भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

किया ।। २८ ।। अर्जुनोऽपि शरांस्तीक्ष्णान् भीष्माय निशितान् बहून् । चिक्षेप सुमहातेजास्तथा भीष्मश्च पाण्डवे ।। २९ ।। तब महातेजस्वी अर्जुनने भी भीष्मपर बहुत-से पैने बाण फेंके और भीष्मने भी पाण्डुपुत्रको अनेक तीखे बाण मारे ।। २९ ।। तयोर्दिव्यास्त्रविदुषोरस्यतोर्निशिताञ्छरान् । न विशेषस्तदा राजँल्लक्ष्यते स्म महात्मनोः ।। ३० ।। राजन्! वे दोनों महात्मा दिव्यास्त्रोंके पण्डित थे और एक-दूसरेपर पैने बाण फेंक रहे थे। उस समय उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। ३० ।। अथावृणोद् दश दिशः शरैरतिरथस्तदा । किरीटमाली कौन्तेयः शूरः शान्तनवस्तथा ।। ३१ ।। किरीटमाली कुन्तीकुमार अर्जुन और शान्तनुनन्दन भीष्म दोनों ही अतिरथी वीर थे। उन्होंने अपने बाणोंसे दसों दिशाओंको आच्छादित कर दिया ।। ३१ ।। अतीव पाण्डवो भीष्मं भीष्मश्चातीव पाण्डवम् । बभूव तस्मिन् संग्रामे राजँल्लोके तदद्भुतम् ।। ३२ ।। राजा जनमेजय! उस युद्धमें कभी पाण्डुपुत्र अर्जुन भीष्मसे बढ़ जाते थे, तो कभी भीष्म ही अर्जुनको लाँघ जाते थे। जगत्में यह एक अद्भुत बात थी ।। ३२ ।। पाण्डवेन हताः शूरा भीष्मस्य रथरक्षिणः । शेरते स्म तदा राजन् कौन्तेयस्याभितो रथम् ।। ३३ ।। राजन्! भीष्मके रथकी रक्षा करनेवाले शूरवीर सैनिक अर्जुनके द्वारा मारे जाकर उनके रथके दोनों ओर पड़े थे ।। ३३ ।। ततो गाण्डीवनिर्मुक्ता निरमित्रं चिकीर्षवः । आगच्छन् पुङ्खसंश्लिष्टाः श्वेतवाहनपत्रिणः ।। ३४ ।। तदनन्तर श्वेतवाहन अर्जुनके पंखधारी बाण गाण्डीव धनुषसे छूटकर संसारको शत्रुरहित करनेकी इच्छासे सब ओर आने लगे ।। ३४ ।। निष्पतन्तो रथात् तस्य धौता हैरण्यवाससः । आकाशे समदृश्यन्त हंसानामिवपङ्क्तयः ।। ३५ ।। उनके रथसे निकलते हुए सुनहरे पंखवाले श्वेत बाण आकाशमें हंसोंकी पंक्ति-से दिखायी देते थे ।। ३५ ।। तस्य तद् दिव्यमस्त्रं हि विगाढं चित्रमस्यतः । प्रेक्षन्ते स्मान्तरिक्षस्थाः सर्वे देवाः सवासवाः ।। ३६ ।। अर्जुन विचित्र ढंगसे मर्मभेदी दिव्यास्त्रोंका प्रयोग कर रहे थे और आकाशमें खड़े हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता उनका वह अस्त्रकौशल देख रहे थे ।। ३६ ।।

तं दृष्ट्वा परमप्रीतो गन्धर्वश्चित्रमद्भुतम् । शशंस देवराजाय चित्रसेनः प्रतापवान् ॥ ३७ ॥ उस समय प्रतापी चित्रसेन गन्धर्वने अर्जुनकी ओर देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो देवराज इन्द्रसे उनके विचित्र एवं अद्भुत रणकौशलकी प्रशंसा करते हुए कहा— ॥

पश्येमान् पार्थनिर्मुक्तान् संसक्तानिव गच्छतः । चित्ररूपमिदं जिष्णोर्दिव्यमस्त्रमुदीर्यतः ॥ ३८ ॥ ‘प्रभो! देखिये, ये पार्थके छोड़े हुए बाण परस्पर सटे हुए-से जा रहे हैं। दिव्यास्त्र प्रकट करनेवाले अर्जुनकी यह अस्त्र-संचालनकला विचित्र एवं अद्भुत है ॥ ३८ ॥

नेदं मनुष्याः संदध्युर्न हीदं तेषु विद्यते । पौराणानां महास्त्राणां विचित्रोऽयं समागमः ॥ ३९ ॥ ‘दूसरे मनुष्य इस दिव्यास्त्रका संधान नहीं कर सकते; क्योंकि यह अस्त्र दूसरे मनुष्योंके पास है ही नहीं। यहाँ प्राचीनकालके बड़े-बड़े अस्त्रोंका यह अद्भुत समागम हुआ है ॥ ३९ ॥

आददानस्य हि शरान् संधाय च विमुञ्चतः । विकर्षतश्च गाण्डीवं नान्तरं समदृश्यत ॥ ४० ॥ ‘अर्जुन कब बाण निकालते हैं, कब चढ़ाते हैं, कब छोड़ते हैं और कब गाण्डीव धनुषको खींचते हैं तथा इन क्रियाओंमें कितना अन्तर पड़ता है; यह सब किसीको दिखायी ही नहीं देता था ॥ ४० ॥

मध्यंदिनगतं सूर्यं प्रतपन्तमिवाम्बरे । नाशक्नुवन्त सैन्यानि पाण्डवं प्रति वीक्षितुम् ॥ ४१ ॥ ‘आकाशमें दोपहरके समय प्रचण्ड किरणोंसे तपते हुए सूर्यकी ओर जैसे कोई देख नहीं सकता, उसी प्रकार प्रतापी पाण्डुपुत्रकी ओर कौरव-सैनिक आँख उठाकर देखनेमें भी असमर्थ हो गये हैं ॥ ४१ ॥

