महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2529, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर सुनहरे रंगकी चादर ओढ़े शान्तनुनन्दन भीष्म भी बड़े वेगसे रथ घुमाकर वहाँ आ पहुँचे। वे शत्रुको पराजित करनेमें समर्थ थे। महाबाहु भीष्म धनुषकी प्रत्यंचा चढ़ाकर पश्चिम या पीछेकी ओरसे पार्थके आक्रमणोंसे दुर्योधनकी रक्षा करने लगे ॥ ४ ॥
द्रोणः कृपश्चैव विविंशतिश्च दुःशासनश्चैव विवृत्य शीघ्रम् । सर्वे पुरस्ताद् विततोरुचापा दुर्योधनार्थं त्वरिताऽभ्युपेयुः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् द्रोण, कृपाचार्य, विविंशति और दुःशासन भी शीघ्र ही घूमकर आ गये। वे सब अपने विशाल धनुषको ताने हुए पूर्व या सामनेकी ओरसे दुर्योधनकी रक्षाके लिये बड़ी उतावलीके साथ आये थे ॥ ५ ॥
स तान्यनीकानि निवर्तमाना- न्यालोक्य पूर्णौघनिभानि पार्थः । हंसो यथा मेघमिवापतन्तं धनंजयः प्रत्यतपत् तरस्वी ॥ ६ ॥
जैसे सूर्य घिरती हुई मेघोंकी घटाको अपनी किरणोंसे तपाता है, उसी प्रकार वेगशाली कुन्तीपुत्र धनंजयने भारी जलप्रवाहके समान लौटती हुई उन कौरवसेनाओंको देखकर उन्हें संताप देना आरम्भ किया ॥ ६ ॥
ते सर्वतः सम्परिवार्य पार्थ- मस्त्राणि दिव्यानि समाददानाः । ववर्षुरभ्येत्य शरैः समन्ता- न्मेघा यथा भूधरमम्बुवर्गैः ॥ ७ ॥
दिव्य अस्त्र धारण किये हुए उन योद्धाओंने अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया और जैसे बादल पहाड़के ऊपर सब ओरसे पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे निकट आकर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ७ ॥
ततोऽस्त्रमस्त्रेण निवार्य तेषां गाण्डीवधन्वा कुरुपुङ्गवानाम् । सम्मोहनं शत्रुसहोऽन्यदस्त्रं प्रादुश्चकारैन्द्ररपारणीयम् ॥ ८ ॥
तब शत्रुओंका वेग सहन करनेवाले इन्द्रपुत्र गाण्डीवधारी अर्जुनने अपने अस्त्रसे कौरवदलके उन श्रेष्ठ वीरोंके अस्त्रोंका निवारण करके सम्मोहन नामक दूसरा अस्त्र प्रकट किया, जिसका निवारण करना किसीके लिये भी असम्भव था ॥ ८ ॥
ततो दिशश्चानुदिशो विवृत्य शरैः सुधारैर्निशितैः सुपत्त्रैः ।