महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2530, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंगाण्डीवघोषेण मनांसि तेषां महाबलः प्रव्यथयाञ्चकार ॥ ९ ॥ फिर तो उन महाबलीने सुन्दर पंख और पैनी धारवाले बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं और दिक्कोणोंको आच्छादित करके गाण्डीव धनुषकी (भयंकर) टंकारसे कौरवयोध्दाओंके हृदयमें बड़ी व्यथा उत्पन्न कर दी ॥ ९ ॥
ततः पुनर्भीमरवं प्रगृह्य दोर्भ्यां महाशङ्खमुदारघोषम् । व्यनादयत् स प्रदिशो दिशः खं भुवं च पार्थो द्विषतां निहन्ता ॥ १० ॥ तत्पश्चात् शत्रुहन्ता कुन्तीकुमारने भयंकर शब्द करनेवाले अपने महाशंखको, जिसकी आवाज बहुत दूरतक सुनायी पड़ती थी, दोनों हाथोंसे थामकर बजाया। उसकी ध्वनि सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं, आकाश तथा पृथ्वीमें सब ओर गूँज उठी ॥ १० ॥
ते शङ्खनादेन कुरुप्रवीराः सम्मोहिताः पार्थसमीरितेन । उत्सृज्य चापानि दुरासदानि सर्वे तदा शान्तिपरा बभूवुः ॥ ११ ॥ अर्जुनके बजाये हुए उस शंखकी आवाजसे वे समस्त कौरव वीर मोहित (मूर्च्छित) हो गये और अपने दुर्लभ धनुषोंको त्यागकर सब-के-सब गहरी शान्ति (बेहोशी)-में डूब गये ॥ ११ ॥
तथा विसंज्ञेषु च तेषु पार्थः स्मृत्वा च वाक्यानि तथोत्तरायाः । निर्याहि मध्यादिति मत्स्यपुत्र- मुवाच यावत् कुरवो विसंज्ञाः ॥ १२ ॥ आचार्यशारद्वतयोः सुशुक्ले कर्णस्य पीतं रुचिरं च वस्त्रम् । द्रौणेश्च राज्ञश्च तथैव नीले वस्त्रे समादत्स्व नरप्रवीर ॥ १३ ॥ उन कौरव महारथियोंके अचेत हो जानेपर अर्जुनको उत्तराकी कही हुई बातें स्मरण हो आयीं और उन्होंने मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरसे कहा—‘नरवीर! ये कौरव अभी बेहोश पड़े हुए हैं। ये जबतक होशमें आवें, उसके पहले ही सेनाके बीचसे निकल जाओ। आचार्य द्रोण और कृपाचार्यके शरीरपर जो श्वेत वस्त्र सुशोभित हैं, कर्णके अंगोंपर जो सुन्दर पीले रंगका वस्त्र है, अश्वत्थामा तथा राजा दुर्योधनके शरीरपर जो नीले रंगके कपड़े हैं, उन सबको उतार लो ॥ १२-१३ ॥