महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! जैसे देवगण धनाध्यक्ष कुबेरका दरबार किया करते हैं, वैसे ही सब राजा और कौरव किंकरोंकी भाँति इनकी नित्य उपासना करते थे ॥ २१ ॥
एष सर्वान् महीपालान् करदान् समकारयत् । वैश्यानिव महाभागो विवशान् स्ववशामपि ॥ २२ ॥ अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् । उपजीवन्ति राजानमेनं सुचरितव्रतम् ॥ २३ ॥
इन महाभाग नरेशने इस देशके सब राजाओंको वैश्योंकी भाँति स्ववश (अपने अधीन) और विवश करके कर देनेवाला बना दिया था। (अर्थात् सब राजा इन्हें कर दिया करते थे।) अत्यन्त उत्तम व्रतका पालन करनेवाले इन महाराजके यहाँ प्रतिदिन अठासी हजार महाबुद्धिमान् स्नातकोंकी जीविका चलती थी ॥ २२-२३ ॥
एष वृद्धाननाथांश्च पङ्गून्धांश्च मानवान् । पुत्रवत् पालयामास प्रजा धर्मेण वै विभुः ॥ २४ ॥
ये बूढ़े, अनाथ, पंगू और अंधे मनुष्योंका भी स्नेहपूर्वक पालन करते थे। ये नरेश अपनी प्रजाकी धर्मपूर्वक पुत्रकी भाँति रक्षा करते थे ॥ २४ ॥
एष धर्मे दमे चैव क्रोधे चापि जितव्रतः । महाप्रसादो ब्रह्मण्यः सत्यवादी च पार्थिवः ॥ २५ ॥
ये भूपाल धर्म और इन्द्रियसंयममें तत्पर तथा क्रोधको काबूमें रखनेके लिये दृढ़प्रतिज्ञ हैं। ये बड़े कृपालु, ब्राह्मणभक्त और सत्यवक्ता हैं ॥ २५ ॥
शीघ्रं तापेन चैतस्य तप्स्यते स सुयोधनः । सगणः सह कर्णेन सौबलेनापि वा विभुः ॥ २६ ॥
इनके प्रतापसे दुर्योधन शक्तिशाली होकर भी कर्ण, शकुनि तथा अपने गणोंके साथ शीघ्र ही संतप्त होनेवाला है ॥ २६ ॥
न शक्यन्ते ह्यस्य गुणाः प्रसंख्यातुं नरेश्वर । एष धर्मपरो नित्यमानृशंसश्च पाण्डवः ॥ २७ ॥ एवं युक्तो महाराजः पाण्डवः पार्थिवर्षभः । कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपते ॥ २८ ॥
नरेश्वर! इनके सद्गुणोंकी गणना नहीं की जा सकती। ये पाण्डुनन्दन नित्य धर्मपरायण तथा दयालु स्वभावके हैं। राजन्! समस्त राजाओंके शिरोमणि पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर इस प्रकार सर्वोत्तम गुणोंसे युक्त होकर भी राजोचित आसनके अधिकारी क्यों नहीं हैं? ॥ २७-२८ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पाण्डवप्रकाशे सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