भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2546, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2546

घण्टावान् मानवः शीघ्रं मत्तमारुह्य वारणम् ।

शृङ्गाटकेषु सर्वेषु आख्यातु विजयं मम ।। २५ ।।

उत्तरा च कुमारीभिर्बह्वीभिः परिवारिता ।

शृंगारवेषाभरणा प्रत्युद्यातु सुतं मम ।। २६ ।।

'एक मनुष्य शीघ्र ही हाथमें घण्टा लिये मतवाले गजराजपर बैठ जाय और नगरके

समस्त चौराहोंपर हमारी विजयका संवाद सुनावे। राजकुमारी उत्तरा भी उत्तम शृङ्गार और

सुन्दर वेष-भूषासे सुशोभित हो अन्य राजकुमारियोंके साथ मेरे पुत्रकी अगवानीमें जायँ' ।।

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा चेदं वचनं पार्थिवस्य

सर्वं पुरं स्वस्तिकपाणिभूतम् ।

भेर्यश्च तूर्याणि च वारिजाश्च

वेषैः परार्थ्यैः प्रमदाः शुभाश्च ।। २७ ।।

तथैव सूतैः सह मागधैश्च

नान्दीवाद्याः पणवास्तूर्यवाद्याः ।

पुराद् विराटस्य महाबलस्य

प्रत्युद्ययुः पुत्रमनन्तवीर्यम् ।। २८ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! राजाकी इस आज्ञाको सुनकर बहुमूल्य वेशभूषासे

सुशोभित सौभाग्यवती तरुणी स्त्रियों, सूत, मागध और बंदीजनोंसहित समस्त पुरवासी,

हाथोंमें मांगलिक वस्तुएँ लेकर भेरी, तूर्य, शंख तथा पणव आदि मांगलिक बाजे साथ लिये

महाबली विराटके अनन्त पराक्रमी पुत्र उत्तरकी अगवानी करनेके लिये नगरसे बाहर

गये ।। २७-२८ ।।

प्रस्थाप्य सेनां कन्याश्च गणिकाश्च स्वलङ्कृताः ।

मत्स्यराजो महाप्राज्ञः प्रहृष्ट इदमब्रवीत् ।। २९ ।।

राजन्! तदनन्तर सेना, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याओं और वारांगनाओंको

भेजकर परम बुद्धिमान् मत्स्यनरेश हर्षोल्लासमें भरकर इस प्रकार बोले— ।।

अक्षानाहर सैरन्ध्रि कङ्क द्यूतं प्रवर्तताम् ।

तं तथावादिनं दृष्ट्वा पाण्डवः प्रत्यभाषत ।। ३० ।।

'सैरन्ध्री! जा, पासे ले आ। कंक! जूआ प्रारम्भ हो। 'उन्हें ऐसा कहते देख पाण्डुनन्दन

युधिष्ठिर बोले— ।। ३० ।।

न देवितव्यं हृष्टेन कितवेनेति नः श्रुतम् ।

तं त्वामद्य मुदा युक्तं नाहं देवितुमुत्सहे ।

प्रियं तु ते चिकीर्षामि वर्ततां यदि मन्यसे ।। ३१ ।।