भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2545, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2545

पराजयं कुरूणां चाप्युपायान्तं तथोत्तरम् ॥ १८ ॥ सर्वा विनिर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः । उत्तरः सह सूतेन कुशली च परंतपः ॥ १९ ॥ मन्त्रीने वह सब समाचार महाराजसे कह सुनाया। अपने पक्षकी उत्तम विजय और कौरवोंकी करारी हार हुई है। राजकुमार उत्तर नगरमें आ रहे हैं। समस्त गौएँ जीत ली गयीं तथा कौरव परास्त होकर भाग गये। शत्रुओंको संताप देनेवाले कुमार उत्तर सारथिसहित सकुशल हैं ॥ १८-१९ ॥

युधिष्ठिर उवाच दिष्ट्या विनिर्जिता गावः कुरवश्च पलायिताः । नाद्भुतं त्वेव मन्येऽहं यत् ते पुत्रोऽजयत् कुरून् ॥ २० ॥ ध्रुव एव जयस्तस्य यस्य यन्ता बृहन्नला । (देवेन्द्रसारथिश्चैव मातलिर्लघुविक्रमः । कृष्णस्य सारथिश्चैव न बृहन्नलया समौ ॥) युधिष्ठिरने कहा—महाराज! सौभाग्यकी बात है कि गौएँ जीत ली गयीं और कौरव भाग गये। आपके पुत्रने कौरवोंपर जो विजय पायी है, उसे मैं कोई आश्चर्यकी बात नहीं मानता। जिसका सारथि बृहन्नला हो, उसकी विजय तो निश्चित ही है। देवराज इन्द्रका शीघ्रगामी सारथि मातलि तथा श्रीकृष्णका सारथि दारुक—ये दोनों बृहन्नलाकी समानता नहीं कर सकते ॥ २० १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो विराटो नृपतिः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥ २१ ॥ श्रुत्वा स विजयं तस्य कुमारस्यामितौजसः । आच्छादयित्वा दूतांस्तान् मन्त्रिणं सोऽभ्यचोदयत् ॥ २२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने अमित-पराक्रमी कुमारकी विजयका समाचार सुनकर राजा विराट बड़े प्रसन्न हुए। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने वस्त्र और आभूषणोंसे उन दूतोंका सत्कार किया और मन्त्रीको आज्ञा दी— ॥ २१-२२ ॥ राजमार्गाः क्रियन्तां मे पताकाभिरलंकृताः । पुष्पोपहारैरर्च्यन्तां देवताश्चापि सर्वशः ॥ २३ ॥ कुमारा योधमुख्याश्च गणिकाश्च स्वलंकृताः । वादित्राणि च सर्वाणि प्रत्युद्यान्तु सुतं मम ॥ २४ ॥ 'मेरे नगरकी सड़कोंको पताकाओंसे अलंकृत किया जाय। फूलों तथा नाना प्रकारके उपहारोंसे सब देवताओंकी पूजा होनी चाहिये। कुमार, मुख्य-मुख्य योद्धा, शृंगारसे सुशोभित वारांगनाएँ और सब प्रकारके बाजे-गाजे मेरे पुत्रकी अगवानीमें भेजे जायँ ॥

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