूठी आदि आभूषण सभी ज्यों-के-त्यों थे। इन सबसे आच्छादित होकर उस रणभूमिकी विचित्र शोभा हो रही थी ॥ १२ ॥ शिरसां पात्यमानानामन्तरा निशितैः शरैः । अश्मवृष्टिरिवाकाशादभवद् भरतर्षभ ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! बीचमें तीखे बाणोंसे काटकर गिराये जानेवाले योद्धाओंके मस्तकोंकी श्रेणी आकाशसे होनेवाली पत्थरोंकी वर्षा-सी जान पड़ती थी ॥ १३ ॥ दर्शयित्वा तथाऽऽत्मानं रौद्रं रुद्रपराक्रमः । अवरुद्धोऽचरत् पार्थो वर्षाणि त्रिदशानि च । क्रोधाग्निमुत्सृजन् वीरो धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः ॥ १४ ॥

भयानक पराक्रमी कुन्तीपुत्र अर्जुन तेरह वर्षोंतक वनमें विवश होकर रुके थे। अब (उपयुक्त अवसर पाकर) वे वीर पाण्डुकुमार धृतराष्ट्रके पुत्रोंपर अपनी क्रोधाग्नि बरसाते तथा अपने रौद्र रूपका दर्शन कराते हुए रणभूमिमें विचरने लगे ।। १४ ।।
तस्य तद् दहतः सैन्यं दृष्ट्वा चैव पराक्रमम् ।
सर्वे शान्तिपरा योधा धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ।। १५ ।।
कौरव-योद्धाओंको दग्ध करनेवाले अर्जुनका वह पराक्रम देखकर सभी सैनिक दुर्योधनके सामने ही ठण्डे पड़ गये ।। १५ ।।
वित्रासयित्वा तत् सैन्यं द्रावयित्वा महारथान् ।
अर्जुनो जयतां श्रेष्ठः पर्यवर्तत भारत ।। १६ ।।
भारत! विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुन उस सेनाको भयभीत करके (सामने आये हुए) महारथियोंको भगाकर रणभूमिमें चारों ओर घूमने लगे ।। १६ ।।
प्रावर्तयन्नदीं घोरां शोणितोदां तरङ्गिणीम् ।
अस्थिशैवालसम्बाधां युगान्ते कालनिर्मिताम् ।। १७ ।।
पार्थने उस समय वहाँ खूनकी नदी बहा दी; जो बड़ी ही भयंकर थी। उसमें जलकी जगह रक्तकी धारा बहती थी तथा रक्तकी ही तरंगें उठती थीं। हड्डियाँ ही उसमें सेवार बनकर छा रही थीं। जान पड़ता था, प्रलयकालमें साक्षात् कालने ही उसका निर्माण किया हो ।। १७ ।।
शरचापप्लवां घोरां केशशैवलशाद्वलाम् ।
तनुत्रोष्णीषसम्बाधां नागकूर्ममहाद्विपाम् ।। १८ ।।
उसमें धनुष और बाण ऐसे बहते थे, मानो डोंगियाँ चल रही हों। उसका स्वरूप बड़ा भयानक लगता था। केश उसमें सेवार और घासके समान प्रतीत होते थे। उसमें वीरोंके कवच और पगड़ियाँ भरी थीं। हाथी कछुओं और बड़े-बड़े जलहस्तियोंके समान जान पड़ते थे ।। १८ ।।
मेदोवसासृक्प्रवहां महाभयविवर्धिनीम् ।
रौद्ररूपां महाभीमां श्वापदैरभिनादिताम् ।। १९ ।।
मेदा, चर्बी तथा रुधिरको बहानेवाली वह नदी महान् भयको बढ़ानेवाली थी। उसकी स्थिति बड़ी भीषण थी। उस रौद्ररूपा नदीके तटपर (रक्तभोजी) हिंसक जन्तु कोलाहल कर रहे थे ।। १९ ।।
तीक्ष्णशस्त्रमहाग्राहां क्रव्यादगणसेविताम् ।
मुक्ताहारोर्मिकलिलां चित्रालंकारबुद्बुदाम् ।। २० ।।
तीखे शस्त्र उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राहोंके समान जान पड़ते थे। मांसभोजी जीव-जन्तु वहाँ निवास करते थे। मोतियोंकी मालाएँ लहरोंके समान जान पड़ती थीं। विचित्र आभूषण उसमें उठते हुए जलके बुलबुले-जैसे प्रतीत होते थे ।। २० ।।

शरसंघमहावर्तां नागनक्रां दुरत्ययाम् ।
महारथमहाद्वीपां शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाम् ।
चकार च तदा पार्थो नदीं दुस्तरशोणिताम् ॥ २१ ॥
बाणोंके समूह बड़ी-बड़ी भँवरें थे। हाथी घड़ियालों-से जान पड़ते थे; अतः उसके पार जाना अत्यन्त कठिन था। बड़े-बड़े रथ उसके भीतर विशाल टापू-जैसे प्रतीत होते थे। शंख और नगाड़ोंकी आवाज ही उस नदीकी कलकल ध्वनि थी। इस प्रकार अर्जुनने वहाँ खूनकी दुर्लङ्घ्य नदी बहा दी ॥ २१ ॥

