महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! जब युधिष्ठिरकी नाकसे रक्त बहना बंद हो गया, उस समय बृहन्नलाने राजसभामें प्रवेश किया। उसने विराटको नमस्कार करके कंकको भी प्रणाम किया ।। ६६ ।।
क्षामयित्वा तु कौरव्यं रणादुत्तरमागतम् ।
प्रशंसंस ततो मत्स्यः शृण्वतः सव्यसाचिनः ।। ६७ ।।
इधर मत्स्यनरेश कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे क्षमा माँगकर सव्यसाची अर्जुनके सुनते हुए ही रणभूमिसे आये हुए उत्तरकी प्रशंसा करने लगे— ।। ६७ ।।
त्वया दायादवानस्मि कैकेयीनन्दिवर्धन ।
त्वया मे सदृशः पुत्रो न भूतो न भविष्यति ।। ६८ ।।
‘कैकेयीनन्दन! तुम्हें पाकर मैं वास्तवमें पुत्रवान् हूँ। तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई पुत्र न हुआ है; न होगा ही ।। ६८ ।।
पदं पदसहस्रेण यश्चरन् नापराध्नुयात् ।
तेन कर्णेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ६९ ।।
मनुष्यलोके सकले यस्य तुल्यो न विद्यते ।
तेन भीष्मेण ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७० ।।
तात! जो एक ही लक्ष्यके साथ-साथ सहस्रों लक्ष्योंका वेध करनेके लिये बाण चलाता है और कहीं भी चूकता नहीं है, उस कर्णके साथ तुम्हारा युद्ध किस प्रकार हुआ? बेटा! सारे मनुष्यलोकमें जिनकी समानता करनेवाला कोई नहीं है, उन भीष्मजीके साथ तुम्हारी भिड़न्त किस प्रकार हुई? ।। ६९-७० ।।
आचार्यो वृष्णिवीराणां कौरवाणां च यो द्विजः ।
सर्वक्षत्रस्य चाचार्यः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
तेन द्रोणेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७१ ।।
‘तात! जो वृष्णि वीरों और कौरवों दोनोंके आचार्य हैं अथवा दोनोंके ही नहीं, सम्पूर्ण क्षत्रियोंके आचार्य हैं, समस्त शस्त्रधारियोंमें जिनका सबसे ऊँचा स्थान है, उन द्रोणाचार्यके साथ तुम्हारा संग्राम किस प्रकार हुआ? ।।
आचार्यपुत्रो यः शूरः सर्वशस्त्रभृतामपि ।
अश्वत्थामेति विख्यातस्तेनासीत् संगरः कथम् ।। ७२ ।।
‘आचार्यके जो शूरवीर पुत्र सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं, जिनकी अश्वत्थामा नामसे ख्याति है, उनके साथ तुम्हारी लड़ाई कैसे हुई? ।। ७२ ।।
रणे यं प्रेक्ष्य सीदन्ति हृतस्वा वणिजो यथा ।
कृपेण तेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७३ ।।
‘बेटा! जैसे वणिक् अपना धन छिन जानेपर दुःखी होते हैं, उसी प्रकार युद्धमें जिन्हें देखकर बड़े-बड़े योद्धा शिथिल हो जाते हैं, उन कृपाचार्यके साथ तुम्हारा संग्राम किस