भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

स धार्तराष्ट्रस्त्वरितं बभाषे ।। १९ ।।

थोड़ी देर बाद होशमें आकर कौरववीरोंने देखा, देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी

कुन्तीपुत्र अर्जुन युद्धमें रथोंके घेरेसे बाहर हो अकेले खड़े हैं। उन्हें इस अवस्थामें देखकर

धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन तुरंत बोल उठा- ।। १९ ।।

अयं कथं वै भवतो विमुक्त-

स्तथा प्रमथ्नीत यथा न मुच्येत् ।

तमब्रवीच्छांन्तनवः प्रहस्य

क्व ते गता बुद्धिरभूत् क्व वीर्यम् ।। २० ।।

शान्तिं परां प्राप्य यदा स्थितोऽभू-

रुत्सृज्य बाणांश्च धनुर्विचित्रम् ।

‘पितामह! यह आपके हाथसे कैसे बच गया? आप इसे इस प्रकार मथ डालिये,

जिससे यह छूटने न पावे।' तब शान्तनुनन्दन भीष्मने हँसकर दुर्योधनसे कहा- 'राजन्!

जब तू अपने विचित्र धनुष और बाणोंको त्यागकर यहाँ गहरी शान्तिमें डूबा हुआ अचेत

पड़ा था, उस समय तेरी बुद्धि कहाँ गयी थी? और पराक्रम कहाँ था? ।। २० १/२ ।।

न त्वेष बीभत्सुरलं नृशंसं

कर्तुं न पापेऽस्य मनो विशिष्टम् ।। २१ ।।

त्रैलोक्यहेतोर्न जहेत् स्वधर्मं

सर्वे न तस्मान्निहता रणेऽस्मिन् ।

क्षिप्रं कुरून् याहि कुरुप्रवीर

विजित्य गाश्च प्रतियातु पार्थः ।

मा ते स्वकोऽर्थो निपतेत मोहात्

तत् संविधातव्यमरिष्टबन्धम् ।। २२ ।।

‘ये अर्जुन कभी निर्दयताका व्यवहार नहीं कर सकते। इनका मन कभी पापाचारमें

प्रवृत्त नहीं होता। ये त्रिलोकीके राज्यके लिये भी अपना धर्म नहीं छोड़ सकते। यही कारण

है कि इन्होंने इस युद्धमें हम सबके प्राण नहीं लिये। कुरुकुलके प्रमुख वीर! अब तू शीघ्र ही

कुरुदेशको लौट चल। अर्जुन भी गायोंको जीतकर लौट जायँ। अब मोहवश तेरा अपना

स्वार्थ भी नष्ट न हो जाय, इसका ध्यान रख। सबको वही काम करना चाहिये, जिससे

अपना कल्याण हो' ।। २१-२२ ।।

वैशम्पायन उवाच

दुर्योधनस्तस्य तु तन्निशम्य

पितामहस्यात्महितं वचोऽथ ।

अतीतकामो युधि सोऽत्यमर्षी

राजा विनिःश्वस्य बभूव तूष्णीम् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पितामहके ये अपने लिये हितकर वचन सुनकर राजा दुर्योधनके मनमें युद्धकी इच्छा नहीं रह गयी। वह भीतर-ही-भीतर अत्यन्त अमर्षका भार लिये लंबी साँसें भरता हुआ चुप हो गया ॥ २३ ॥
तद् भीष्मवाक्यं हितमीक्ष्य सर्वे
धनंजयाग्निं च विवर्धमानम् ।
निवर्तनायैव मनो निदध्यु-
र्दुर्योधनं ते परिरक्षमाणाः ॥ २४ ॥
अन्य सब योद्धाओंको भी भीष्मजीका वह कथन हितकर जान पड़ा; क्योंकि युद्ध करनेसे तो धनंजयरूपी अग्नि उत्तरोत्तर बढ़कर प्रचण्ड रूप ही धारण करती जाती, यह सब सोचकर उन सबने दुर्योधनकी रक्षा करते हुए अपने देशको लौट जानेका ही निश्चय किया ॥ २४ ॥
तान् प्रस्थितान् प्रीतमनाः स पार्थो
धनंजयः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीरान् ।
अभाषमाणोऽनुनयं मुहूर्तं
वचोऽब्रवीत् सम्परिवृत्य भूयः ॥ २५ ॥
पितामहं शान्तनवं च वृद्धं
द्रोणं गुरुं च प्रणिपत्य मूर्ध्ना ।
उन कौरववीरोंको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुन्तीपुत्र धनंजय मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। वे दो घड़ीतक किसीसे अनुनय-विनयपूर्ण वचन न कहकर मौन रहे। फिर लौटकर उन्होंने वृद्ध पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कुछ बातचीत भी की ॥ २५ ॥
द्रौणिं कृपं चैव कुरूंश्च मान्या-
ञ्छरैर्विचित्रैरभिवाद्य चैव ॥ २६ ॥
दुर्योधनस्योत्तमरत्नचित्रं
चिच्छेद पार्थो मुकुटं शरेण ।
फिर अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा अन्य माननीय (बाह्लीक, सोमदत्त आदि) कौरवोंको बाणोंकी विचित्र रीतिसे नमस्कार करके पार्थने एक बाण मारकर दुर्योधनके उत्तम रत्नजटित विचित्र मुकुटको काट डाला ॥ २६१/२ ॥
आमन्त्र्य वीरांश्च तथैव मान्यान्
गाण्डीवघोषेण विनाद्य लोकान् ॥ २७ ॥
स देवदत्तं सहसा विनाद्य
विदार्य वीरो द्विषतां मनांसि ।

इसी प्रकार अन्य माननीय वीरोंसे भी विदा ले गाण्डीवकी टंकारसे सम्पूर्ण जगत्‌को

प्रतिध्वनित करके वीर अर्जुनने सहसा देवदत्त नामक शंख बजाया और शत्रुओंका दिल

दहला दिया ।। २७१/२ ।।

ध्वजेन सर्वानभिभूय शत्रून्

सहेममालेन विराजमानः ।। २८ ।।

दृष्ट्वा प्रयातांस्तु कुरून् किरीटी

हृष्टोऽब्रवीत् तत्र स मत्स्यपुत्रम् ।

आवर्तयाश्वान् पशवो जितास्ते

याताः परे याहि पुरं प्रहृष्टः ।। २९ ।।

इस प्रकार अपने रथकी सुवर्णमालामण्डित ध्वजासे सम्पूर्ण शत्रुओंका तिरस्कार करके

अर्जुन विजयोल्लाससे विशेष शोभा पाने लगे। कौरव चले गये, यह देखकर किरीटधारी

अर्जुनको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मत्स्यनरेशके पुत्र उत्तरसे वहाँ इस प्रकार कहा

