भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2533

स धार्तराष्ट्रस्त्वरितं बभाषे ।। १९ ।।

थोड़ी देर बाद होशमें आकर कौरववीरोंने देखा, देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी

कुन्तीपुत्र अर्जुन युद्धमें रथोंके घेरेसे बाहर हो अकेले खड़े हैं। उन्हें इस अवस्थामें देखकर

धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन तुरंत बोल उठा- ।। १९ ।।

अयं कथं वै भवतो विमुक्त-

स्तथा प्रमथ्नीत यथा न मुच्येत् ।

तमब्रवीच्छांन्तनवः प्रहस्य

क्व ते गता बुद्धिरभूत् क्व वीर्यम् ।। २० ।।

शान्तिं परां प्राप्य यदा स्थितोऽभू-

रुत्सृज्य बाणांश्च धनुर्विचित्रम् ।

‘पितामह! यह आपके हाथसे कैसे बच गया? आप इसे इस प्रकार मथ डालिये,

जिससे यह छूटने न पावे।' तब शान्तनुनन्दन भीष्मने हँसकर दुर्योधनसे कहा- 'राजन्!

जब तू अपने विचित्र धनुष और बाणोंको त्यागकर यहाँ गहरी शान्तिमें डूबा हुआ अचेत

पड़ा था, उस समय तेरी बुद्धि कहाँ गयी थी? और पराक्रम कहाँ था? ।। २० १/२ ।।

न त्वेष बीभत्सुरलं नृशंसं

कर्तुं न पापेऽस्य मनो विशिष्टम् ।। २१ ।।

त्रैलोक्यहेतोर्न जहेत् स्वधर्मं

सर्वे न तस्मान्निहता रणेऽस्मिन् ।

क्षिप्रं कुरून् याहि कुरुप्रवीर

विजित्य गाश्च प्रतियातु पार्थः ।

मा ते स्वकोऽर्थो निपतेत मोहात्

तत् संविधातव्यमरिष्टबन्धम् ।। २२ ।।

‘ये अर्जुन कभी निर्दयताका व्यवहार नहीं कर सकते। इनका मन कभी पापाचारमें

प्रवृत्त नहीं होता। ये त्रिलोकीके राज्यके लिये भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकते। यही कारण

है कि इन्होंने इस युद्धमें हम सबके प्राण नहीं लिये। कुरुकुलके प्रमुख वीर! अब तू शीघ्र ही

कुरुदेशको लौट चल। अर्जुन भी गायोंको जीतकर लौट जायँ। अब मोहवश तेरा अपना

स्वार्थ भी नष्ट न हो जाय, इसका ध्यान रख। सबको वही काम करना चाहिये, जिससे

अपना कल्याण हो' ।। २१-२२ ।।

वैशम्पायन उवाच

दुर्योधनस्तस्य तु तन्निशम्य

पितामहस्यात्महितं वचोऽथ ।

अतीतकामो युधि सोऽत्यमर्षी

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