तथैव भीष्मं गाङ्गेयं द्रष्टुं नोत्सहते जनः ॥ ४२ ॥ ‘इसी प्रकार गंगानन्दन भीष्मकी ओर भी कोई मनुष्य देखनेका साहस नहीं करता है ॥ ४२ ॥

उभौ विश्रुतकर्मणावुभौ तीव्रपराक्रमौ । उभौ सदृशकर्माणवुभौ युधि सुदुर्जयौ ॥ ४३ ॥ ‘दोनों वीर अपने अद्भुत कार्योंके लिये संसारमें प्रसिद्ध हैं। दोनोंके पराक्रम उग्र हैं। दोनों एक-सा पराक्रम दिखानेवाले तथा युद्धमें अत्यन्त दुर्जय हैं’ ॥ ४३ ॥

इत्युक्तो देवराजस्तु पार्थभीष्मसमागमम् । पूजयामास दिव्येन पुष्पवर्षेण भारत ॥ ४४ ॥

जनमेजय! चित्रसेनके ऐसा कहनेपर देवराज इन्द्रने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करके अर्जुन और भीष्मके इस अद्भुत संग्रामके प्रति आदर प्रकट किया ॥ ४४ ॥ ततः शान्तनवो भीष्मो वामं पार्श्वमताडयत् । पश्यतः प्रतिसंधाय विध्यतः सव्यसाचिनः ॥ ४५ ॥ तदनन्तर शान्तनुनन्दन भीष्मने (कौरवसेनाको) घायल करनेवाले सव्यसाची अर्जुनके देखते-देखते बाणसंधान करके उनका बायाँ पार्श्व बींध डाला ॥ ४५ ॥ ततः प्रहस्य बीभत्सुः पृथुधारेण कार्मुकम् । चिच्छेद गार्ध्रपत्रेण भीष्मस्यादित्यतेजसः ॥ ४६ ॥ तब अर्जुनने भी हँसकर मोटी धार एवं गीधकी पाँखवाले बाणसे सूर्यके समान तेजस्वी भीष्मका धनुष फिर काट दिया ॥ ४६ ॥ अथैनं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । यतमानं पराक्रान्तं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ४७ ॥ तत्पश्चात् कुन्तीपुत्र धनंजयने विजयके लिये प्रयत्नशील पराक्रमी भीष्मकी छातीमें दस बाण मारकर गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४७ ॥

स पीडितो महाबाहुर्गृहीत्वा रथकूबरम् । गाङ्गेयो युद्धदुर्धर्षस्तस्थौ दीर्घमिवान्तरम् ॥ ४८ ॥

उससे पीड़ित हो रणदुर्धर्ष वीर महाबाहु भीष्म रथका कूबर पकड़कर बहुत देरतक निश्चेष्ट बैठे रह गये ।।
तं विसंज्ञमपोवाह संयन्ता रथवाजिनाम् ।
उपदेशमनुस्मृत्य रक्षमाणो महारथम् ।। ४९ ।।
वे बेहोश थे। ‘ऐसी दशामें सारथिको रथीकी रक्षा करनी चाहिये’ इस उपदेशका स्मरण करके महारथी भीष्मकी प्राणरक्षाके उद्देश्यसे उनके रथ और घोड़ोंको काबूमें रखनेवाला सारथि उन्हें संग्रामभूमिसे दूर हटा ले गया ।। ४९ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि भीष्मापयाने चतुःषष्टितमोऽध्यायः ।। ६४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें भीष्मके रणभूमिसे हटाये जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६४ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2523)

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पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

अर्जुन और दुर्योधनका युद्ध, विकर्ण आदि योद्धाओंसहित दुर्योधनका युद्धके मैदानसे भागना

वैशम्पायन उवाच

भीष्मे तु संग्रामशिरो विहाय पलायमाने धृतराष्ट्रपुत्रः । उत्सृज्य केतुं विनदन् महात्मा धनुर्विगृह्यार्जुनमाससाद ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब भीष्मजी युद्धका मुहाना छोड़कर दूर हट गये, तब धृतराष्ट्र-पुत्र महामना दुर्योधन अपने रथकी पताका फहराकर हाथमें धनुष ले सिंहनाद करता हुआ अर्जुनपर चढ़ आया ॥ १ ॥

स भीमधन्वानमुदग्रवीर्यं धनंजयं शत्रुगणे चरन्तम् । आकर्णपूर्णायतचोदितेन विव्याध भल्लेन ललाटमध्ये ॥ २ ॥ उस समय भयंकर धनुष धारण करनेवाले प्रचण्ड पराक्रमी धनंजय शत्रुसेनामें विचर रहे थे। दुर्योधनने धनुषको कानतक खींचकर छोड़े हुए भल्ल नामक बाणसे उनके ललाटमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २ ॥

स तेन बाणेन समर्पितेन जाम्बूनदाग्रेण सुसंहितेन । रराज राजन् महनीयकर्मा यथैकपर्वा रुचिरैकशृङ्गः ॥ ३ ॥ वह बाण अर्जुनके ललाटमें धँस गया। राजन्! प्रशंसनीय पराक्रमवाले अर्जुन सुनहरी धारवाले उस धँसे हुए बाणके द्वारा उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे एक सुन्दर शिखरवाला पर्वत अपने ऊपर उगे हुए एक ही बाँसके पेड़से शोभा पा रहा हो ॥ ३ ॥

अथास्य बाणेन विदारितस्य प्रादुर्बभूवासृगजस्रमुष्णम् । स तस्य जाम्बूनदपुङ्खचित्रो भित्त्वा ललाटं सुविराजते स्म ॥ ४ ॥