—'राजकुमार! अब घोड़ोंको लौटाओ। तुम्हारी गौओंको जीत लिया गया और शत्रु भाग

गये; इसलिये अब तुम आनन्दपूर्वक नगरकी ओर चलो' ।। २८-२९ ।।

देवास्तु दृष्ट्वा महदद्भुतं तद्

युद्धं कुरूणां सह फाल्गुनेन ।

जग्मुर्यथास्वं भवनं प्रतीताः

पार्थस्य कर्माणि विचिन्तयन्तः ।। ३० ।।

अर्जुनके साथ होनेवाला कौरवोंका वह अत्यन्त अद्भुत युद्ध देखकर देवतालोग बड़े

प्रसन्न हुए और अर्जुनके पराक्रमका स्मरण करते हुए अपने-अपने भवनको चले

गये ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि समस्तकौरवपलायने

षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें समस्त कौरवोंके पलायनसे

सम्बन्ध रखनेवाला छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2536)

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सप्तषष्टितमोऽध्यायः

विजयी अर्जुन और उत्तरका राजधानीकी ओर प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

ततो विजित्य संग्रामे कुरून् स वृषभेक्षणः ।
समानयामास तदा विराटस्य धनं महत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार बैल-सी विशाल आँखोंवाले अर्जुन उस समय युद्धमें कौरवोंको जीतकर विराटका वह महान् गोधन लौटा लाये ॥ १ ॥
गतेषु च प्रभग्नेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वतः ।
वनान्निष्क्रम्य गहनाद् बहवः कुरुसैनिकाः ॥ २ ॥
भयात् संत्रस्तमनसः समाजग्मुस्ततस्ततः ।
मुक्तकेशास्त्वदृश्यन्त स्थिताः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ३ ॥
क्षुत्पिपासापरिश्रान्ता विदेशस्था विचेतसः ।
जब कौरव-दलके लोग चले गये या इधर-उधर सब दिशाओंमें भाग गये, उस समय बहुत-से कौरवसैनिक जो घने जंगलमें छिपे हुए थे, वहाँसे निकलकर डरते-डरते अर्जुनके पास आये। उनके मनमें भय समा गया था। वे भूखे-प्यासे और थके-माँदे थे। परदेशमें होनेके कारण उनके हृदयकी व्याकुलता और बढ़ गयी थी। वे उस समय केश खोले और हाथ जोड़े हुए खड़े दिखायी दिये ॥ २-३ १/२ ॥
ऊचुः प्रणम्य सम्भ्रान्ताः पार्थ किं करवाम ते ॥ ४ ॥
(प्राणानन्तर्मनोयातान् प्रयाचिष्यामहे वयम् ।
वयं चार्जुन ते दासा ह्यनुरक्ष्या ह्यनायकाः ॥
वे सब-के-सब अर्जुनको प्रणाम करके घबराये हुए बोले—'कुन्तीनन्दन! हम आपकी क्या सेवा करें? अर्जुन! हम आपसे हृदयके भीतर छिपे हुए अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये याचना करते हैं। हमलोग आपके दास और अनाथ हैं; अतः आपको सदा हमारी रक्षा करनी चाहिये' ॥ ४ ॥

अर्जुन उवाच

अनाथान् दुःखितान् दीनान्
कृशान् वृद्धान् पराजितान् ।
न्यस्तशस्त्रान् निराशांश्च
नाहं हन्मि कृताञ्जलीन् ॥)
स्वस्ति व्रजत वो भद्रं न भेतव्यं कथंचन ।

नाहमार्तान् जिघांसामि भृशमाश्वासयामि वः ।। ५ ।।
**अर्जुनने कहा—**सैनिको! जो लोग अनाथ, दुःखी, दीन, दुर्बल, वृद्ध, पराजित, अस्त्र-शस्त्रोंको नीचे डाल देनेवाले, प्राणोंसे निराश एवं हाथ जोड़कर शरणागत होते हैं, उन सबको मैं नहीं मारता हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कुशलपूर्वक घर लौट जाओ। तुम्हें मेरी ओरसे किसी प्रकारका भय नहीं होना चाहिये। मैं संकटमें पड़े हुए मनुष्योंको नहीं मारना चाहता। इस बातके लिये मैं तुम्हें पूरा-पूरा विश्वास दिलाता हूँ ।। ५ ।।

वैशम्पायन उवाच

तस्य तामभयां वाचं श्रुत्वा योधाः समागताः ।
आयुःकीर्तियशोदाभिस्तमाशीर्भिरनन्दयन् ।। ६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुनकी वह अभयदानयुक्त वाणी सुनकर वहाँ आये हुए समस्त योद्धाओंने उन्हें आयु, कीर्ति तथा सुयश बढ़ानेवाले आशीर्वाद देते हुए उनका अभिनन्दन किया ।। ६ ।।

ततोऽर्जुनं नागमिव प्रभिन्न-
मुत्सृज्य शत्रून् विनिवर्तमानम् ।
विराटराष्ट्राभिमुखं प्रयान्तं
नाशक्नुवंस्तं कुरवोऽभियातुम् ।। ७ ।।
उस समय अर्जुन शत्रुओंको छोड़कर—उन्हें जीवनदान दे, मदकी धारा बहानेवाले हाथीकी भाँति मस्तीकी चालसे विराटनगरकी ओर लौटे जा रहे थे। कौरवोंको उनपर आक्रमण करनेका साहस नहीं हुआ ।।

ततः स तन्मेघमिवापतन्तं
विद्राव्य पार्थः कुरुसैन्यवृन्दम् ।
मत्स्यस्य पुत्रं द्विषतां निहन्ता
वचोऽब्रवीत् सम्परिरभ्य भूयः ।। ८ ।।
कौरवोंकी सेना मेघोंकी घटा-सी उमड़ आयी थी; किंतु शत्रुहन्ता पार्थने उसे मार भगाया। इस प्रकार शत्रुसेनाको परास्त करके अर्जुनने उत्तरको पुनः हृदयसे लगाकर कहा — ।। ८ ।।

पितुः सकाशे तव तात सर्वे
वसन्ति पार्था विदितं तवैव ।
तान् मा प्रशंसैर्नगरं प्रविश्य
भीतः प्रणश्येद्धि स मत्स्यराजः ।। ९ ।।
‘तात! तुम्हारे पिताके समीप समस्त पाण्डव निवास करते हैं, यह बात अबतक तुम्हींको विदित हुई है; अतः तुम नगरमें प्रवेश करके पाण्डवोंकी प्रशंसा न करना, नहीं तो

