महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंततोऽपश्यद् देवराजं शतक्रतुमरिंदमः ॥ १५ ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले कुरुनन्दन अर्जुनने उन सबसे विधिपूर्वक मिलकर अन्तमें सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्रका दर्शन किया ॥ १५ ॥ ततः पार्थो महाबाहुरवतीर्य रथोत्तमात् । ददर्श साक्षाद् देवेशं पितरं पाकशासनम् ॥ १६ ॥ उन्हें देखते ही महाबाहु पार्थ उस उत्तम रथसे उतर पड़े और देवेश्वर पिता पाकशासन (इन्द्र)-को उन्होंने प्रत्यक्ष देखा ॥ १६ ॥ पाण्डुरेणातपत्रेण हेमदण्डेन चारुणा । दिव्यगन्धाधिवासेन व्यजनेन विधूयता ॥ १७ ॥ उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिसमें मनोहर स्वर्णमय दण्ड शोभा पा रहा था। उनके उभय पार्श्वमें दिव्य सुगन्धसे वासित चँवर डुलाये जा रहे थे ॥ १७ ॥ विश्वावसुप्रभृतिभिर्गन्धर्वैः स्तुतिवन्दनैः । स्तूयमानं द्विजाग्र्यैश्च ऋग्यजुःसामसम्भवैः ॥ १८ ॥ विश्वावसु आदि गन्धर्व स्तुति और वन्दनापूर्वक उनके गुण गाते थे। श्रेष्ठ ब्रह्मर्षिगण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके इन्द्रदेवतासम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा उनका स्तवन कर रहे थे ॥ १८ ॥ ततोऽभिगम्य कौन्तेयः शिरसाभ्यगमद् बली । स चैनं वृत्तपीनाभ्यां बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णत ॥ १९ ॥ तदनन्तर बलवान् कुन्तीकुमारने निकट जाकर देवेन्द्रके चरणोंमें मस्तक रख दिया और उन्होंने अपनी गोल-गोल मोटी भुजाओंसे उठाकर अर्जुनको हृदयसे लगा लिया ॥ १९ ॥ ततः शक्रासने पुण्ये देवर्षिगणसेविते । शक्रः पाणौ गृहीत्वैनमुपावेशयदन्तिके ॥ २० ॥ तत्पश्चात् इन्द्रने अर्जुनका हाथ पकड़कर अपने देवर्षिगणसेवित पवित्र सिंहासनपर उन्हें पास ही बिठा लिया ॥ २० ॥ मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय देवेन्द्रः परवीरहा । अङ्कमारोपयामास प्रश्रयावनतं तदा ॥ २१ ॥ तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले देवराजने विनीतभावसे आये हुए अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें अपनी गोदमें बिठा लिया ॥ २१ ॥