महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहस्राक्षनियोगात् स पार्थः शक्रासनं गतः । अध्यक्रामदमेयात्मा द्वितीय इव वासवः ॥ २२ ॥ उस समय सहस्रनेत्रधारी देवेन्द्रके आदेशसे उनके सिंहासनपर बैठे हुए अपरिमित प्रभावशाली कुन्तीकुमार दूसरे इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ २२ ॥ ततः प्रेम्णा वृत्रशत्रुरर्जुनस्य शुभं मुखम् । पस्पर्श पुण्यगन्धेन करेण परिसान्त्वयन् ॥ २३ ॥ इसके बाद वृत्रासुरके शत्रु इन्द्रने पवित्र गन्धयुक्त हाथसे बड़े प्रेमके साथ अर्जुनको सब प्रकारसे आश्वासन देते हुए उनके सुन्दर मुखका स्पर्श किया ॥ २३ ॥ प्रमार्जमानः शनकैर्बाहू चास्यायतौ शुभौ । ज्याशरक्षेपकठिनौ स्तम्भाविव हिरण्मयौ ॥ २४ ॥ अर्जुनकी सुन्दर विशाल भुजाएँ प्रत्यंचा खींचकर बाण चलानेकी रगड़से कठोर हो गयी थीं। वे देखनेमें सोनेके खंभे-जैसी जान पड़ती थीं। देवराज उन भुजाओंपर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगे ॥ २४ ॥ वज्रग्रहणचिह्नेन करेण परिसान्त्वयन् । मुहुर्मुहुर्वज्रधरो बाहू चास्फोटयच्छनैः ॥ २५ ॥