मत्स्यराज डरकर प्राण त्याग देंगे ॥ ९ ॥ मया जिता सा ध्वजिनी कुरूणां मया च गावो विजिता द्विषद्भ्यः। पितुः सकाशं नगरं प्रविश्य त्वमात्मनः कर्म कृतं ब्रवीहि ॥ १० ॥ 'राजधानीमें प्रवेश करके पिताके समीप जानेपर तुम यही कहना कि मैंने कौरवोंकी उस विशाल सेनापर विजय पायी है और मैंने ही शत्रुओंसे अपनी गौओंको जीता है। सारांश यह कि युद्धमें जो कुछ हुआ है, वह सब तुम अपना ही किया हुआ पराक्रम बताना' ॥ १० ॥

उत्तर उवाच

यत् ते कृतं कर्म न पारणीयं तत् ते कर्म कर्तुं मम नास्ति शक्तिः। न त्वां प्रवक्ष्यामि पितुः सकाशे यावन्न मां वक्ष्यसि सव्यसाचिन् ॥ ११ ॥ **उत्तरने कहा—**सव्यसाचिन्! आपने जो पराक्रम किया है, वह दूसरेके लिये असम्भव है। वैसा अद्भुत कर्म करनेकी मुझमें शक्ति नहीं है; तथापि जबतक आप मुझे आज्ञा न देंगे, तबतक पिताजीके निकट आपके विषयमें मैं कुछ भी नहीं कहूँगा ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

स शत्रुसेनांमवजित्य जिष्णु- राच्छिद्य सर्वं च धनं कुरुभ्यः। श्मशानमागत्य पुनः शमीं ता- मभ्येत्य तस्थौ शरविक्षताङ्गः ॥ १२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विजयशील अर्जुन पूर्वोक्तरूपसे शत्रुसेनाको परास्त करके कौरवोंके हाथसे सारा गोधन छीन लेनेके बाद पुनः श्मशानभूमिमें उसी शमीवृक्षके समीप आकर खड़े हुए। उस समय उनके सभी अंग बाणोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो रहे थे ॥

ततः स वह्निप्रतिमो महाकपिः सहैव भूतैर्दिवमुत्पपात। तथैव माया विहिता बभूव ध्वजं च सैंहं युयुजे रथे पुनः ॥ १३ ॥ तदनन्तर वह अग्निके समान तेजस्वी महावानर ध्वजनिवासी भूतगणोंके साथ आकाशमें उड़ गया। उसी प्रकार ध्वजसहित वह दैवी माया भी विलीन हो गयी और

अर्जुनके रथमें फिर वही सिंहध्वज लगा दिया गया ।। १३ ।।
विधाय तच्चायुधमाजिवर्धनं
कुरूत्तमानामिषुधीः शरांस्तथा ।
प्रायात् स मत्स्यो नगरं प्रहृष्टः
किरीटिना सारथिना महात्मना ।। १४ ।।
कुरुकुलशिरोमणि पाण्डवोंके युद्धक्षमतावर्धक आयुधों, तरकसों और बाणोंको फिर पूर्ववत् शमीवृक्ष-पर रखकर मत्स्यकुमार उत्तर महात्मा अर्जुनको सारथि बना उनके साथ प्रसन्नतापूर्वक नगरको चला ।। १४ ।।
पार्थस्तु कृत्वा परमार्थकर्म
निहत्य शत्रून् द्विषतां निहन्ता ।
चकार वेणीं च तथैव भूयो
जग्राह रश्मीन् पुनरुत्तरस्य ।
विवेश हृष्टो नगरं महामना
बृहन्नलारूपमुपेत्य सारथिः ।। १५ ।।
शत्रुहन्ता कुन्तीपुत्रने शत्रुओंको मारकर महान् वीरोचित पराक्रम करके पुनः पूर्ववत् सिरपर वेणी धारण कर ली और उत्तरके घोड़ोंकी रास सँभाली। इस प्रकार बृहन्नलाका रूप धारणकर महामना अर्जुनने सारथिके रूपमें प्रसन्नतापूर्वक राजधानीमें प्रवेश किया ।।

वैशम्पायन उवाच
ततो निवृत्ताः कुरवः प्रभग्ना वशमास्थिताः ।
हस्तिनापुरमुद्दिश्य सर्वे दीना ययुस्तदा ।। १६ ।।
पन्थानमुपसङ्गम्य फाल्गुनो वाक्यमब्रवीत् ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर कौरव युद्धसे भागकर विवशतापूर्वक लौट गये। उन सबने दीनभावसे उस समय हस्तिनापुरकी ओर प्रस्थान किया। इधर अर्जुनने नगरके रास्तेमें आकर उत्तरसे कहा— ।। १६-१७ ।।

राजपुत्र प्रत्यवेक्ष समानीतानि सर्वशः ।
गोकुलानि महाबाहो वीर गोपालकैः सह ॥ १८ ॥
ततोऽपराह्णे यास्यामो विराटनगरं प्रति ।
आश्वास्य पाययित्वा च परिप्लाव्य च वाजिनः ॥ १९ ॥
‘महाबाहु राजकुमार! देख लो, तुम्हारे सब गोधन ग्वालोंके साथ यहाँ आ गये हैं। वीर! अब हम-लोग घोड़ोंको पानी पिला और नहलाकर उनकी थकावट दूर हो जानेके बाद अपराह्नकालमें विराटनगर चलेंगे ।। १८-१९ ।।

गच्छन्तु त्वरिताश्चैमे गोपालाः प्रेषितास्त्वया ।
नगरे प्रियमाख्यातुं घोषयन्तु च ते जयम् ॥ २० ॥
‘तुम्हारे द्वारा भेजे हुए ये ग्वाले तुरंत नगरमें विजयका प्रिय संवाद सुनानेके लिये जायँ और यह घोषित कर दें कि राजकुमार उत्तरकी जीत हुई है’ ।। २० ।।

वैशम्पायन उवाच

अथोत्तरस्त्वरमाणः स दूता-
नाज्ञापयद् वचनात् फाल्गुनस्य ।
आचक्षध्वं विजयं पार्थिवस्य
भग्नाः परे विजिताश्चापि गावः ॥ २१ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब अर्जुनके कथनानुसार उत्तरने बड़ी उतावलीके साथ दूतोंको आज्ञा दी—‘जाओ और सूचित करो कि महाराजकी विजय हुई है। शत्रु भाग गये और गौएँ जीतकर वापस लायी गयी हैं’ ॥ २१ ॥

