महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 318, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकचत्वारिंशोऽध्यायः
अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना
वैशम्पायन उवाच
तस्य सम्पश्यतस्त्वेव पिनाकी वृषभध्वजः ।
जगामादर्शनं भानुर्लोकस्येवास्तमीयिवान् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुनके देखते-देखते पिनाकधारी भगवान् वृषभध्वज अदृश्य हो गये, मानो भुवनभास्कर भगवान् सूर्य अस्त हो गये हों ॥ १ ॥
ततोऽर्जुनः परं चक्रे विस्मयं परवीरहा ।
मया साक्षान्महादेवो दृष्ट इत्येव भारत ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनको यह सोचकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज मुझे महादेवजीका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ २ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मया त्र्यम्बको हरः ।
पिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना ॥ ३ ॥
मैं धन्य हूँ! भगवान्का मुझपर बड़ा अनुग्रह है कि त्रिनेत्रधारी, सर्वपापहारी एवं अभीष्ट वर देनेवाले पिनाक-पाणि भगवान् शंकरने मूर्तिमान् होकर मुझे दर्शन दिया और अपने करकमलोंसे मेरे अंगोंका स्पर्श किया ॥ ३ ॥
कृतार्थं चावगच्छामि परमात्मानमाहवे ।
शत्रूंश्च विजितान् सर्वान् निर्वृत्तं च प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
आज मैं अपने-आपको परम कृतार्थ मानता हूँ, साथ ही यह विश्वास करता हूँ कि महासमरमें अपने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। अब मेरा अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध हो गया ॥ ४ ॥
इत्येवं चिन्तयानस्य पार्थस्यामिततेजसः ।
ततो वैडूर्यवर्णाभो भासयन् सर्वतो दिशः ।
यादोगणवृतः श्रीमानाजगाम जलेश्वरः ॥ ५ ॥
इस प्रकार चिन्तन करते हुए अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुनके पास जलके स्वामी श्रीमान् वरुणदेव जल-जन्तुओंसे घिरे हुए आ पहुँचे। उनकी अंगकान्ति वैदूर्यमणिके समान थी और वे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ ५ ॥
नागैर्नदैर्नदीभिश्च दैत्यैः साध्यैश्च दैवतैः ।
वरुणो यादसां भर्ता वशी तं देशमागमत् ॥ ६ ॥