भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2532

तथानुयान्तं पुरुषप्रवीरं भीष्मः शरैरभ्यहनत् तरस्वी । स चापि भीष्मस्य हयान् निहत्य विव्याध पार्थो दशभिः पृषत्कैः ॥ १७ ॥ मनुष्योंमें प्रधान वीर अर्जुनको इस प्रकार जाते देख वेगशाली भीष्मने बाण मारकर उन्हें घायल कर दिया। तब अर्जुनने भी भीष्मके घोड़ोंको मारकर दस बाणोंसे उन्हें भी घायल कर दिया ॥ १७ ॥

ततोऽर्जुनो भीष्ममपास्य युद्धे विद्ध्वास्य यन्तारमरिष्टधन्वा । तस्थौ विमुक्तो रथवृन्दमध्या- न्मेघं विदार्येव सहस्ररश्मिः ॥ १८ ॥ दुर्भेद्य धनुषवाले अर्जुन भीष्मको युद्धभूमिमें छोड़कर और उनके सारथिको बाणोंसे बींधकर रथोंके घेरेसे बाहर जा खड़े हुए। उस समय वे बादलोंको छिन्न-भिन्न करके प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ १८ ॥

लब्ध्वा हि संज्ञां तु कुरुप्रवीराः पार्थं निरीक्ष्याथ सुरेन्द्रकल्पम् । रणे विमुक्तं स्थितमेकमाजौ