भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 319

नागों, नद और नदियोंके देवताओं, दैत्यों तथा साध्यदेवताओंके साथ जल-जन्तुओंके स्वामी जितेन्द्रिय वरुणदेवने उस स्थानको अपने शुभागमनसे सुशोभित किया ।। ६ ।।
अथ जाम्बूनदवपुर्विमानेन महार्षिषा ।
कुबेरः समनुप्राप्तो यक्षैरनुगतः प्रभुः ॥ ७ ॥
तदनन्तर स्वर्णके समान शरीरवाले भगवान् कुबेर महातेजस्वी विमानद्वारा वहाँ आये। उनके साथ बहुत-से यक्ष भी थे ।। ७ ।।
विद्योतयन्निवाकाशमद्भुतोपमदर्शनः ।
धनानामीश्वरः श्रीमानर्जुनं द्रष्टुमागतः ॥ ८ ॥
वे अपने तेजसे आकाशमण्डलको प्रकाशित-से कर रहे थे। उनका दर्शन अद्भुत एवं अनुपम था। परम सुन्दर श्रीमान् धनाध्यक्ष कुबेर अर्जुनको देखनेके लिये वहाँ पधारे थे ।। ८ ।।
तथा लोकान्तकृच्छ्रीमान् यमः साक्षात् प्रतापवान् ।
मर्त्यमूर्तिधरैः सार्धं पितृभिर्लोकभावनैः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार समस्त जगत्का अन्त करनेवाले श्रीमान् प्रतापी यमराजने प्रत्यक्षरूपमें वहाँ दर्शन दिया। उनके साथ मानव-शरीरधारी विश्वभावन पितृगण भी थे ।। ९ ।।
दण्डपाणिरचिन्त्यात्मा सर्वभूतविनाशकृत् ।
वैवस्वतो धर्मराजो विमानेनावभासयन् ॥ १० ॥
त्रींल्लोकान् गुह्यकांश्चैव गन्धर्वांश्च सपन्नगान् ।
द्वितीय इव मार्तण्डो युगान्ते समुपस्थिते ॥ ११ ॥
उनके हाथमें दण्ड शोभा पा रहा था। सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाले अचिन्त्यात्मा सूर्यपुत्र धर्मराज अपने (तेजस्वी) विमानसे तीनों लोकों, गुह्यकों, गन्धर्वों तथा नागोंको प्रकाशित कर रहे थे। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर दिखायी देनेवाले द्वितीय सूर्यकी भाँति उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी ।। १०-११ ।।
ते भानुमन्ति चित्राणि शिखराणि महागिरेः ।
समास्थायार्जुनं तत्र ददृशुस्तपसान्वितम् ॥ १२ ॥
उन सब देवताओंने उस महापर्वतके विचित्र एवं तेजस्वी शिखरोंपर पहुँचकर वहाँ तपस्वी अर्जुनको देखा ।।
ततो मुहूर्ताद् भगवानैरावतशिरोगतः ।
आजगाम सहेन्द्राण्या शक्रः सुरगणैर्वृतः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् दो ही घड़ीके बाद भगवान् इन्द्र इन्द्राणीके साथ ऐरावतकी पीठपर बैठकर वहाँ आये। देवताओंके समुदायने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था ।।
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
शुशुभे तारकराजः सितमभ्रमिव स्थितः ॥ १४ ॥

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