भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 320

संस्तूयमानो गन्धर्वैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः । शृङ्गं गिरेः समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदितः ॥ १५ ॥ उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे शुभ्र वर्णके मेघखण्डसे आच्छादित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे। बहुत-से तपस्वी-ऋषि तथा गन्धर्वगण उनकी स्तुति करते थे। वे उस पर्वतके शिखरपर आकर ठहर गये, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गये हों ॥ १४-१५ ॥

अथ मेघस्वनो धीमान् व्याजहार शुभां गिरम् । यमः परमधर्मज्ञो दक्षिणां दिशमास्थितः ॥ १६ ॥ तदनन्तर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले परम धर्मज्ञ एवं बुद्धिमान् यमराज दक्षिण दिशामें स्थित हो यह शुभ वचन बोले— ॥ १६ ॥

अर्जुनार्जुन पश्यास्माँल्लोकपालान् समागतान् । दृष्टिं ते वितरामोऽद्य भवानर्हति दर्शनम् ॥ १७ ॥ पूर्वर्षिरमितात्मा त्वं नरो नाम महाबलः । नियोगाद् ब्रह्मणस्तात मर्त्यतां समुपागतः ॥ १८ ॥ अर्जुन! हम सब लोकपाल यहाँ आये हुए हैं। तुम हमें देखो। हम तुम्हें दिव्य दृष्टि देते हैं। तुम हमारे दर्शनके अधिकारी हो। तुम महामना एवं महाबली पुरातन महर्षि नर हो। तात! ब्रह्माजीकी आज्ञासे तुमने मानव-शरीर ग्रहण किया है ॥ १७-१८ ॥

त्वया च वसुसम्भूतो महावीर्यः पितामहः । भीष्मः परमधर्मात्मा संसाध्यश्च रणेऽनघ ॥ १९ ॥ क्षत्रं चाग्निसमस्पर्शं भारद्वाजेन रक्षितम् । दानवाश्च महावीर्या ये मनुष्यत्वमागताः ॥ २० ॥ निवातकवचाश्चैव दानवाः कुरुनन्दन । पितुर्मांशो देवस्य सर्वलोकप्रतापिनः ॥ २१ ॥ कर्णश्च सुमहावीर्यस्त्वया वध्यो धनंजय । 'अनघ! वसुओंके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी और परम धर्मात्मा पितामह भीष्मको तुम संग्राममें जीत लोगे। भरद्वाजपुत्र द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित क्षत्रिय-समुदाय भी, जिसका स्पर्श अग्निके समान भयंकर है, तुम्हारे द्वारा पराजित होगा। कुरुनन्दन! मानव-शरीरमें उत्पन्न हुए महाबली दानव तथा निवातकवच नामक दैत्य भी तुम्हारे हाथसे मारे जायँगे। धनंजय! सम्पूर्ण जगत्‌को उष्णता प्रदान करनेवाले मेरे पिता भगवान् सूर्यदेवके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी कर्ण भी तुम्हारा वध्य होगा ॥ १९—२१½ ॥

अंशाश्च क्षितिसम्प्राप्ता देवदानवरक्षसाम् ॥ २२ ॥ त्वया निपातिता युद्धे स्वकर्मफलनिर्जिताम् । गतिं प्राप्स्यन्ति कौन्तेय यथास्वमरिकर्षण ॥ २३ ॥