महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकार हुआ? ।। ७३ ।। पर्वतं योऽभिविध्येत राजपुत्रो महेषुभिः । दुर्योधनेन ते तात कथमासीत् समागमः ।। ७४ ।। 'तात! जो राजपुत्र अपने महान् बाणोंसे पर्वतको भी विदीर्ण कर सकता है, उस दुर्योधनके साथ तुम्हारी मुठभेड़ कैसे हुई? ।। ७४ ।।
अवगाढा द्विषन्तो मे सुखो वातोऽभिवाति माम् । यस्त्वं धनमथाजैषीः कुरुभिर्ग्रस्तमाहवे ।। ७५ ।। 'बेटा! कौरवोंने जिस गोधनको संग्राममें हड़प लिया था, उसे तुम जीतकर ले आये, यह बहुत अच्छा हुआ। आज हमारे शत्रु परास्त हो गये, इसलिये आजकी वायु मुझे बड़ी सुखदायिनी प्रतीत हो रही है ।। ७५ ।।
तेषां भयाभिपन्नानां सर्वेषां बलशालिनाम् । नूनं प्रकाल्प तान् सर्वांस्त्वया युधि नरर्षभ । आच्छिन्नं गोधनं सर्वं शार्दूलेनामिषं यथा ।। ७६ ।। 'नरश्रेष्ठ! तुमने उन समस्त शत्रुओंको युद्धमें जीतकर उन्हें भयमें डाल दिया है और उन समस्त बलशालियोंके हाथसे अपने सारे गोधनको इस प्रकार छीन लिया है, जैसे सिंह दूसरे जन्तुओंके हाथसे मांस छीन लेता है ।। ७६ ।।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि विराटोत्तरसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें विराट-उत्तर-संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं।)