भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2519, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2519

किया ।। २८ ।। अर्जुनोऽपि शरांस्तीक्ष्णान् भीष्माय निशितान् बहून् । चिक्षेप सुमहातेजास्तथा भीष्मश्च पाण्डवे ।। २९ ।। तब महातेजस्वी अर्जुनने भी भीष्मपर बहुत-से पैने बाण फेंके और भीष्मने भी पाण्डुपुत्रको अनेक तीखे बाण मारे ।। २९ ।। तयोर्दिव्यास्त्रविदुषोरस्यतोर्निशिताञ्छरान् । न विशेषस्तदा राजँल्लक्ष्यते स्म महात्मनोः ।। ३० ।। राजन्! वे दोनों महात्मा दिव्यास्त्रोंके पण्डित थे और एक-दूसरेपर पैने बाण फेंक रहे थे। उस समय उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। ३० ।। अथावृणोद् दश दिशः शरैरतिरथस्तदा । किरीटमाली कौन्तेयः शूरः शान्तनवस्तथा ।। ३१ ।। किरीटमाली कुन्तीकुमार अर्जुन और शान्तनुनन्दन भीष्म दोनों ही अतिरथी वीर थे। उन्होंने अपने बाणोंसे दसों दिशाओंको आच्छादित कर दिया ।। ३१ ।। अतीव पाण्डवो भीष्मं भीष्मश्चातीव पाण्डवम् । बभूव तस्मिन् संग्रामे राजँल्लोके तदद्भुतम् ।। ३२ ।। राजा जनमेजय! उस युद्धमें कभी पाण्डुपुत्र अर्जुन भीष्मसे बढ़ जाते थे, तो कभी भीष्म ही अर्जुनको लाँघ जाते थे। जगत्में यह एक अद्भुत बात थी ।। ३२ ।। पाण्डवेन हताः शूरा भीष्मस्य रथरक्षिणः । शेरते स्म तदा राजन् कौन्तेयस्याभितो रथम् ।। ३३ ।। राजन्! भीष्मके रथकी रक्षा करनेवाले शूरवीर सैनिक अर्जुनके द्वारा मारे जाकर उनके रथके दोनों ओर पड़े थे ।। ३३ ।। ततो गाण्डीवनिर्मुक्ता निरमित्रं चिकीर्षवः । आगच्छन् पुङ्खसंश्लिष्टाः श्वेतवाहनपत्रिणः ।। ३४ ।। तदनन्तर श्वेतवाहन अर्जुनके पंखधारी बाण गाण्डीव धनुषसे छूटकर संसारको शत्रुरहित करनेकी इच्छासे सब ओर आने लगे ।। ३४ ।। निष्पतन्तो रथात् तस्य धौता हैरण्यवाससः । आकाशे समदृश्यन्त हंसानामिवपङ्क्तयः ।। ३५ ।। उनके रथसे निकलते हुए सुनहरे पंखवाले श्वेत बाण आकाशमें हंसोंकी पंक्ति-से दिखायी देते थे ।। ३५ ।। तस्य तद् दिव्यमस्त्रं हि विगाढं चित्रमस्यतः । प्रेक्षन्ते स्मान्तरिक्षस्थाः सर्वे देवाः सवासवाः ।। ३६ ।। अर्जुन विचित्र ढंगसे मर्मभेदी दिव्यास्त्रोंका प्रयोग कर रहे थे और आकाशमें खड़े हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता उनका वह अस्त्रकौशल देख रहे थे ।। ३६ ।।

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