आददानस्य हि शरान् संधाय च विमुञ्चतः ।
विकर्षतश्च गाण्डीवं न कश्चिद् ददृशे जनः ॥ २२ ॥
अर्जुन कब बाण हाथमें लेते, गाण्डीव धनुषपर रखते, उसकी प्रत्यंचा खींचते और बाण छोड़ते हैं, यह कोई भी मनुष्य नहीं देख पाता था ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि अर्जुनसंकुलयुद्धे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें अर्जुनके संकुलयुद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2512)

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त्रिषष्टितमोऽध्यायः

अर्जुनपर समस्त कौरवपक्षीय महारथियोंका आक्रमण और सबका युद्धभूमिसे पीठ दिखाकर भागना

वैशम्पायन उवाच

ततो दुर्योधनः कर्णो दुःशासनविविंशती ।
द्रोणश्च सह पुत्रेण कृपश्चापि महारथः ॥ १ ॥
पुनर्ययुश्च संरब्धा धनंजयजिघांसवः ।
विस्फारयन्तश्चापानि बलवन्ति दृढानि च ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन, विविंशति, पुत्रसहित आचार्य द्रोण और महारथी कृपाचार्य—ये सब योद्धा रोषमें भरकर धनंजयको मार डालनेकी इच्छासे अपने मजबूत और दृढ़ धनुषोंकी टंकार फैलाते हुए उनपर पुनः चढ़ आये ॥ १-२ ॥

तान् विकीर्णपताकेन रथेनादित्यवर्चसा ।
प्रत्युद्ययौ महाराज समन्ताद् वानरध्वजः ॥ ३ ॥

महाराज! तब वानरयुक्ता ध्वजावाले अर्जुन भी सूर्यके समान तेजस्वी तथा फहराती हुई पताकासे सुशोभित रथके द्वारा सब ओरसे उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ३ ॥

ततः कृपश्च कर्णश्च द्रोणश्च रथिनां वरः । तं महास्त्रैर्महावीर्यं परिवार्य धनंजयम् ॥ ४ ॥ शरौघान् सम्यगस्यन्तो जीमूता इव वार्षिकाः । ववर्षुः शरवर्षाणि पातयन्तो धनंजयम् ॥ ५ ॥ यह देख कृपाचार्य, कर्ण तथा रथियोंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण—ये महापराक्रमी धनंजयको (चारों ओरसे) घेरकर अपने महान् धनुषोंसे उनपर राशि-राशि बाणोंका खूब जमकर प्रहार करने लगे। ये तीनों महारथी धनंजयको मार गिरानेकी इच्छासे वर्षाकालके मेघोंकी भाँति सायकोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ ४-५ ॥

इषुभिर्बहुभिस्तूर्णं समरे लोमवाहिभिः । अदूरात् पर्यवस्थाप्य पूरयामासुरादृताः ॥ ६ ॥ उन्होंने समरभूमिमें थोड़ी ही दूरपर पार्थकी गतिको कुण्ठित करके बड़े चावसे बहुसंख्यक पंखयुक्त बाणोंकी बौछार करते हुए उन्हें तुरंत ढँक दिया ॥ ६ ॥

तथा तैरवकीर्णस्य दिव्यैरस्त्रैः समन्ततः । न तस्य द्व्यङ्गुलमपि विवृतं सम्प्रदृश्यते ॥ ७ ॥ वे महारथी जब इस प्रकार सब ओरसे अर्जुनपर दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंकी वर्षा करने लगे, उस समय उनके शरीरका दो अंगुल भाग भी बाणोंसे खाली नहीं दिखायी देता था ॥ ७ ॥

ततः प्रहस्य बीभत्सुर्दिव्यमैन्द्रं महारथः । अस्त्रमादित्यसंकाशं गाण्डीवे समयोजयत् ॥ ८ ॥ तब महारथी अर्जुनने हँसकर गाण्डीव धनुषपर सूर्यके समान तेजस्वी दिव्य ऐन्द्रास्त्रका संधान किया ॥ ८ ॥

शररश्मिरिवादित्यः प्रतस्थे समरे बली । किरीटमाली कौन्तेयः सर्वान् प्राच्छादयत् कुरून् ॥ ९ ॥ फिर तो महाबली किरीटमाली कुन्तीनन्दन अर्जुन सूर्यकी भाँति बाणरूपी प्रचण्ड किरणोंको बिखेरते हुए समरभूमिमें आगे बढ़े। उन्होंने समस्त कौरव-योद्धाओंको सायकोंसे ढँक दिया ॥ ९ ॥

यथा बलाहके विद्युत् पावको वा शिलोच्चये । तथा गाण्डीवमभवदिन्द्रायुधमिवानतम् ॥ १० ॥ जैसे मेघोंमें बिजली और पर्वतपर आगकी ज्वाला शोभा पाती है, उसी प्रकार अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष सुशोभित होता था। वह आकाशमें इन्द्रधनुष-सा झुका हुआ