दुर्योधनके उस बाणसे अर्जुनका ललाट विदीर्ण हो गया और उससे गरम-गरम रक्तकी अविच्छिन्न धारा बहने लगी। जाम्बूनद सुवर्णकी पाँखवाला वह विचित्र बाण पार्थका ललाट छेदकर बड़ी शोभा पा रहा था ॥ ४ ॥

दुर्योधनश्चापि तमग्रतेजाः पार्थश्च दुर्योधनमेकवीरः । अन्योन्यमाजौ पुरुषप्रवीरौ समौ समाजग्मतुराजमीढौ ॥ ५ ॥

तदनन्तर उग्रतेजस्वी अद्वितीय वीर अर्जुनने दुर्योधनपर और दुर्योधनने अर्जुनपर आक्रमण किया। अजमीढवंशके वे दोनों प्रमुख वीर पुरुष एक समान पराक्रमी थे। उन्होंने संग्राममें एक-दूसरेपर बड़े वेगसे धावा किया ॥ ५ ॥

ततः प्रभिन्नेन महागजेन महीधराभेन पुनर्विकर्णः । रथैश्चतुर्भिर्गजपादरक्षैः कुन्तीसुतं जिष्णुमथाभ्यधावत् ॥ ६ ॥

उसी समय एक पर्वताकार विशाल गजराजपर, जिसके मस्तकसे मद टपक रहा था, चढ़कर विकर्ण पुनः विजयशाली कुन्तीनन्दन अर्जुनपर चढ़ आया। उसके साथ चार रथारोही योद्धा भी थे, जो हाथीके चारों पैरोंकी रक्षा करते थे ॥ ६ ॥

तमापतन्तं त्वरितं गजेन्द्रं धनंजयः कुम्भविभागमध्ये । आकर्णपूर्णेन महायसेन बाणेन विव्याध महाजवेन ॥ ७ ॥

गजराजको तीव्र गतिसे अपनी ओर आते देख धनंजयने धनुषको कानतक खींचकर चलाये हुए लोहेके अत्यन्त वेगशाली बाणद्वारा उसके कुम्भस्थलको बींध डाला ॥ ७ ॥

पार्थेन सृष्टः स तु गार्ध्रपत्र आपूङ्खदेशात् प्रविवेश नागम् । विदार्य शैलप्रवरं प्रकाशं यथाशनिः पर्वतमिन्द्रसृष्टः ॥ ८ ॥

पार्थका छोड़ा हुआ वह गीध पक्षीके परोंवाला बाण उस हाथीके मस्तकमें पंखसहित घुस गया; मानो इन्द्रका चलाया हुआ वज्र किसी प्रकाशपूर्ण गिरिराजको विदीर्ण करके उसके भीतर समा गया हो ॥ ८ ॥

शरप्रतप्तः स तु नागराजः प्रवेपिताङ्गो व्यथितान्तरात्मा । संसीदमानो निपपात मह्यां

वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ॥ ९ ॥
वह गजराज अर्जुनके बाणसे संतप्त हो उठा। उसकी अन्तरात्मा व्यथित हो गयी और सारा शरीर काँपने लगा। जैसे वज्रका मारा हुआ पर्वतशिखर ढह जाता है, उसी प्रकार वह नागराज शिथिल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥
निपातिते दन्तिवरे पृथिव्यां
त्रासाद् विकर्णः सहसावतीर्य ।
तूर्णं पदान्यष्टशतानि गत्वा
विविंशतेः स्यन्दनमारुरोह ॥ १० ॥
उस विशाल हाथीके धराशायी हो जानेपर विकर्ण बहुत डर गया और सहसा कूदकर शीघ्रतापूर्वक भाग गया और आठ सौ पग चलकर विविंशतिके रथपर चढ़ गया ॥ १० ॥
निहत्य नागं तु शरेण तेन
वज्रोपमेनाद्रिवराम्बुदाभम् ।
तथाविधेनैव शरेण पार्थो
दुर्योधनं वक्षसि निर्बिभेद ॥ ११ ॥
उस वज्रसदृश बाणद्वारा पर्वत तथा मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनेवाले गजराजको मारकर पार्थने वैसे ही दूसरे बाणसे दुर्योधनकी छाती छेद डाली ॥ ११ ॥
ततो गजे राजनि चैव भिन्ने
भग्ने विकर्णे च सपादरक्षे ।
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैः प्रणुन्ना-
स्ते योधमुख्याः सहसापजग्मुः ॥ १२ ॥
इस प्रकार गजराज और कुरुराज दोनोंके घायल होने तथा गजराजके पादरक्षकोंसहित विकर्णके भाग जानेपर गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए सायकोंकी मार खाकर पीड़ित हुए समस्त मुख्य-मुख्य योद्धा सहसा मैदान छोड़कर भाग गये ॥ १२ ॥
दृष्ट्वैव पार्थेन हतं च नागं
योधांश्च सर्वान् द्रवतो निशम्य ।
रथं समावृत्य कुरुप्रवीरो
रणात् प्रदुद्राव यतो न पार्थः ॥ १३ ॥
अर्जुनके हाथसे गजराज मारा गया और सम्पूर्ण योद्धा भी रणभूमि छोड़कर भाग रहे हैं, यह देखकर कुरुवंशका प्रमुख वीर दुर्योधन भी, जिस ओर अर्जुन नहीं थे, उसी दिशामें रथ घुमाकर भागा ॥ १३ ॥
तं भीमरूपं त्वरितं द्रवन्तं
दुर्योधनं शत्रुसहोऽभिषङ्गात् ।
प्रास्फोटयद् योद्धुमनाः किरीटी

बाणेन विद्धं रुधिरं वमन्तम् ॥ १४ ॥ उस समय दुर्योधनका रूप भयंकर हो रहा था। वह हार खाकर बाणसे घायल हो रक्त वमन करता हुआ भागा जा रहा था। यह देखकर शत्रु का वेग सहन करनेवाले किरीटधारी अर्जुनने ताल ठोंकी और मनमें युद्धके लिये उत्साह रखते हुए वे शत्रुको ललकारने लगे ॥ १४ ॥

