महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2560, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंबलवान् धृतिमान् दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः । धनैश्च सञ्चयैश्चैव शक्रवैश्रवणोपमः ॥ १४ ॥ ये महर्षियोंके समान हैं, राजर्षि हैं और समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। बलवान्, धैर्यवान्, चतुर, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं। धन और संग्रहकी दृष्टिसे ये इन्द्र और कुबेरके समान हैं ॥ १४ ॥
यथा मनुर्महातेजा लोकानां परिरक्षिता । एवमेष महातेजाः प्रजानुग्रहकारकः ॥ १५ ॥ जैसे महातेजस्वी मनु समस्त लोकोंके रक्षक हैं उसी प्रकार ये महातेजस्वी नरेश भी प्रजाजनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं ॥ १५ ॥
अयं कुरूणामृषभो धर्मराजो युधिष्ठिरः । अस्य कीर्तिः स्थिता लोके सूर्यस्येवोद्यतः प्रभा ॥ १६ ॥ ये ही कुरुवंशमें सर्वश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर हैं। उदयकालके सूर्यकी शान्त प्रभाके समान इनकी सुख-दायिनी कीर्ति समस्त संसारमें फैली हुई है ॥ १६ ॥
संसरन्ति दिशः सर्वा यशसोऽस्य इवांशवः । उदितस्येव सूर्यस्य तेजसोऽनु गभस्तयः ॥ १७ ॥ जैसे सूर्योदय होनेपर सूर्यके तेजके पश्चात् उनकी किरणें समस्त दिशाओंमें फैल जाती हैं, उसी प्रकार इनके सुयशके साथ-साथ उसकी सुधाधवल किरणें समस्त दिशाओंमें छा रही हैं ॥ १७ ॥
एनं दशसहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् । अन्वयुः पृष्ठतो राजन् यावदध्यावसत् कुरून् ॥ १८ ॥ राजन्! ये महाराज जब कुरुदेशमें रहते थे, उस समय इनके पीछे दस हजार वेगवान् हाथी चला करते थे ॥ १८ ॥
त्रिंशदेनं सहस्राणि रथाः काञ्चनमालिनः । सदश्वैरुपसम्पन्नाः पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ॥ १९ ॥ इस प्रकार अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णमालामण्डित तीस हजार रथ भी उस समय इनका अनुसरण करते थे ॥
एनमष्टशताः सूताः सुमृष्टमणिकुण्डलाः । अब्रुवन् मागधैः सार्धं पुरा शक्रमिवर्षयः ॥ २० ॥ जैसे महर्षिगण इन्द्रकी स्तुति करते हैं, उसी प्रकार पहले विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये आठ सौ सूत और मागध इनके गुण गाते थे ॥ २० ॥
एनं नित्यमुपासन्त कुरवः किंकरा यथा । सर्वे च राजन् राजानो धनेश्वरमिवामराः ॥ २१ ॥