महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 333, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तद् दिव्यं वनं पश्यन् दिव्यगीतनिनादितम् । प्रविवेश महाबाहुः शक्रस्य दयितां पुरीम् ॥ ७ ॥ जहाँ सब ओर दिव्य संगीत गूँज रहा था, उस दिव्य वनका दर्शन करते हुए महाबाहु अर्जुनने देवराज इन्द्रकी प्रिय नगरी अमरावतीमें प्रवेश किया ॥ ७ ॥
तत्र देवविमानानि कामगानि सहस्रशः । संस्थितान्यभियातानि ददर्शायुतशस्तदा ॥ ८ ॥ संस्तूयमानो गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पाण्डवः । पुष्पगन्धवहैः पुण्यैर्वायुभिश्चानुवीजितः ॥ ९ ॥ वहाँ स्वेच्छानुसार गमन करनेवाले देवताओंके सहस्रों विमान स्थिरभावसे खड़े थे और हजारों इधर-उधर आते-जाते थे। उन सबको पाण्डुनन्दन अर्जुनने देखा। उस समय गन्धर्व और अप्सराएँ उनकी स्तुति कर रही थीं। फूलोंकी सुगन्धका भार वहन करनेवाली पवित्र मन्द-मन्द वायु मानो उनके लिये चँवर डुला रही थी ॥ ८-९ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । हृष्टाः सम्पूजयामासुः पार्थमक्लिष्टकारिणम् ॥ १० ॥ तदनन्तर देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों और महर्षियोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनका स्वागत-सत्कार किया ॥ १० ॥
आशीर्वादैः स्तूयमानो दिव्यवादित्रनिःस्वनैः । प्रतिपेदे महाबाहुः शङ्खदुन्दुभिनादितम् ॥ ११ ॥ नक्षत्रमार्गं विपुलं सुरवीथीति विश्रुतम् । इन्द्राज्ञया ययौ पार्थः स्तूयमानः समन्ततः ॥ १२ ॥ कहीं उन्हें आशीर्वाद मिलता और कहीं स्तुति-प्रशंसा प्राप्त होती थी। स्थान-स्थानपर दिव्य वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे उनका स्वागत हो रहा था। इस प्रकार महाबाहु अर्जुन शंख और दुन्दुभियोंके गम्भीर नादसे गूँजते हुए 'सुरवीथी' नामसे प्रसिद्ध विस्तृत नक्षत्र-मार्गपर चलने लगे। इन्द्रकी आज्ञासे कुन्तीकुमारका सब ओर स्तवन हो रहा था और इस प्रकार वे गन्तव्य मार्गपर बढ़ते चले जा रहे थे ॥ ११-१२ ॥
तत्र साध्यास्तथा विश्वे मरुतोऽथाश्विनौ तथा । आदित्या वसवो रुद्रास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ १३ ॥ राजर्षयश्च बहवो दिलीपप्रमुखा नृपाः । तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ च हहाहूहूः ॥ १४ ॥ वहाँ साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, आदित्य, वसु, रुद्र तथा विशुद्ध ब्रह्मर्षिगण और अनेक राजर्षिगण एवं दिलीप आदि बहुत-से राजा, तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू आदि गन्धर्वगण विराजमान थे ॥ १३-१४ ॥
तान् स सर्वान् समागम्य विधिवत् कुरुनन्दनः ।