इत्येवं तौ भारतमत्स्यवीरौ सम्मन्त्र्य सङ्गम्य ततः शमीं ताम् । अभ्येत्य भूयो विजयेन तृप्ता- वृत्सृष्ट मारोपयतां स्वभाण्डम् ॥ २२ ॥

इस प्रकार भरतकुल और मत्स्यकुलके उन दोनों वीरोंने आपसमें सलाह करके पूर्वोक्त शमीवृक्षके समीप जा पहलेके उतारे हुए अपने अलंकार आदि शरीरपर धारण कर लिये थे और उनके रखनेके पात्र (भी) रथपर चढ़ा लिये थे ॥ २२ ॥

स शत्रुसेनाम्भिभूय सर्वा- माच्छिद्य सर्वं च धनं कुरुभ्यः । वैराटिरायान्नगरं प्रतीतो बृहन्नलासारथिना प्रवीरः ॥ २३ ॥

इस तरह शत्रुओंकी सम्पूर्ण सेनाको पराजित करके कौरवोंसे सारा गोधन छीनकर विराटकुमार वीर उत्तर बृहन्नला सारथिके साथ प्रसन्नतापूर्वक नगरकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरागमने सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरका आगमनविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं।]

अध्याय (पृष्ठ 2542)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराट्द्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना

वैशम्पायन उवाच

धनं चापि विजित्याशु विराटो वाहिनीपतिः ।
विवेश नगरं हृष्टश्चतुर्भिः पाण्डवैः सह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सेनाओंके स्वामी राजा विराटने (दक्षिण गोष्ठकी) गौओंको जीतकर शीघ्र ही चारों पाण्डवोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश किया ॥ १ ॥

जित्वा त्रिगर्तान् संग्रामे गाश्चैवादाय सर्वशः ।
अशोभत महाराज सहपार्थः श्रिया वृतः ॥ २ ॥

महाराज! संग्राममें त्रिगर्तोंको हराकर सम्पूर्ण गौएँ वापस ले विजयलक्ष्मीसे सम्पन्न महाराज विराट कुन्तीपुत्रोंके साथ बड़ी शोभा पाने लगे ॥ २ ॥

तमासनगतं वीरं सुहृदां हर्षवर्धनम् ।
उपासाञ्चक्रिरे सर्वे सह पार्थैः परंतपाः ॥ ३ ॥

मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले वीरवर विराट राजसिंहासनपर विराजमान हुए। उस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले सब शूरवीर कुन्तीपुत्रोंके साथ राजाकी सेवाके लिये उनके पास बैठे ॥ ३ ॥

उपतस्थुः प्रकृतयः समस्ता ब्राह्मणैः सह ।
सभाजितः ससैन्यस्तु प्रतिनन्द्याथ मत्स्यराट् ॥ ४ ॥

फिर ब्राह्मणोंसहित समस्त प्रजावर्गके लोग उपस्थित हुए। सबने सेनासहित मत्स्यराजका अभिनन्दन एवं स्वागत-सत्कार किया ॥ ४ ॥

विसर्जयामास तदा द्विजांश्च प्रकृतीस्तथा ।
तथा स राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः ॥ ५ ॥
उत्तरं परिपप्रच्छ क्व यात इति चाब्रवीत् ।
आचख्युस्तस्य तत् सर्वं स्त्रियः कन्याश्च वेश्मनि ॥ ६ ॥

तदनन्तर मत्स्यदेशके राजा सेनाओंके स्वामी विराटने ब्राह्मणों तथा प्रजावर्गके लोगोंको विदा कर दिया और (अन्तःपुरमें जाकर) उत्तरके विषयमें पूछा—'राजकुमार उत्तर

कहाँ गये हैं?' तब घरमें रहनेवाली स्त्रियों और कन्याओंने उनसे सब बातें बनायीं — ॥ ५-६ ॥ अन्तःपुरचराश्चैव कुरुभिर्गोधनं हृतम् । विजेतुमभिसंरब्ध एक एवातिसाहसात् । बृहन्नलासहायश्च निर्गतः पृथिवीञ्जयः ॥ ७ ॥ 'इसी प्रकार अन्तःपुरमें रहनेवाली स्त्रियोंने भी बताया कि कौरवोंने हमारे गोष्ठका गोधन हर लिया है, अतः कुमार भूमिंजय अत्यन्त साहसके कारण क्रोधमें भरकर अकेले ही उन गौओंको जीत लानेके लिये बृहन्नलाके साथ निकले हैं' ॥ ७ ॥ उपयातानतिरथान् भीष्मं शान्तनवं कृपम् । कर्णं दुर्योधनं द्रोणं द्रोणपुत्रं च षड् रथान् ॥ ८ ॥ 'सुना है, शान्तनुनन्दन भीष्म, कृपाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, द्रोणाचार्य तथा द्रोणपुत्र अश्वत्थामा—ये छः अतिरथी वीर युद्धके लिये आये हैं' ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

राजा विराटोऽथ भृशाभितप्तः श्रुत्वा सुतं त्वेकरथेन यातम् । बृहन्नलासारथिमाजिवर्धनं प्रोवाच सर्वानथ मन्त्रिमुख्यान् ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युद्धमें आगे बढ़नेवाले अपने पुत्रको बृहन्नला सारथिके साथ एकमात्र रथकी सहायतासे कौरवोंका सामना करनेके लिये गया हुआ सुनकर राजा विराटको बड़ा संताप हुआ। उन्होंने (अपने) सभी प्रधान मन्त्रियोंसे कहा— ॥ ९ ॥ सर्वथा कुरवस्ते हि ये चान्ये वसुधाधिपाः । त्रिगर्तान् निःसृताञ्छ्रुत्वा न स्थास्यन्ति कदाचन ॥ १० ॥ 'कौरव हों या दूसरे कोई राजा, जब वे सुनेंगे कि त्रिगर्त लोग युद्धमें पीठ दिखाकर भाग गये हैं, तब वे कदापि यहाँ ठहर नहीं सकेंगे' ॥ १० ॥ तस्माद् गच्छन्तु मे योधा बलेन महता वृताः । उत्तरस्य परीप्सार्थं ये त्रिगर्तैरविक्षताः ॥ ११ ॥ 'अतः मेरे सैनिकोंमेंसे जो लोग त्रिगर्तोंके साथ होनेवाले युद्धमें घायल नहीं हुए हों, वे सब विशाल सेनाके साथ राजकुमार उत्तरकी रक्षाके लिये जायँ' ॥ हयांश्च नागांश्च रथांश्च शीघ्रं पदातिसङ्घांश्च ततः प्रवीरान् । प्रस्थापयामास सुतस्य हेतो-

