भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 256

तस्माद् धर्मार्थयोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिताः । प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्यारणैर्यथा ॥ २८ ॥ ‘इसलिये विद्वान् पुरुष कभी धर्म और अर्थके सम्पादनमें प्रमाद नहीं करते हैं। धर्म और अर्थ कामकी उत्पत्तिके स्थान हैं (अर्थात् धर्म और अर्थसे ही कामकी सिद्धि होती है) जैसे अरणि अग्निका उत्पत्तिस्थान है ॥ २८ ॥

सर्वथा धर्ममूलोऽर्थो धर्मश्चार्थपरिग्रहः । इतरेतरयोर्नीतौ विद्धि मेघोदधी यथा ॥ २९ ॥ ‘अर्थका कारण है धर्म और धर्म सिद्ध होता है अर्थसंग्रहसे। जैसे मेघसे समुद्रकी पुष्टि होती है और समुद्रसे मेघकी पूर्ति। इस प्रकार धर्म और अर्थको एक-दूसरेके आश्रित समझना चाहिये ॥ २९ ॥

द्रव्यार्थस्पर्शसंयोगे या प्रीतिरूपजायते । स कामश्चित्तसंकल्पः शरीरं नास्य दृश्यते ॥ ३० ॥ ‘स्त्री, माला, चन्दन आदि द्रव्योंके स्पर्श और सुवर्ण आदि धनके लाभसे जो प्रसन्नता होती है, उसके लिये जो चित्तमें संकल्प उठता है, उसीका नाम काम है। उस कामका शरीर नहीं देखा जाता (इसीलिये वह ‘अनंग’ कहलाता है) ॥ ३० ॥

अर्थार्थी पुरुषो राजन् बृहन्तं धर्ममिच्छति । अर्थमिच्छति कामार्थी न कामादन्यमिच्छति ॥ ३१ ॥ ‘राजन्! धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष महान् धर्मकी अभिलाषा रखता है और कामार्थी मनुष्य धन चाहता है। जैसे धर्मसे धनकी और धनसे कामकी इच्छा करता है, उस प्रकार वह कामसे किसी दूसरी वस्तुकी इच्छा नहीं करता है ॥ ३१ ॥

न हि कामेन कामोऽन्यः साध्यते फलमेव तत् । उपयोगात् फलस्यैव काष्ठाद् भस्मेव पण्डितैः ॥ ३२ ॥ ‘जैसे फल उपभोगमें आकर कृतार्थ हो जाता है, उससे दूसरा फल नहीं प्राप्त हो सकता तथा जिस प्रकार काष्ठसे भस्म बन सकता है, परंतु उस भस्मसे दूसरा कोई पदार्थ नहीं बन सकता; इसी तरह बुद्धिमान् पुरुष एक कामसे किसी दूसरे कामकी सिद्धि नहीं मानते, क्योंकि वह साधन नहीं, फल ही है ॥ ३२ ॥

इमाञ्छकुनकान् राजन् हन्ति वैतंसिको यथा । एतद् रूपमधर्मस्य भूतेषु हि विहिंसता ॥ ३३ ॥ कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रकृतिं यो न पश्यति । स वध्यः सर्वभूतानां प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ॥ ३४ ॥ ‘राजन्! जैसे पक्षियोंको मारनेवाला व्याध इन पक्षियोंको मारता है, यह विशेष प्रकारकी हिंसा ही अधर्मका स्वरूप है (अतः वह हिंसक सबके लिये वध्य है)। वैसे ही जो

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