अर्जुन उवाच

विहाय कीर्तिं विपुलं यशश्च युद्धात् परावृत्य पलायसे किम् । न तेऽद्य तूर्याणि समाहतानि तथैव राज्यादवरोपितस्य ॥ १५ ॥ युधिष्ठिरस्यास्मि निदेशकारी पार्थस्तृतीयो युधि संस्थितोऽस्मि । तदर्थमावृत्य मुखं प्रयच्छ नरेन्द्रवृत्तं स्मर धार्तराष्ट्र ॥ १६ ॥ **अर्जुन बोले—**धृतराष्ट्रके पुत्र! तू युद्धसे पीठ दिखाकर क्यों भागा जा रहा है? अरे! ऐसा करके तू अपनी कीर्ति और विशाल यशसे हाथ धो बैठा है। आज तेरे विजयके बाजे पहले-जैसे नहीं बज रहे हैं। तूने जिन्हें राज्यसे उतार दिया है, उन्हीं महाराज युधिष्ठिरका आज्ञाकारी मैं तीसरा पाण्डव युद्धके लिये खड़ा हूँ। अतः तू मेरा सामना करनेके लिये लौटकर अपना मुँह तो दिखा। राजाका आचार-व्यवहार कैसा होना चाहिये, इसकी याद तो कर ले ॥ १५-१६ ॥

मोघं तवेदं भुवि नामधेयं दुर्योधनेतीह कृतं पुरस्तात् । न हीह दुर्योधनता तवास्ति पलायमानस्य रणं विहाय ॥ १७ ॥ व्यर्थ ही इस पृथ्वीपर तेरा नाम दुर्योधन रखा गया। तू तो युद्ध छोड़कर भागा जा रहा है; अतः यहाँ तुझमें दुर्योधन नामके अनुरूप कोई गुण नहीं है ॥ १७ ॥

न ते पुरस्तादथ पृष्ठतो वा पश्यामि दुर्योधन रक्षितारम् । अपेहि युद्धात् पुरुषप्रवीर प्राणान् प्रियान् पाण्डवतोऽद्य रक्ष ॥ १८ ॥ दुर्योधन! अच्छा, तेरे आगे या पीछे कोई रक्षक नहीं दिखायी देता। अतः वीर पुरुष! तू युद्धसे भाग जा और पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे आज अपने प्यारे प्राणोंकी रक्षा कर

ले ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दुर्योधनापयाने पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दुर्योधनका युद्धसे पलायनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2528)

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षट्षष्टितमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा समस्त कौरवदलकी पराजय तथा कौरवोंका स्वदेशको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

आहूयमानश्च स तेन संख्ये
महात्मना वै धृतराष्ट्रपुत्रः ।
निवर्तितस्तस्य गिराङ्कुशेन
महागजो मत्त इवाङ्कुशेन ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा अर्जुनने जब इस प्रकार युद्धके लिये ललकारा, तब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन अंकुशकी चोट खाये हुए मतवाले गजराजकी भाँति उनके कटुवचनरूपी अंकुशसे पीड़ित हो पुनः लौट पड़ा ॥ १ ॥

सोऽमृष्यमाणो वचसाभिमृष्टो
महारथेनातिरथस्तरस्वी ।
पर्याववर्तार्थ रथेन वीरो
भोगी यथा पादतलाभिमृष्टः ॥ २ ॥
महारथी कुन्तीकुमारने अपने वचनोंद्वारा उसका तिरस्कार किया था; अतः वह वेगशाली अतिरथी वीर इस अपमानको न सह सका, अतएव जैसे पैरोंसे कुचला हुआ सर्प बदला लेनेके लिये लौट पड़ता है, उसी प्रकार दुर्योधन अपने रथके साथ लौट आया ॥ २ ॥

तं प्रेक्ष्य कर्णः परिवर्तमानं
निवर्त्य संस्तभ्य च विद्धगात्रम् ।
दुर्योधनस्योत्तरतोऽभ्यगच्छत्
पार्थं नृवीरो युधि हेममाली ॥ ३ ॥
उसको लौटते देख कर्ण भी अपने घायल शरीरको किसी प्रकार सँभालकर लौट पड़ा और दुर्योधनके उत्तर (वाम)-भागमें रहकर युद्धभूमिमें पार्थका सामना करनेके लिये चला। नरवीर कर्ण सोनेकी मालासे अलंकृत था ॥ ३ ॥

भीष्मस्ततः शान्तनवो विवृत्य
हिरण्यकक्षस्त्वरयाभिषङ्गी ।
दुर्योधनं पश्चिमतोऽभ्यरक्षत्
पार्थान्महाबाहुरधिज्यधन्वा ॥ ४ ॥

तदनन्तर सुनहरे रंगकी चादर ओढ़े शान्तनुनन्दन भीष्म भी बड़े वेगसे रथ घुमाकर वहाँ आ पहुँचे। वे शत्रुको पराजित करनेमें समर्थ थे। महाबाहु भीष्म धनुषकी प्रत्यंचा चढ़ाकर पश्चिम या पीछेकी ओरसे पार्थके आक्रमणोंसे दुर्योधनकी रक्षा करने लगे ॥ ४ ॥

द्रोणः कृपश्चैव विविंशतिश्च दुःशासनश्चैव विवृत्य शीघ्रम् । सर्वे पुरस्ताद् विततोरुचापा दुर्योधनार्थं त्वरिताऽभ्युपेयुः ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् द्रोण, कृपाचार्य, विविंशति और दुःशासन भी शीघ्र ही घूमकर आ गये। वे सब अपने विशाल धनुषको ताने हुए पूर्व या सामनेकी ओरसे दुर्योधनकी रक्षाके लिये बड़ी उतावलीके साथ आये थे ॥ ५ ॥

स तान्यनीकानि निवर्तमाना- न्यालोक्य पूर्णौघनिभानि पार्थः । हंसो यथा मेघमिवापतन्तं धनंजयः प्रत्यतपत् तरस्वी ॥ ६ ॥