विचित्रशस्त्राभरणोपपन्नान् ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने पुत्रकी रक्षाके लिये विचित्र-विचित्र आयुधों और आभूषणोंसे विभूषित घुड़सवारों, हाथीसवारों, रथारोहियों तथा पैदल योद्धाओंके समूहोंको, जो बड़े शूरवीर थे, भेजा ॥ १२ ॥
एवं स राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपतिः ।
व्यादिदेशाथ तां क्षिप्रं वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् ॥ १३ ॥
कुमारमाशु जानीत यदि जीवति वा न वा ।
यस्य यन्ता गतः षण्ढो मन्येऽहं स न जीवति ॥ १४ ॥
इस प्रकार सेनाओंके स्वामी मत्स्यनरेश विराटने अपनी उस चतुरंगिणी सेनाको शीघ्र आदेश दिया, 'जाओ, शीघ्र पता लगाओ। कुमार जीवित हैं या नहीं। एक हिजड़ा जिसका सारथि बनकर गया है, वह मेरी समझसे तो अब जीवित नहीं होगा' ॥ १३-१४ ॥

वैशम्पायन उवाच

तमब्रवीद् धर्मराजो विहस्य
विराटराजं तु भृशाभितप्तम् ।
बृहन्नला सारथिश्चेन्नरेन्द्र
परे न नेष्यन्ति तवाद्य गास्ताः ॥ १५ ॥
सर्वान् महीपान् सहितान् कुरूंश्च
तथैव देवासुरसिद्धयक्षान् ।
अलं विजेतुं समरे सुतस्ते
स्वनुष्ठितः सारथिना हि तेन ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा विराटको बहुत दुःखी देखकर धर्मराज युधिष्ठिरने उनसे हँसकर कहा—'नरेन्द्र! यदि बृहन्नला सारथि है, तो यह विश्वास कीजिये कि शत्रु आज आपकी वे गौएँ नहीं ले जा सकेंगे। उस हितैषी सारथिके सहयोगसे सब कार्य ठीक-ठीक कर लेनेपर आपका पुत्र युद्धमें समस्त राजाओं तथा संगठित होकर आये हुए कौरवोंकी तो बात ही क्या, देवता, असुर, सिद्ध और यक्षोंपर भी निश्चय ही विजय पा सकता है' ॥ १५-१६ ॥

वैशम्पायन उवाच

अथोत्तेरेण प्रहिता दूतास्ते शीघ्रगामिनः ।
विराटनगरं प्राप्य विजयं समवेदयन् ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इसी समय उत्तरके भेजे हुए शीघ्रगामी दूतोंने विराटनगरमें आकर विजयकी सूचना दी ॥ १७ ॥
राज्ञस्तत् सर्वमाचख्यौ मन्त्री विजयमुत्तमम् ।

पराजयं कुरूणां चाप्युपायान्तं तथोत्तरम् ॥ १८ ॥ सर्वा विनिर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः । उत्तरः सह सूतेन कुशली च परंतपः ॥ १९ ॥ मन्त्रीने वह सब समाचार महाराजसे कह सुनाया। अपने पक्षकी उत्तम विजय और कौरवोंकी करारी हार हुई है। राजकुमार उत्तर नगरमें आ रहे हैं। समस्त गौएँ जीत ली गयीं तथा कौरव परास्त होकर भाग गये। शत्रुओंको संताप देनेवाले कुमार उत्तर सारथिसहित सकुशल हैं ॥ १८-१९ ॥

युधिष्ठिर उवाच दिष्ट्या विनिर्जिता गावः कुरवश्च पलायिताः । नाद्भुतं त्वेव मन्येऽहं यत् ते पुत्रोऽजयत् कुरून् ॥ २० ॥ ध्रुव एव जयस्तस्य यस्य यन्ता बृहन्नला । (देवेन्द्रसारथिश्चैव मातलिर्लघुविक्रमः । कृष्णस्य सारथिश्चैव न बृहन्नलया समौ ॥) युधिष्ठिरने कहा—महाराज! सौभाग्यकी बात है कि गौएँ जीत ली गयीं और कौरव भाग गये। आपके पुत्रने कौरवोंपर जो विजय पायी है, उसे मैं कोई आश्चर्यकी बात नहीं मानता। जिसका सारथि बृहन्नला हो, उसकी विजय तो निश्चित ही है। देवराज इन्द्रका शीघ्रगामी सारथि मातलि तथा श्रीकृष्णका सारथि दारुक—ये दोनों बृहन्नलाकी समानता नहीं कर सकते ॥ २० १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो विराटो नृपतिः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ २१ ॥ श्रुत्वा स विजयं तस्य कुमारस्यामितौजसः । आच्छादयित्वा दूतांस्तान् मन्त्रिणं सोऽभ्यचोदयत् ॥ २२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने अमित-पराक्रमी कुमारकी विजयका समाचार सुनकर राजा विराट बड़े प्रसन्न हुए। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने वस्त्र और आभूषणोंसे उन दूतोंका सत्कार किया और मन्त्रीको आज्ञा दी— ॥ २१-२२ ॥ राजमार्गाः क्रियन्तां मे पताकाभिरलंकृताः । पुष्पोपहारैरर्च्यन्तां देवताश्चापि सर्वशः ॥ २३ ॥ कुमारा योधमुख्याश्च गणिकाश्च स्वलंकृताः । वादित्राणि च सर्वाणि प्रत्युद्यान्तु सुतं मम ॥ २४ ॥ 'मेरे नगरकी सड़कोंको पताकाओंसे अलंकृत किया जाय। फूलों तथा नाना प्रकारके उपहारोंसे सब देवताओंकी पूजा होनी चाहिये। कुमार, मुख्य-मुख्य योद्धा, शृंगारसे सुशोभित वारांगनाएँ और सब प्रकारके बाजे-गाजे मेरे पुत्रकी अगवानीमें भेजे जायँ ॥

घण्टावान् मानवः शीघ्रं मत्तमारुह्य वारणम् ।

शृङ्गाटकेषु सर्वेषु आख्यातु विजयं मम ।। २५ ।।

उत्तरा च कुमारीभिर्बह्वीभिः परिवारिता ।

शृंगारवेषाभरणा प्रत्युद्यातु सुतं मम ।। २६ ।।

'एक मनुष्य शीघ्र ही हाथमें घण्टा लिये मतवाले गजराजपर बैठ जाय और नगरके

समस्त चौराहोंपर हमारी विजयका संवाद सुनावे। राजकुमारी उत्तरा भी उत्तम शृङ्गार और

सुन्दर वेष-भूषासे सुशोभित हो अन्य राजकुमारियोंके साथ मेरे पुत्रकी अगवानीमें जायँ' ।।

