महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2552, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंबड़ाई करने लगता है ।। ६० ।।
उत्तर उवाच
अकार्यं ते कृतं राजन् क्षिप्रमेव प्रसाद्यताम् ।
मा त्वां ब्रह्मविषं घोरं समूलमिह निर्दहेत् ।। ६१ ।।
**उत्तर बोले—**राजन्! आपने इन्हें मारकर बड़ा अनुचित कार्य किया है। शीघ्र ही इनको मनाइये; अन्यथा ब्राह्मणका भयंकर क्रोधविष आपको यहाँ जड़-मूलसहित भस्म कर डालेगा ।। ६१ ।।
वैशम्पायन उवाच
स पुत्रस्य वचः श्रुत्वा विराटो राष्ट्रवर्धनः ।
क्षमयामास कौन्तेयं भस्मच्छन्नमिवानलम् ।। ६२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पुत्रकी यह बात सुनकर अपने राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले महाराज विराट्ने राखमें छिपी हुई अग्निकी भाँति तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे क्षमा माँगी ।। ६२ ।।
क्षमयन्तं तु राजानं पाण्डवः प्रत्यभाषत ।
चिरं क्षान्तमिदं राजन् न मन्युर्विद्यते मम ।। ६३ ।।
राजाको क्षमा माँगते देख पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने कहा—'राजन्! मैंने चिरकालसे क्षमाका व्रत ले रखा है, अतः आपका यह अपराध क्षमा हो चुका है। मुझे आपपर जरा भी क्रोध नहीं है ।। ६३ ।।
यदि ह्येतत् पतेद् भूमौ रुधिरं मम नस्ततः ।
सराष्ट्रस्त्वं महाराज विनश्येथा न संशयः ।। ६४ ।।
'महाराज! यदि मेरी नाकसे बहनेवाला यह रक्त धरतीपर गिर जाता, तो आप सारे राष्ट्रके साथ नष्ट हो जाते; इसमें कोई संशय नहीं है ।। ६४ ।।
न दूषयामि ते राजन् यद् वै हन्याददूषकम् ।
बलवन्तं प्रभुं राजन् क्षिप्रं दारुणमाप्नुयात् ।। ६५ ।।
'राजन्! जो किसीकी निन्दा या अपराध न करे, उसे मार देना अन्याय है, तथापि मैं आपके इस कार्यकी निन्दा नहीं करता; क्योंकि बलवान् राजाको प्रायः शीघ्र ही ऐसे कठोर कर्म करनेका अवसर प्राप्त हो जाता है' ।।
वैशम्पायन उवाच
शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश बृहन्नला ।
अभिवाद्य विराटं तु कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ।। ६६ ।।