महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखोटी बुद्धिवाला मनुष्य काम और लोभके वशीभूत होकर धर्मके स्वरूपको नहीं जानता, वह इहलोक और परलोकमें भी सब प्राणियोंका वध्य होता है ॥ ३३-३४ ॥
व्यक्तं ते विदितो राजन्नर्थो द्रव्यपरिग्रहः । प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूयसीम् ॥ ३५ ॥ 'राजन्! आपको यह अच्छी तरह ज्ञात है कि धनसे ही भोग्य-सामग्रीका संग्रह होता है। धनका जो कारण है, उससे भी आप परिचित हैं और धनके द्वारा जो बहुत-से कार्य सिद्ध होते हैं, उसे भी आप जानते हैं ॥ ३५ ॥
तस्य नाशे विनाशे वा जरया मरणेन वा । अनर्थ इति मन्यन्ते सोऽयमस्मासु वर्तते ॥ ३६ ॥ 'उस धनका अभाव होनेपर अथवा प्राप्त हुए धनका नाश होनेपर अथवा स्त्री आदि धनके जरा-जीर्ण एवं मृत्युग्रस्त होनेपर मनुष्यकी जो दशा होती है, उसीको सब लोग अनर्थ मानते हैं। वही इस समय हमलोगोंको भी प्राप्त हुआ है ॥ ३६ ॥
इन्द्रियाणां च पञ्चानां मनसो हृदयस्य च । विषये वर्तमानानां या प्रीतिरूपजायते ॥ ३७ ॥ स काम इति मे बुद्धिः कर्मणां फलमुत्तमम् । 'पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धिकी अपने विषयोंमें प्रवृत्त होनेके समय जो प्रीति होती है, वही मेरी समझमें काम है। वह कर्मोंका उत्तम फल है ॥ ३७ १/२ ॥
एवमेव पृथग् दृष्ट्वा धर्मार्थौ काममेव च ॥ ३८ ॥ न धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नरः । न कामपरमो वा स्यात् सर्वान् सेवेत सर्वदा ॥ ३९ ॥ धर्मं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये काममाचरेत् । अहन्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥ ४० ॥ 'इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम तीनोंको पृथक्-पृथक् समझकर मनुष्य केवल धर्म, केवल अर्थ अथवा केवल कामके ही सेवनमें तत्पर न रहे। उन सबका सदा इस प्रकार सेवन करे, जिससे इनमें विरोध न हो। इस विषयमें शास्त्रोंका यह विधान है कि दिनके पूर्वभागमें धर्मका, दूसरे भागमें अर्थका और अन्तिम भागमें कामका सेवन करे ॥ ३८—४० ॥
कामं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत् । वयस्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥ ४१ ॥ 'इसी प्रकार अवस्था-क्रममें शास्त्रका विधान यह है कि आयुके पूर्वभागमें (युवावस्थामें) कामका, मध्यभाग (प्रौढ़ावस्था)-में धनका तथा अन्तिम भाग (वृद्धावस्था)-में धर्मका पालन करे ॥ ४१ ॥
धर्मं चार्थं च कामं च यथावद् वदतां वर ।