जैसे सूर्य घिरती हुई मेघोंकी घटाको अपनी किरणोंसे तपाता है, उसी प्रकार वेगशाली कुन्तीपुत्र धनंजयने भारी जलप्रवाहके समान लौटती हुई उन कौरवसेनाओंको देखकर उन्हें संताप देना आरम्भ किया ॥ ६ ॥

ते सर्वतः सम्परिवार्य पार्थ- मस्त्राणि दिव्यानि समाददानाः । ववर्षुरभ्येत्य शरैः समन्ता- न्मेघा यथा भूधरमम्बुवर्गैः ॥ ७ ॥

दिव्य अस्त्र धारण किये हुए उन योद्धाओंने अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया और जैसे बादल पहाड़के ऊपर सब ओरसे पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे निकट आकर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ७ ॥

ततोऽस्त्रमस्त्रेण निवार्य तेषां गाण्डीवधन्वा कुरुपुङ्गवानाम् । सम्मोहनं शत्रुसहोऽन्यदस्त्रं प्रादुश्चकारैन्द्ररपारणीयम् ॥ ८ ॥

तब शत्रुओंका वेग सहन करनेवाले इन्द्रपुत्र गाण्डीवधारी अर्जुनने अपने अस्त्रसे कौरवदलके उन श्रेष्ठ वीरोंके अस्त्रोंका निवारण करके सम्मोहन नामक दूसरा अस्त्र प्रकट किया, जिसका निवारण करना किसीके लिये भी असम्भव था ॥ ८ ॥

ततो दिशश्चानुदिशो विवृत्य शरैः सुधारैर्निशितैः सुपत्त्रैः ।

गाण्डीवघोषेण मनांसि तेषां महाबलः प्रव्यथयाञ्चकार ॥ ९ ॥ फिर तो उन महाबलीने सुन्दर पंख और पैनी धारवाले बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं और दिक्कोणोंको आच्छादित करके गाण्डीव धनुषकी (भयंकर) टंकारसे कौरवयोध्दाओंके हृदयमें बड़ी व्यथा उत्पन्न कर दी ॥ ९ ॥

ततः पुनर्भीमरवं प्रगृह्य दोर्भ्यां महाशङ्खमुदारघोषम् । व्यनादयत् स प्रदिशो दिशः खं भुवं च पार्थो द्विषतां निहन्ता ॥ १० ॥ तत्पश्चात् शत्रुहन्ता कुन्तीकुमारने भयंकर शब्द करनेवाले अपने महाशंखको, जिसकी आवाज बहुत दूरतक सुनायी पड़ती थी, दोनों हाथोंसे थामकर बजाया। उसकी ध्वनि सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं, आकाश तथा पृथ्वीमें सब ओर गूँज उठी ॥ १० ॥

ते शङ्खनादेन कुरुप्रवीराः सम्मोहिताः पार्थसमीरितेन । उत्सृज्य चापानि दुरासदानि सर्वे तदा शान्तिपरा बभूवुः ॥ ११ ॥ अर्जुनके बजाये हुए उस शंखकी आवाजसे वे समस्त कौरव वीर मोहित (मूर्च्छित) हो गये और अपने दुर्लभ धनुषोंको त्यागकर सब-के-सब गहरी शान्ति (बेहोशी)-में डूब गये ॥ ११ ॥

तथा विसंज्ञेषु च तेषु पार्थः स्मृत्वा च वाक्यानि तथोत्तरायाः । निर्याहि मध्यादिति मत्स्यपुत्र- मुवाच यावत् कुरवो विसंज्ञाः ॥ १२ ॥ आचार्यशारद्वतयोः सुशुक्ले कर्णस्य पीतं रुचिरं च वस्त्रम् । द्रौणेश्च राज्ञश्च तथैव नीले वस्त्रे समादत्स्व नरप्रवीर ॥ १३ ॥ उन कौरव महारथियोंके अचेत हो जानेपर अर्जुनको उत्तराकी कही हुई बातें स्मरण हो आयीं और उन्होंने मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरसे कहा—‘नरवीर! ये कौरव अभी बेहोश पड़े हुए हैं। ये जबतक होशमें आवें, उसके पहले ही सेनाके बीचसे निकल जाओ। आचार्य द्रोण और कृपाचार्यके शरीरपर जो श्वेत वस्त्र सुशोभित हैं, कर्णके अंगोंपर जो सुन्दर पीले रंगका वस्त्र है, अश्वत्थामा तथा राजा दुर्योधनके शरीरपर जो नीले रंगके कपड़े हैं, उन सबको उतार लो ॥ १२-१३ ॥

भीष्मस्य संज्ञां तु तथैव मन्ये जानाति सोऽस्त्रप्रतिघातमेषः । एतस्य वाहान् कुरु सव्यतस्त्व- मेवं हि यातव्यममूढसंज्ञैः ॥ १४ ॥ ‘मैं समझता हूँ, पितामह भीष्मको होश बना हुआ है; क्योंकि वे इस सम्मोहन अस्त्रको निवारण करनेकी विधि जानते हैं। उनके घोड़ोंको बाँयीं ओर छोड़कर जाना; क्योंकि जिनकी चेतना लुप्त नहीं हुई है, ऐसे वीरोंके निकटसे जाना हो, तो इसी प्रकार जाना चाहिये’ ॥ १४ ॥

रश्मीन् समुत्सृज्य ततो महात्मा रथादवप्लुत्य विराटपुत्रः । वस्त्राण्युपादाय महारथानां तूर्णं पुनः स्वं रथमारुरोह ॥ १५ ॥ तब महामना विराटपुत्र घोड़ोंकी रास छोड़कर रथसे कूद पड़ा और उन महारथियोंके कपड़े लेकर फिर शीघ्र ही अपने रथपर चढ़ आया ॥ १५ ॥