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा चेदं वचनं पार्थिवस्य

सर्वं पुरं स्वस्तिकपाणिभूतम् ।

भेर्यश्च तूर्याणि च वारिजाश्च

वेषैः परार्थ्यैः प्रमदाः शुभाश्च ।। २७ ।।

तथैव सूतैः सह मागधैश्च

नान्दीवाद्याः पणवास्तूर्यवाद्याः ।

पुराद् विराटस्य महाबलस्य

प्रत्युद्ययुः पुत्रमनन्तवीर्यम् ।। २८ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! राजाकी इस आज्ञाको सुनकर बहुमूल्य वेशभूषासे

सुशोभित सौभाग्यवती तरुणी स्त्रियों, सूत, मागध और बंदीजनोंसहित समस्त पुरवासी,

हाथोंमें मांगलिक वस्तुएँ लेकर भेरी, तूर्य, शंख तथा पणव आदि मांगलिक बाजे साथ लिये

महाबली विराटके अनन्त पराक्रमी पुत्र उत्तरकी अगवानी करनेके लिये नगरसे बाहर

गये ।। २७-२८ ।।

प्रस्थाप्य सेनां कन्याश्च गणिकाश्च स्वलङ्कृताः ।

मत्स्यराजो महाप्राज्ञः प्रहृष्ट इदमब्रवीत् ।। २९ ।।

राजन्! तदनन्तर सेना, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याओं और वारांगनाओंको

भेजकर परम बुद्धिमान् मत्स्यनरेश हर्षोल्लासमें भरकर इस प्रकार बोले— ।।

अक्षानाहर सैरन्ध्रि कङ्क द्यूतं प्रवर्तताम् ।

तं तथावादिनं दृष्ट्वा पाण्डवः प्रत्यभाषत ।। ३० ।।

'सैरन्ध्री! जा, पासे ले आ। कंक! जूआ प्रारम्भ हो। 'उन्हें ऐसा कहते देख पाण्डुनन्दन

युधिष्ठिर बोले— ।। ३० ।।

न देवितव्यं हृष्टेन कितवेनेति नः श्रुतम् ।

तं त्वामद्य मुदा युक्तं नाहं देवितुमुत्सहे ।

प्रियं तु ते चिकीर्षामि वर्ततां यदि मन्यसे ।। ३१ ।।

‘राजन्! मैंने सुना है, जब चालाक जुआरी अत्यन्त हर्षमें भरा हो, तो उसके साथ जूआ नहीं खेलना चाहिये। आज आप भी बड़े आनन्दमें मग्न हैं; अतः आपके साथ जूआ खेलनेका साहस नहीं होता, तथापि आपका प्रिय कार्य तो करना ही चाहता हूँ, अतः यदि आपकी इच्छा हो, तो खेल शुरू हो सकता है’ ॥ ३१ ॥

विराट उवाच

स्त्रियो गावो हिरण्यं च यच्चान्यद् वसु किञ्चन ।
न मे किञ्चित् त्वया रक्ष्यमन्तरेणापि देवितुम् ॥ ३२ ॥
विराटने कहा— स्त्रियाँ, गौएँ, सुवर्ण तथा अन्य जो कोई भी धन सुरक्षित रखा जाता है, बिना जूएके वह सब मुझे कुछ नहीं चाहिये। (मुझे तो जूआ ही सबसे अधिक प्रिय है) ॥ ३२ ॥

कङ्क उवाच

किं ते द्यूतेन राजेन्द्र बहुदोषेण मानद ।
देवने बहवो दोषास्तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ॥ ३३ ॥
कंक बोले— सबको मान देनेवाले महाराज! आपको जूएसे क्या लेना है? इसमें तो बहुत-से दोष हैं। जूआ खेलनेमें अनेक दोष होते हैं, इसलिये इसे त्याग देना चाहिये ॥ ३३ ॥
श्रुतस्ते यदि वा दृष्टः पाण्डवेयो युधिष्ठिरः ।
स राष्ट्रं सुमहत् स्फीतं भ्रातॄंश्च त्रिदशोपमान् ॥ ३४ ॥
राज्यं हारितवान् सर्वं तस्माद् द्यूतं न रोचये ।
(निःसंशयं स कितवः पश्चात् तप्यति पाण्डवः ॥
विविधानां च रत्नानां धनानां च पराजये ।
अस्मिन् क्षितिविनाशश्च वाक्पारुष्यमनन्तरम् ॥
अविश्वास्यं बुधैर्नित्यमेकाह्ना द्रव्यनाशनम् ।)
अथवा मन्यसे राजन् दीव्याम यदि रोचते ॥ ३५ ॥
आपने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको देखा होगा अथवा उनका नाम तो अवश्य सुना होगा। वे अपने अत्यन्त समृद्धिशाली राष्ट्रको, देवताओंके समान तेजस्वी भाइयोंको तथा समूचे राज्यको भी जूएमैं हार गये थे। अतः मैं जूएको पसंद नहीं करता। नाना प्रकारके रत्नों और धनको हार जानेके कारण अब वे जुआरी युधिष्ठिर निश्चय ही पश्चात्ताप करते होंगे। इस जूएमैं आसक्त होनेपर राज्यका नाश होता है, फिर जुआरी एक दूसरेके प्रति कटु वचनोंका प्रयोग करते हैं। जूआ एक ही दिनमें महान् धनराशिका नाश करनेवाला है। अतः विद्वान् पुरुषोंको इस (धोखा देनेवाले जूए) पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। राजन्! तो भी यदि आपकी रुचि और आग्रह हो, तो हम खेलेंगे ही ॥ ३४-३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्रवर्तमाने द्यूते तु मत्स्यः पाण्डवमब्रवीत् । पश्य पुत्रेण मे युद्धे तादृशाः कुरवो जिताः ॥ ३६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जूएका खेल आस्मभ हो गया। खेलते-खेलते मत्स्यराजने पाण्डुनन्दनसे कहा—‘देखो, आज मेरे बेटेने युद्धमें उन प्रसिद्ध कौरवोंपर विजय पायी है’ ॥ ३६ ॥

ततोऽब्रवीन्महात्मा स एनं राजा युधिष्ठिरः । बृहन्नला यस्य यन्ता कथं स न जयेद् युधि ॥ ३७ ॥ तब महात्मा राजा युधिष्ठिरने विराटसे कहा—‘बृहन्नला जिसका सारथि हो, वह युद्धमें कैसे नहीं जीतेगा?’ ॥ ३७ ॥