ततोऽन्वशासच्चतुरः सदश्वान् पुत्रो विराटस्य हिरण्यकक्षान् । ते तद् व्यतीयुर्ध्वजिनामनीकं श्वेता वहन्तोऽर्जुनमाजिमध्यात् ॥ १६ ॥ तत्पश्चात् विराटकुमारने सोनेके साज-सामानसे सुशोभित उन चारों सुन्दर घोड़ोंको हाँक दिया। वे श्वेत घोड़े अर्जुनको रथमें लिये हुए रणभूमिके मध्यभागसे निकले और रथारोहियोंकी ध्वजायुक्त सेनाका घेरा पार करके बाहर पहुँच गये ॥ १६ ॥

तथानुयान्तं पुरुषप्रवीरं भीष्मः शरैरभ्यहनत् तरस्वी । स चापि भीष्मस्य हयान् निहत्य विव्याध पार्थो दशभिः पृषत्कैः ॥ १७ ॥ मनुष्योंमें प्रधान वीर अर्जुनको इस प्रकार जाते देख वेगशाली भीष्मने बाण मारकर उन्हें घायल कर दिया। तब अर्जुनने भी भीष्मके घोड़ोंको मारकर दस बाणोंसे उन्हें भी घायल कर दिया ॥ १७ ॥

ततोऽर्जुनो भीष्ममपास्य युद्धे विद्ध्वास्य यन्तारमरिष्टधन्वा । तस्थौ विमुक्तो रथवृन्दमध्या- न्मेघं विदार्येव सहस्ररश्मिः ॥ १८ ॥ दुर्भेद्य धनुषवाले अर्जुन भीष्मको युद्धभूमिमें छोड़कर और उनके सारथिको बाणोंसे बींधकर रथोंके घेरेसे बाहर जा खड़े हुए। उस समय वे बादलोंको छिन्न-भिन्न करके प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ १८ ॥

लब्ध्वा हि संज्ञां तु कुरुप्रवीराः पार्थं निरीक्ष्याथ सुरेन्द्रकल्पम् । रणे विमुक्तं स्थितमेकमाजौ

स धार्तराष्ट्रस्त्वरितं बभाषे ।। १९ ।।

थोड़ी देर बाद होशमें आकर कौरववीरोंने देखा, देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी

कुन्तीपुत्र अर्जुन युद्धमें रथोंके घेरेसे बाहर हो अकेले खड़े हैं। उन्हें इस अवस्थामें देखकर

धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन तुरंत बोल उठा- ।। १९ ।।

अयं कथं वै भवतो विमुक्त-

स्तथा प्रमथ्नीत यथा न मुच्येत् ।

तमब्रवीच्छांन्तनवः प्रहस्य

क्व ते गता बुद्धिरभूत् क्व वीर्यम् ।। २० ।।

शान्तिं परां प्राप्य यदा स्थितोऽभू-

रुत्सृज्य बाणांश्च धनुर्विचित्रम् ।

‘पितामह! यह आपके हाथसे कैसे बच गया? आप इसे इस प्रकार मथ डालिये,

जिससे यह छूटने न पावे।' तब शान्तनुनन्दन भीष्मने हँसकर दुर्योधनसे कहा- 'राजन्!

जब तू अपने विचित्र धनुष और बाणोंको त्यागकर यहाँ गहरी शान्तिमें डूबा हुआ अचेत

पड़ा था, उस समय तेरी बुद्धि कहाँ गयी थी? और पराक्रम कहाँ था? ।। २० १/२ ।।

न त्वेष बीभत्सुरलं नृशंसं

कर्तुं न पापेऽस्य मनो विशिष्टम् ।। २१ ।।

त्रैलोक्यहेतोर्न जहेत् स्वधर्मं

सर्वे न तस्मान्निहता रणेऽस्मिन् ।

क्षिप्रं कुरून् याहि कुरुप्रवीर

विजित्य गाश्च प्रतियातु पार्थः ।

मा ते स्वकोऽर्थो निपतेत मोहात्

तत् संविधातव्यमरिष्टबन्धम् ।। २२ ।।

‘ये अर्जुन कभी निर्दयताका व्यवहार नहीं कर सकते। इनका मन कभी पापाचारमें

प्रवृत्त नहीं होता। ये त्रिलोकीके राज्यके लिये भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकते। यही कारण

है कि इन्होंने इस युद्धमें हम सबके प्राण नहीं लिये। कुरुकुलके प्रमुख वीर! अब तू शीघ्र ही