इत्युक्तः कुपितो राजा मत्स्यः पाण्डवमब्रवीत् । समं पुत्रेण मे षण्ढं ब्रह्मबन्धो प्रशंससि ॥ ३८ ॥ यह सुनते ही मत्स्यनरेश कुपित हो उठे और पाण्डुनन्दनसे बोले—‘अधम ब्राह्मण! तू मेरे पुत्रके समान एक हिजड़ेकी प्रशंसा करता है! ॥ ३८ ॥

वाच्यावाच्यं न जानीषे नूनं मामवमन्यसे । भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् कस्मान्न स विजेष्यति ॥ ३९ ॥ वयस्यत्वात् तु ते ब्रह्मन्नपराधमिमं क्षमे । नेदृशं तु पुनर्व्याच्यं यदि जीवितुमिच्छसि ॥ ४० ॥ ‘क्या कहना चाहिये और क्या नहीं, इसका तुझे ज्ञान नहीं है। निश्चय ही तू अपनी बातोंसे मेरा अपमान कर रहा है। भला, मेरा पुत्र भीष्म-द्रोण आदि समस्त वीरोंको क्यों नहीं जीत लेगा? ब्रह्मन्! मित्र होनेके नाते ही मैं तुम्हारे इस अपराधको क्षमा करता हूँ। यदि जीनेकी इच्छा हो, तो फिर ऐसी बात न करना’ ॥ ३९-४० ॥

युधिष्ठिर उवाच

यत्र द्रोणस्तथा भीष्मो द्रौणिर्वैकर्तनः कृपः । दुर्योधनश्च राजेन्द्रस्तथान्ये च महारथाः ॥ ४१ ॥ मरुद्गणैः परिवृतः साक्षादपि मरुत्पतिः । कोऽन्यो बृहन्नलायास्तान् प्रतियुध्येत सङ्गतान् ॥ ४२ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**जहाँ द्रोणाचार्य, भीष्म, अश्वत्थामा, कर्ण, कृपाचार्य राजा दुर्योधन तथा अन्य महारथी उपस्थित हों, वहाँ बृहन्नलाके सिवा दूसरा कौन पुरुष चाहे वह देवताओंसे घिरा हुआ साक्षात् देवराज इन्द्र ही क्यों न हो, उन सब संगठित वीरोंका सामना कर सकता है? ॥ ४१-४२ ॥

यस्य बाहुबले तुल्यो न भूतो न भविष्यति ।

अतीव समरं दृष्ट्वा हर्षो यस्योपजायते ॥ ४३ ॥

योऽजयत् सङ्गतान् सर्वान् ससुरासुरमानवान् ।

तादृशेन सहायेन कस्मात् स न विजेष्यते ॥ ४४ ॥

बाहुबलमें जिसकी समानता करनेवाला न कोई हुआ है और न होगा ही, युद्धका

अवसर आया देखकर जिसे अत्यन्त हर्ष होता है, जिसने युद्धमें एकत्र हुए देवता, असुर

और मनुष्य—सबको जीत लिया है, वैसे बृहन्नला—जैसे सहायकके होनेपर राजकुमार

उत्तर विजयी क्यों न होंगे? ॥ ४३-४४ ॥

विराट उवाच

बहुशः प्रतिषिद्धोऽसि न च वाचं नियच्छसि ।

नियन्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद् धर्ममाचरेत् ॥ ४५ ॥

विराटने कहा—कंक! मैंने बहुत बार मना किया, तो भी तू अपनी जबान नहीं बंद कर

रहा है। सच है, यदि शासन करनेवाला राजा न हो, तो कोई भी धर्मका आचरण नहीं कर

सकता ॥ ४५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रकुपितो राजा तमक्षेणाहनद् भृशम् ।

मुखे युधिष्ठिरं कोपान्नैवमित्येव भर्त्सयन् ॥ ४६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इतना कहकर कोपमें भरे हुए राजा विराटने वह

पासा युधिष्ठिरके मुखपर जोरसे दे मारा तथा रोषपूर्वक डाँटते हुए उनसे कहा—'फिर कभी

ऐसी बात न कहना' ॥ ४६ ॥

बलवत् प्रतिविद्धस्य नस्तः शोणितमावहत् ।

तदप्राप्तं महीं पार्थः पाणिभ्यां प्रत्यगृह्णत ॥ ४७ ॥

अवैक्षत स धर्मात्मा द्रौपदीं पार्श्वतः स्थिताम् ।

सा ज्ञात्वा तमभिप्रायं भर्तुश्चित्तवशानुगा ॥ ४८ ॥

पात्रं गृहीत्वा सौवर्णं जलपूर्णमनिन्दिता ।

तच्छोणितं प्रत्यगृह्णाद् यत् प्रसुस्राव नस्ततः ॥ ४९ ॥

पासेका आघात जोरसे लगा था, अतः उनकी नाकसे रक्तकी धारा बह चली। किंतु

धर्मात्मा युधिष्ठिरने उस रक्तको पृथ्वीपर गिरनेसे पहले ही अपने दोनों हाथोंमें रोक लिया

और पास ही खड़ी हुई द्रौपदीकी ओर देखा। द्रौपदी अपने स्वामीके मनके अधीन

रहनेवाली और उनकी अनुगामिनी थी। उस सती-साध्वी देवीने उनका अभिप्राय समझ

लिया; अतः जलसे भरा हुआ सुवर्णमय पात्र ले आकर युधिष्ठिरकी नाकसे जो रक्त बहता

था, वह सब उसमें ले लिया ॥ ४७-४९ ॥

अथोत्तरः शुभैर्गन्धैर्माल्यैश्च विविधैस्तथा । अवकीर्यमाणः संहृष्टो नगरं स्वैरमागतः ॥ ५० ॥ इसी समय राजकुमार उत्तर बड़े हर्षके साथ स्वच्छन्दतापूर्वक नगरमें आये। मार्गमें उनके ऊपर उत्तम गन्ध और भाँति-भाँतिके पुष्पहार बरसाये जा रहे थे ।। सभाज्यमानः पौरैश्च स्त्रीभिर्जानपदैस्तथा । आसाद्य भवनद्वारं पित्रे सम्प्रत्यवेदयत् ॥ ५१ ॥ मत्स्यदेशके लोगों, पुरवासियों तथा सुन्दरी स्त्रियोंने उनका स्वागत किया; फिर राजभवनके द्वारपर पहुँचकर उन्होंने पिताको अपने आगमनकी सूचना करवायी ।। ५१ ।। ततो द्वाःस्थः प्रविश्यैव विराटमिदमब्रवीत् । बृहन्नलासहायश्च पुत्रो द्वार्युत्तरः स्थितः ॥ ५२ ॥ तब द्वारपालने भीतर जाकर महाराज विराटसे कहा—'प्रभो! बृहन्नलाके साथ राजकुमार उत्तर द्वारपर खड़े हैं' ।। ५२ ।। ततो हृष्टो मत्स्यराजः क्षत्तारमिदमब्रवीत् । प्रवेश्यतामुभौ तूर्णं दर्शनेप्सुरहं तयोः ॥ ५३ ॥ इस समाचारसे प्रसन्न होकर मत्स्यराज अपने सेवकसे बोले—'मैं उन दोनोंसे मिलना चाहता हूँ; अतः उन्हें शीघ्र भीतर ले आओ' ।। ५३ ।। क्षत्तारं कुरुराजस्तु शनैः कर्ण उपाजपत् ।