कुरुदेशको लौट चल। अर्जुन भी गायोंको जीतकर लौट जायँ। अब मोहवश तेरा अपना

स्वार्थ भी नष्ट न हो जाय, इसका ध्यान रख। सबको वही काम करना चाहिये, जिससे

अपना कल्याण हो' ।। २१-२२ ।।

वैशम्पायन उवाच

दुर्योधनस्तस्य तु तन्निशम्य

पितामहस्यात्महितं वचोऽथ ।

अतीतकामो युधि सोऽत्यमर्षी

राजा विनिःश्वस्य बभूव तूष्णीम् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पितामहके ये अपने लिये हितकर वचन सुनकर राजा दुर्योधनके मनमें युद्धकी इच्छा नहीं रह गयी। वह भीतर-ही-भीतर अत्यन्त अमर्षका भार लिये लंबी साँसें भरता हुआ चुप हो गया ॥ २३ ॥
तद् भीष्मवाक्यं हितमीक्ष्य सर्वे
धनंजयाग्निं च विवर्धमानम् ।
निवर्तनायैव मनो निदध्यु-
र्दुर्योधनं ते परिरक्षमाणाः ॥ २४ ॥
अन्य सब योद्धाओंको भी भीष्मजीका वह कथन हितकर जान पड़ा; क्योंकि युद्ध करनेसे तो धनंजयरूपी अग्नि उत्तरोत्तर बढ़कर प्रचण्ड रूप ही धारण करती जाती, यह सब सोचकर उन सबने दुर्योधनकी रक्षा करते हुए अपने देशको लौट जानेका ही निश्चय किया ॥ २४ ॥
तान् प्रस्थितान् प्रीतमनाः स पार्थो
धनंजयः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीरान् ।
अभाषमाणोऽनुनयं मुहूर्तं
वचोऽब्रवीत् सम्परिवृत्य भूयः ॥ २५ ॥
पितामहं शान्तनवं च वृद्धं
द्रोणं गुरुं च प्रणिपत्य मूर्ध्ना ।
उन कौरववीरोंको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुन्तीपुत्र धनंजय मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। वे दो घड़ीतक किसीसे अनुनय-विनयपूर्ण वचन न कहकर मौन रहे। फिर लौटकर उन्होंने वृद्ध पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कुछ बातचीत भी की ॥ २५ ॥
द्रौणिं कृपं चैव कुरूंश्च मान्या-
ञ्छरैर्विचित्रैरभिवाद्य चैव ॥ २६ ॥
दुर्योधनस्योत्तमरत्नचित्रं
चिच्छेद पार्थो मुकुटं शरेण ।
फिर अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा अन्य माननीय (बाह्लीक, सोमदत्त आदि) कौरवोंको बाणोंकी विचित्र रीतिसे नमस्कार करके पार्थने एक बाण मारकर दुर्योधनके उत्तम रत्नजटित विचित्र मुकुटको काट डाला ॥ २६१/२ ॥
आमन्त्र्य वीरांश्च तथैव मान्यान्
गाण्डीवघोषेण विनाद्य लोकान् ॥ २७ ॥
स देवदत्तं सहसा विनाद्य
विदार्य वीरो द्विषतां मनांसि ।

इसी प्रकार अन्य माननीय वीरोंसे भी विदा ले गाण्डीवकी टंकारसे सम्पूर्ण जगत्‌को

प्रतिध्वनित करके वीर अर्जुनने सहसा देवदत्त नामक शंख बजाया और शत्रुओंका दिल

दहला दिया ।। २७१/२ ।।

ध्वजेन सर्वानभिभूय शत्रून्

सहेममालेन विराजमानः ।। २८ ।।

दृष्ट्वा प्रयातांस्तु कुरून् किरीटी

हृष्टोऽब्रवीत् तत्र स मत्स्यपुत्रम् ।

आवर्तयाश्वान् पशवो जितास्ते

याताः परे याहि पुरं प्रहृष्टः ।। २९ ।।

इस प्रकार अपने रथकी सुवर्णमालामण्डित ध्वजासे सम्पूर्ण शत्रुओंका तिरस्कार करके

अर्जुन विजयोल्लाससे विशेष शोभा पाने लगे। कौरव चले गये, यह देखकर किरीटधारी

अर्जुनको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरसे वहाँ इस प्रकार कहा

—'राजकुमार! अब घोड़ोंको लौटाओ। तुम्हारी गौओंको जीत लिया गया और शत्रु भाग

गये; इसलिये अब तुम आनन्दपूर्वक नगरकी ओर चलो' ।। २८-२९ ।।

देवास्तु दृष्ट्वा महदद्भुतं तद्

युद्धं कुरूणां सह फाल्गुनेन ।

जग्मुर्यथास्वं भवनं प्रतीताः

पार्थस्य कर्माणि विचिन्तयन्तः ।। ३० ।।

अर्जुनके साथ होनेवाला कौरवोंका वह अत्यन्त अद्भुत युद्ध देखकर देवतालोग बड़े

प्रसन्न हुए और अर्जुनके पराक्रमका स्मरण करते हुए अपने-अपने भवनको चले

गये ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि समस्तकौरवपलायने

षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें समस्त कौरवोंके पलायनसे

सम्बन्ध रखनेवाला छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2536)

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सप्तषष्टितमोऽध्यायः

विजयी अर्जुन और उत्तरका राजधानीकी ओर प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

ततो विजित्य संग्रामे कुरून् स वृषभेक्षणः ।
समानयामास तदा विराटस्य धनं महत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार बैल-सी विशाल आँखोंवाले अर्जुन उस समय युद्धमें कौरवोंको जीतकर विराटका वह महान् गोधन लौटा लाये ॥ १ ॥
गतेषु च प्रभग्नेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वतः ।
वनान्निष्क्रम्य गहनाद् बहवः कुरुसैनिकाः ॥ २ ॥
भयात् संत्रस्तमनसः समाजग्मुस्ततस्ततः ।
मुक्तकेशास्त्वदृश्यन्त स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ३ ॥
क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतसः ।
जब कौरव-दलके लोग चले गये या इधर-उधर सब दिशाओंमें भाग गये, उस समय बहुत-से कौरवसैनिक जो घने जंगलमें छिपे हुए थे, वहाँसे निकलकर डरते-डरते अर्जुनके पास आये। उनके मनमें भय समा गया था। वे भूखे-प्यासे और थके-माँदे थे। परदेशमें होनेके कारण उनके हृदयकी व्याकुलता और बढ़ गयी थी। वे उस समय केश खोले और हाथ जोड़े हुए खड़े दिखायी दिये ॥ २-३ १/२ ॥
ऊचुः प्रणम्य सम्भ्रान्ताः पार्थ किं करवाम ते ॥ ४ ॥
(प्राणानन्तर्मनोयातान् प्रयाचिष्यामहे वयम् ।
वयं चार्जुन ते दासा ह्यनुरक्ष्या ह्यनायकाः ॥
वे सब-के-सब अर्जुनको प्रणाम करके घबराये हुए बोले—'कुन्तीनन्दन! हम आपकी क्या सेवा करें? अर्जुन! हम आपसे हृदयके भीतर छिपे हुए अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये याचना करते हैं। हमलोग आपके दास और अनाथ हैं; अतः आपको सदा हमारी रक्षा करनी चाहिये' ॥ ४ ॥