उत्तरः प्रविशत्वेको न प्रवेश्या बृहन्नला ॥ ५४ ॥
तब जाते हुए सेवकके कानमें युधिष्ठिरने धीरेसे कहा—'पहले अकेले राजकुमार उत्तर ही यहाँ आवें। बृहन्नलाको साथमें न ले आना' ॥ ५४ ॥
एतस्य हि महाबाहो व्रतमेतत् समाहितम् ।
यो ममाङ्गे व्रणं कुर्याच्छोणितं वापि दर्शयेत् ।
अन्यत्र संग्रामगतान्न स जीवेत् कथञ्चन ॥ ५५ ॥
'महाबाहो! बृहन्नलाका यह निश्चित व्रत है कि जो युद्धभूमिके सिवा अन्य किसी स्थानमें मेरे शरीरमें घाव कर दे या रक्त बहता दिखा दे, वह किसी प्रकार जीवित न रहने पाये ॥ ५५ ॥
न मृष्याद् भृशसंक्रुद्धो मां दृष्ट्वा तु सशोणितम् ।
विराटमिह सामात्यं हन्यात् सबलवाहनम् ॥ ५६ ॥
'मेरे शरीरमें रक्त देखकर वह अत्यन्त कुपित हो उठेगा और इस अपराधको क्षमा नहीं करेगा एवं राजा विराटको मन्त्री, सेना और वाहनोंसहित यहीं मार डालेगा' ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो राज्ञः सुतो ज्येष्ठः प्राविशत् पृथिवीञ्जयः ।
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ॥ ५७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा विराटके ज्येष्ठ पुत्र कुमार भूमिंजय (उत्तर) ने भीतर प्रवेश किया और पिताके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके कंकको भी मस्तक झुकाया ॥ ५७ ॥
ततो रुधिरसंयुक्तमनेकाग्रमनागसम् ।
भूमावासीनमेकान्ते सैरन्ध्र्या प्रत्युपस्थितम् ॥ ५८ ॥
उसने देखा, कंक एकान्तमें भूमिपर बैठे हैं। सैरन्ध्री उनकी सेवामें उपस्थित है। उनका मन एकाग्र नहीं है और वे निरपराध हैं, तो भी उनके शरीरसे रक्त बह रहा है ॥ ५८ ॥
ततः पप्रच्छ पितरं त्वरमाण इवोत्तरः ।
केनायं ताडितो राजन् केन पापमिदं कृतम् ॥ ५९ ॥
तब उत्तरने बड़ी उतावलीके साथ अपने पितासे पूछा—'राजन्! किसने इन्हें मारा है? किसने यह पाप किया है?' ॥ ५९ ॥

विराट उवाच

मयायं ताडितो जिह्यो न चाप्येतावदर्हति ।
प्रशस्यमाने यच्छूरे त्वयि षण्ढं प्रशंसति ॥ ६० ॥
**विराटने कहा—**बेटा! मैंने ही इस कुटिलको मारा है। यह इतने सम्मानके योग्य कदापि नहीं है। देखो न, जब मैं तुम्हारे शौर्यकी प्रशंसा करता हूँ, तब यह उस हिजड़ेकी

बड़ाई करने लगता है ।। ६० ।।

उत्तर उवाच

अकार्यं ते कृतं राजन् क्षिप्रमेव प्रसाद्यताम् ।
मा त्वां ब्रह्मविषं घोरं समूलमिह निर्दहेत् ।। ६१ ।।
**उत्तर बोले—**राजन्! आपने इन्हें मारकर बड़ा अनुचित कार्य किया है। शीघ्र ही इनको मनाइये; अन्यथा ब्राह्मणका भयंकर क्रोधविष आपको यहाँ जड़-मूलसहित भस्म कर डालेगा ।। ६१ ।।

वैशम्पायन उवाच

स पुत्रस्य वचः श्रुत्वा विराटो राष्ट्रवर्धनः ।
क्षमयामास कौन्तेयं भस्मच्छन्नमिवानलम् ।। ६२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पुत्रकी यह बात सुनकर अपने राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले महाराज विराट्ने राखमें छिपी हुई अग्निकी भाँति तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे क्षमा माँगी ।। ६२ ।।
क्षमयन्तं तु राजानं पाण्डवः प्रत्यभाषत ।
चिरं क्षान्तमिदं राजन् न मन्युर्विद्यते मम ।। ६३ ।।
राजाको क्षमा माँगते देख पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने कहा—'राजन्! मैंने चिरकालसे क्षमाका व्रत ले रखा है, अतः आपका यह अपराध क्षमा हो चुका है। मुझे आपपर जरा भी क्रोध नहीं है ।। ६३ ।।
यदि ह्येतत् पतेद् भूमौ रुधिरं मम नस्ततः ।
सराष्ट्रस्त्वं महाराज विनश्येथा न संशयः ।। ६४ ।।
'महाराज! यदि मेरी नाकसे बहनेवाला यह रक्त धरतीपर गिर जाता, तो आप सारे राष्ट्रके साथ नष्ट हो जाते; इसमें कोई संशय नहीं है ।। ६४ ।।
न दूषयामि ते राजन् यद् वै हन्याददूषकम् ।
बलवन्तं प्रभुं राजन् क्षिप्रं दारुणमाप्नुयात् ।। ६५ ।।
'राजन्! जो किसीकी निन्दा या अपराध न करे, उसे मार देना अन्याय है, तथापि मैं आपके इस कार्यकी निन्दा नहीं करता; क्योंकि बलवान् राजाको प्रायः शीघ्र ही ऐसे कठोर कर्म करनेका अवसर प्राप्त हो जाता है' ।।

वैशम्पायन उवाच

शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नला ।
अभिवाद्य विराटं तु कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ।। ६६ ।।