अर्जुन उवाच

अनाथान् दुःखितान् दीनान्
कृशान् वृद्धान् पराजितान् ।
न्यस्तशस्त्रान् निराशांश्च
नाहं हन्मि कृताञ्जलीन् ॥)
स्वस्ति व्रजत वो भद्रं न भेतव्यं कथंचन ।

नाहमार्तान् जिघांसामि भृशमाश्वासयामि वः ।। ५ ।।
**अर्जुनने कहा—**सैनिको! जो लोग अनाथ, दुःखी, दीन, दुर्बल, वृद्ध, पराजित, अस्त्र-शस्त्रोंको नीचे डाल देनेवाले, प्राणोंसे निराश एवं हाथ जोड़कर शरणागत होते हैं, उन सबको मैं नहीं मारता हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कुशलपूर्वक घर लौट जाओ। तुम्हें मेरी ओरसे किसी प्रकारका भय नहीं होना चाहिये। मैं संकटमें पड़े हुए मनुष्योंको नहीं मारना चाहता। इस बातके लिये मैं तुम्हें पूरा-पूरा विश्वास दिलाता हूँ ।। ५ ।।

वैशम्पायन उवाच

तस्य तामभयां वाचं श्रुत्वा योधाः समागताः ।
आयुःकीर्तियशोदाभिस्तमाशीर्भिरनन्दयन् ।। ६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुनकी वह अभयदानयुक्त वाणी सुनकर वहाँ आये हुए समस्त योद्धाओंने उन्हें आयु, कीर्ति तथा सुयश बढ़ानेवाले आशीर्वाद देते हुए उनका अभिनन्दन किया ।। ६ ।।

ततोऽर्जुनं नागमिव प्रभिन्न-
मुत्सृज्य शत्रून् विनिवर्तमानम् ।
विराटराष्ट्राभिमुखं प्रयान्तं
नाशक्नुवंस्तं कुरवोऽभियातुम् ।। ७ ।।
उस समय अर्जुन शत्रुओंको छोड़कर—उन्हें जीवनदान दे, मदकी धारा बहानेवाले हाथीकी भाँति मस्तीकी चालसे विराटनगरकी ओर लौटे जा रहे थे। कौरवोंको उनपर आक्रमण करनेका साहस नहीं हुआ ।।

ततः स तन्मेघमिवापतन्तं
विद्राव्य पार्थः कुरुसैन्यवृन्दम् ।
मत्स्यस्य पुत्रं द्विषतां निहन्ता
वचोऽब्रवीत् सम्परिरभ्य भूयः ।। ८ ।।
कौरवोंकी सेना मेघोंकी घटा-सी उमड़ आयी थी; किंतु शत्रुहन्ता पार्थने उसे मार भगाया। इस प्रकार शत्रुसेनाको परास्त करके अर्जुनने उत्तरको पुनः हृदयसे लगाकर कहा — ।। ८ ।।

पितुः सकाशे तव तात सर्वे
वसन्ति पार्था विदितं तवैव ।
तान् मा प्रशंसैर्नगरं प्रविश्य
भीतः प्रणश्येद्धि स मत्स्यराजः ।। ९ ।।
‘तात! तुम्हारे पिताके समीप समस्त पाण्डव निवास करते हैं, यह बात अबतक तुम्हींको विदित हुई है; अतः तुम नगरमें प्रवेश करके पाण्डवोंकी प्रशंसा न करना, नहीं तो

मत्स्यराज डरकर प्राण त्याग देंगे ॥ ९ ॥ मया जिता सा ध्वजिनी कुरूणां मया च गावो विजिता द्विषद्भ्यः। पितुः सकाशं नगरं प्रविश्य त्वमात्मनः कर्म कृतं ब्रवीहि ॥ १० ॥ 'राजधानीमें प्रवेश करके पिताके समीप जानेपर तुम यही कहना कि मैंने कौरवोंकी उस विशाल सेनापर विजय पायी है और मैंने ही शत्रुओंसे अपनी गौओंको जीता है। सारांश यह कि युद्धमें जो कुछ हुआ है, वह सब तुम अपना ही किया हुआ पराक्रम बताना' ॥ १० ॥

उत्तर उवाच

यत् ते कृतं कर्म न पारणीयं तत् ते कर्म कर्तुं मम नास्ति शक्तिः। न त्वां प्रवक्ष्यामि पितुः सकाशे यावन्न मां वक्ष्यसि सव्यसाचिन् ॥ ११ ॥ **उत्तरने कहा—**सव्यसाचिन्! आपने जो पराक्रम किया है, वह दूसरेके लिये असम्भव है। वैसा अद्भुत कर्म करनेकी मुझमें शक्ति नहीं है; तथापि जबतक आप मुझे आज्ञा न देंगे, तबतक पिताजीके निकट आपके विषयमें मैं कुछ भी नहीं कहूँगा ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

स शत्रुसेनांमवजित्य जिष्णु- राच्छिद्य सर्वं च धनं कुरुभ्यः। श्मशानमागत्य पुनः शमीं ता- मभ्येत्य तस्थौ शरविक्षताङ्गः ॥ १२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विजयशील अर्जुन पूर्वोक्तरूपसे शत्रुसेनाको परास्त करके कौरवोंके हाथसे सारा गोधन छीन लेनेके बाद पुनः श्मशानभूमिमें उसी शमीवृक्षके समीप आकर खड़े हुए। उस समय उनके सभी अंग बाणोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो रहे थे ॥

ततः स वह्निप्रतिमो महाकपिः सहैव भूतैर्दिवमुत्पपात। तथैव माया विहिता बभूव ध्वजं च सैंहं युयुजे रथे पुनः ॥ १३ ॥ तदनन्तर वह अग्निके समान तेजस्वी महावानर ध्वजनिवासी भूतगणोंके साथ आकाशमें उड़ गया। उसी प्रकार ध्वजसहित वह दैवी माया भी विलीन हो गयी और